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World Environment Day 2020: पर्यावरण संरक्षण का 'सबक' सिखा गया लॉकडाउन, तस्वीरों में देखें शहर की आबोहवा

Fri, 05 Jun 2020 04:45 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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विश्व पर्यावरण दिवस - फोटो : अमर उजाला।
अनलॉक 1.0 के पहले चरण में शहर की आबोहवा बेहतर है। एक जून का आंकड़ा देखा जाए तो गीडा, गोलघर स्थित जलकल और मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) में पर्यावरण का स्तर मार्च से बेहतर पाया गया। इसका मुख्य कारण लॉकडाउन बताया जा रहा है।
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विश्व पर्यावरण दिवस - फोटो : आनंद चौधरी।
लॉकडाउन से पहले शहर के वातावरण में खतरनाक हद तक सेहत के लिए हानिकारक तत्व घुले थे। हवा का क्वॉलिटी इनडेक्स बेहद खराब था। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि हवा में प्रदूषण बढ़ा तो लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है। विशेषकर सांस के मरीजों को सतर्क रहना होगा।
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विश्व पर्यावरण दिवस - फोटो : आनंद चौधरी।
पर्यावरणविदों का कहना है कि लॉकडाउन में वाहनों का आवागमन बेहद कम है। ज्यादातर औद्योगिक इकाइयां अप्रैल और मई में बंद रहीं। इसका असर साफ तौर पर दिखा है। वातावरण में आक्सीजन की मात्रा अच्छी हुई है। नुकसानदायक तत्वों की मात्रा कम हुई है। हालांकि अनलॉक के अगले चरणों में पर्यावरण की अच्छी स्थिति बरकरार रहने की संभावना कम ही है।

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विश्व पर्यावरण दिवस - फोटो : शिव हर्ष द्विवेदी।
दरअसल, लॉकडाउन से पहले गोरखपुर की हवा खतरनाक थी। वातावरण में पार्टीकुलेट मैटर (पीएम), सल्फर डाई आक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइडनुकसानदायक स्तर तक पहुंच गए थे।
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विश्व पर्यावरण दिवस - फोटो : शिव हर्ष द्विवेदी।
मार्च के अंतिम सप्ताह में लॉकडाउन हो गया। इससे औद्योगिक गतिविधियां ठप पड़ गईं। वाहनों का आवागमन लगभग ठप हो गया। इसी का नतीजा रहा कि रामगढ़ताल, राप्ती नदी, आमी नदी, रोहिन नदी, गोर्रा नदी और चिलुआताल का प्रदूषण कम हो गया। पानी में आक्सीजन की मात्रा बढ़ गई।

एमएमएमयूटी की तरफ से शहर के जिन तीन स्थानों पर प्रदूषण मापने की मशीन लगाई गई है, वहां की आबोहवा भी अच्छी मिली है। अब सांस लेने में दिक्कत नहीं महसूस हो रही है।
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विश्व पर्यावरण दिवस, डॉ. अश्विनी मिश्रा। - फोटो : अमर उजाला।
बीआरडी मेडिकल कालेज के चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. अश्विनी मिश्रा ने बताया कि हवा में प्रदूषण का स्तर बढ़ने की वजह से सबसे ज्यादा दिक्कत सांस संबंधी मरीजों को होती है। जो व्यक्ति दमा के मरीज हैं उनको और ज्यादा तकलीफ होने लगती है। ऐसे लोगों को बाहर निकलने से बचना चाहिए। साथ ही जो भी दवा ले रहे हैं उसे नियमित लेते रहना चाहिए।
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विश्व पर्यावरण दिवस, प्रो. गोविंद पांडेय। - फोटो : अमर उजाला।
एमएमएयूटी के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रो. गोविंद पांडेय ने बताया कि लॉकडाउन में औद्योगिक गतिविधियां, ट्रेन, हवाई जहाज, गाड़ियां, ईंट-भट्टा आदि पूरी तरह से बंद थे। तो  प्रकृति ने स्वत: शोधन किया। नदियों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

अनलॉक में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ी हैं। ट्रेन, हवाई जहाज, वाहनों का आवागमन फिर से शुरू हो गया। अब वातारण में प्रदूषण स्तर बढ़ता जाएगा। सबका कर्तव्य है कि प्रदूषण उत्सर्जन कम करें और पर्यावरण को सुरक्षित रखें।

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विश्व पर्यावरण दिवस, पर्यावरणविद व एमजी पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ सिराज वजीह। - फोटो : अमर उजाला।
पर्यावरणविद व एमजी पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ सिराज वजीह ने बताया कि वातावरण हो या नदियां, उनके प्रदूषण की मुख्य वजह औद्योगिक और वाहनों की गतिविधियां ही थी। ये आंकड़े सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए नीतियां बनाने में मददगार साबित हो सकती हैं।

70 के दशक में भी यह चर्चा उठी थी कि जो पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं उससे शुल्क लिया जाना चाहिए। अब इस पर विचार जरूरी है। अब अलग-अलग चरणों में छूट दी जा रही है। अगले दो महीने में प्रदूषण फिर से पुरानी स्थिति में आ सकता है।
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विश्व पर्यावरण दिवस, मौसम विशेषज्ञ कैलाश पांडेय। - फोटो : अमर उजाला।
कैलाश पांडेय गोरखपुर इनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप व सेवानिवृत्त मौसम विशेषज्ञ ने बताया कि मार्च के अंतिम सप्ताह, अप्रैल और मई में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम हुआ था। इससे वातावरण में आक्सीजन की मात्रा अच्छी हुई तो नुकसानदायक तत्वों की मात्रा कम हो गई।

लॉकडाउन से पहले जो एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 165 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर होता था, वह 75-100 के बीच आ गया। मेंढक का दिखना, गौरैया, बुलबुल और अन्य पक्षियों की चहचहाहट इसके उदाहरण हैं। यदि ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कम किया जाए तो वातावरण को शुद्ध और पर्यावरण को हरा भरा रखा जा सकता है।
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