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ज्ञान की बात: यहां कबीर दास ने खत्म किया था 12 वर्षों से पड़ा अकाल, गुरू गोरक्षनाथ ने पैर से दबाकर जमीन से निकाला था जल

Tue, 22 Jun 2021 04:54 PM IST
vivek shukla आफताब आलम अंसारी, मगहर (संतकबीरनगर)।
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संत कबीर दास और गुरू गोरक्षनाथ। - फोटो : अमर उजाला।
सद्गुरू कबीर की निर्वाण स्थली मगहर में कबीर की समाधि, मजार व गुफा स्थित है। वहीं सद्गुरू कबीर से जुड़ी गोरखपुर जिले की सीमा में कसरवल गांव के पास कबीर धूनी आश्रम व गोरख तलइया भी है, जहां कबीर, गुरु गोरखनाथ समेत कई संतों ने धूनी रमाई व तप किया था। कबीर चौरा मठ के महंत विचार दास बताते है कि सद्गुरू के जीवन की 119 वर्ष की अवधि बीत चुकी थी। महाराजाधिराज वीर देव सिंह बघेल की पंचवर्षीय व्रत प्रतिज्ञा भी पूरी हो गई थी। इस बीच यह समाचार मिला कि नवाब बिजली खान गोरखपुर (मगहर) से काशी आए हैं और वह कबीर दास से मिलना चाहते हैं।

कबीर साहेब ने उनसे यहां आने का कारण पूछा। नवाब ने उन्हें बताया कि उनके क्षेत्र में 12 वर्षों से लगातार अकाल पड़ रहा है। वर्षा नहीं हो रही है इसलिए अन्न जल का अभाव हो गया है, प्रजा भूखों मर रही है। यहां कबीर साहेब से आने का आग्रह किया, ताकि समस्याएं दूर हो जाए।
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मगहर सद्गुरु कबीर समाधि। - फोटो : अमर उजाला।
कबीर साहेब के गोरखपुर (मगहर) जाने की बात जब काशी के लोगों ने सुनी तो बड़ा विरोध हुआ। कहा गया जो काशी में मरता है, वह स्वर्ग में जाता है, जो मगहर में जाता है तो उसे नरक मिलता है, लेकिन कबीर साहेब बिना किसी परवाह के यहां आने की ठानी। कबीर साहेब ने काशी में शरीर नहीं त्यागने का निर्णय लिया और अंध विश्वास को दूर करने की कोशिश की। सुरसरि के तट पर नमन कर आमी नदी के तट पर मरने की बात की। जैसा कि इस दोहे से पता चलता है कि क्या "काशी क्या मगहर ऊसर, जो मैं हृदय राम बसै मोरा-जो काशी तन तजै कबीरा राम ही कौन निहोरा"। आगे बताया कि संत मंडली गोरखपुर (मगहर ) के लिए चल पड़ी। कबीर साहेब सर्वप्रथम यही आए, जहां धूनी है। जिसे कसरवल गांव के नाम से पुकारा जाता है और यहां पर गुरु कबीर का एक सूर्यमय मंदिर बना है।
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मगहर कबीर गुफा। - फोटो : अमर उजाला।
यहीं पर संत मंडली उतरी और राम धूनी में लग गई। इस स्थान पर सदगुरू कबीर ने नवाब बिजली खान को आदेश दिया कि यहां पर सर्व प्रथम संतों का एक भंडार कराए। उस भंडारे में गोरक्षनाथ पीठ के महंत गोरखनाथ जी भी आए थे। कबीर साहेब ने संतों के साथ तप किया और गुरु गोरखनाथ ने पैर से भूमि को दबाया और फिर जल स्रोत बाहर निकला और घनघोर बारिश हुई। उसके बाद अकाल समाप्त हो गया।  इस धूनी पर गोरख तलइया भी रही, जो आज विलुप्त हो गई है।

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मगहर। - फोटो : अमर उजाला।
कबीर धूनी आश्रम व गोरखतलैया का हो रहा विकास
सद्गुरू कबीर की निर्वाण स्थली मगहर कबीर चौरा परिसर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र व राज्य सरकार के जरिए विभिन्न विकास के कार्य कराए जा रहे है, वहीं सद्गुरू कबीर से जुड़ी गोरखपुर जिले के कसरवल ग्राम में स्थित कबीर धूनी आश्रम व विलुप्त हुई गोरख तलइया का निर्माण कार्य चल रहा है।
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Maghar - फोटो : अमर उजाला।
कंट्रक्शन कंपनी महाकाल एसोसिएट के अवर अभियंता पवन श्रीवास्तव ने बताया कि कबीर धूनी आश्रम परिसर में कुल 409.87 लाख की लागत से बिल्डिंग, विकास के विभिन्न कार्यों के अलावा गोरख तलइया का भी निर्माण हो रहा है। जिसे जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा।
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Maghar - फोटो : अमर उजाला।
सबसे पहले कबीर साहेब ने यहीं धूनी रमाई थी
कबीर धूनी आश्रम की 14 वर्षो से देखभाल कर रहे रामशरण दास ने बताया कि इस क्षेत्र में 12 वर्षों से लगातार अकाल पड़ा हुआ था।नवाब बिजली खान के आग्रह पर कबीर साहेब यहां आए, जहां तमाम संतों का समागम हुआ और सदगुरू कबीर सबसे पहले यहां आकर तमाम संतों के साथ धूनी रमाए।

भंडारे का आयोजन भी हुआ और सत्संग भी हुआ था। आज भी सप्ताह में एक दिन जरूर भंडारे का आयोजन होता रहता है। जिसमें संत, महात्मा, कबीर के अनुयायी व क्षेत्र के लोग भंडारे में पहुंचकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
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