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यूपी के इस दरगाह पर मुंशी प्रेमचंद चढ़ाते थे चादर, एक हजार साल पुराना है इसका इतिहास

Fri, 19 Feb 2021 02:34 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
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Mubarak Khan Shaheed Dargah - फोटो : अमर उजाला।
गोरखपुर शहर में स्थित किसी दरगाह का नाम लोगों के जहन में सबसे पहले आता है तो वह दरगाह मुबारक खां शहीद है। बेतियाहाता में स्थित इस दरगाह का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। इस दरगाह में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्म के लोगों की आस्था है। दरगाह से जुड़े लोग बताते हैं कि मुंशी प्रेमचंद में इस दरगाह को लेकर गहरी आस्था थी वह यहां चादर भी चढ़ाया करते थे। उन्होंने इसी दरगाह से प्रेरित होकर 'ईदगाह' पुस्तक लिखी। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें...
 
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Mubarak Khan Shaheed Dargah - फोटो : अमर उजाला।
कौन थे हजरत मुबारक खां
हजरत मुबारक खां हजरत सैयद सालार मसूद गाजी मियां अलैहिर्रहमां के खलीफा व मुरीदीन में से थे। गाजी मियां ने बुराईयों को खत्म करने के लिए उनको गोरखपुर भेजा। हक और बातिल की जंग में उन्होंने बहादुरी के साथ लड़ते-लड़ते करीब 29 साल की उम्र में शहादत का जाम पिया। यहां जुमेरात व नौचंदी जुमेरात को काफी भीड़ होती है।

 
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Mubarak Khan Shaheed Dargah - फोटो : अमर उजाला।
उनके साथ सगे भाइयों ने भी शहादत पाई। जिसमें एक भाई की मजार प्रेमचंद पार्क रोड बेतियाहाता स्थित दरगाह हजरत बाबा तबारक खां शहीद अलैहिर्रहमां के नाम से मशहूर है। जहां दो दिन उर्स-ए-पाक मनाया जाता है।

 

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Mubarak Khan Shaheed Dargah - फोटो : अमर उजाला।
अहमदनगर चक्शा हुसैन गोरखनाथ में हजरत बाबा जलालुद्दीन शाह का उर्स ग्यारहवीं शरीफ के दिन व हजरत बाबा मेराज शाह का उर्स ग्यारहवीं शरीफ के दो दिन पहले मनाया जाता है। यह दोनों बुजुर्ग हजरत मुबारक खां शहीद के साथी थे।

 
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Mubarak Khan Shaheed Dargah - फोटो : अमर उजाला।
उर्स पर लगता है मेला
ईद के चांद यानी शव्वाल माह की 26, 27, 28 को उर्स-ए-पाक मनाया जाता है। मेला लगता है। जिसमें हर मजहब के मानने वालों की शिरकत होती है। हजरत मुबारक खां शहीद पूर्वांचल के बड़ें औलिया-ए-किराम में शुमार होते है। आज भी इस दरगाह को आला मकाम हासिल है। दरगाह से सटे एक मस्जिद, ईदगाह, मदरसा व कई वलियों की मजारें हैं।
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