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नेपाल में मधेशी आंदोलन की गर्मी से चढ़ा सियासी पारा, लोगों ने कहा- 'हमसे भेदभाव नहीं चलेगा'

Thu, 02 Jul 2020 12:07 PM IST
vivek shukla संजय कुमार पांडेय, महराजगंज।
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Indo nepal border - फोटो : अमर उजाला।
नेपाल में मधेशी समुदाय के आंदोलन की गर्मी से सियासी पारा चढ़ गया है। इन दिनों नेपाल के मधेशी बाहुल क्षेत्र में हर रोज नए नागरिकता विधेयक को लेकर आंदोलन किया जा रहा है। मधेशी समुदाय का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। मधेशी समुदाय आंदोलन के माध्यम से अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने में जुटा है। लेकिन अभी तक उनकी मांगों पर विचार नहीं हुआ है। मधेशियों के मुताबिक नए नागरिकता कानून से मुश्किल हो जाएगी।
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indo-nepal border - फोटो : अमर उजाला।
मधेशी समुदाय के आंदोलन पर नजर डाले तो करीब 20 साल पहले दोहरे व्यवहार को लेकर आंदोलन किया गया था। मधेशी समुदाय को मलाल है कि उनके साथ हर जगह भेदभाव किया गया। चाहे नागरिकता की बात हो या भाषा, पहनावा को लेकर नेपाल में उनकी पहचान नहीं बन पाई। रूपनदेही, नवलपरासी, कपिलवस्तु, दांग, बाके, बर्दिया, कैलाली, बीरगंज, सर्लाही, सुनसरी, मोरंग समेत 22 जिलों में आंदोलन तेज है। मधेशी समुदाय के लोग समय-समय पर सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं। नेपाल की सदन में 33 सांसद मधेशी हैं, लेकिन उनकी मांगो पर विचार नहीं हो रहा है। राजेन्द्र महतो, महंथ ठाकुर, उपेंद्र यादव, महेंद्र यादव, राजेन्द्र कुमार आदि प्रमुख मधेशी नेता हैं। मधेशी आंदोलन को गति देने के लिए यह सभी नेता जुटे हैं।
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indo-nepal border - फोटो : अमर उजाला।
वरिष्ठ नेता महेंद्र यादव ने बताया कि अंगीकृत नागरिकता और वंशज की नागरिकता के बाद भी विदेशी बताकर मधेशी समुदाय के हजारों लोगों की नागरिकता रोक दी गई और जो बच्चे नेपाल में पैदा हुए उनकी भी नागरिकता नहीं बन रही है। मधेशियों के राजनीति में आने के बाद भी नागरिकता के साथ भाषा, संस्कृत, पहनावा को लेकर आज भी लड़ाई जारी है।

 

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indo-nepal border - फोटो : अमर उजाला।
मधेशियों ने कब किया आंदोलन
राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी रूपनदेही जिलाध्यक्ष अजय वर्मा ने बताया कि राजशाही को हटाने के लिए मधेशी समुदाय ने वर्ष 1998 में माओवादियों से हाथ मिलाया और जंगल से लेकर सड़क तक राजशाही के खिलाफ हथियार उठा कर पूरे नेपाल में नाकाबंदी कर दी थी। राजशाही समाप्त तो हो गई लेकिन हम लोग वहीं रह गए। पूर्व मंत्री गुलजारी यादव ने बताया कि वर्ष 2015 में संविधान बनने के बाद हम लोगों के अधिकार को संविधान से बाहर कर दिया गया जिसको लेकर करीब चार माह वृहद आंदोलन करने के बाद सरकार ने वार्ता कर फिर वादे से मुकर गई।
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indo-nepal border - फोटो : अमर उजाला।
उन्होंने बताया कि अंतरिम संविधान में मधेश बाहुल क्षेत्र को अलग कर मधेशियों की जनसंख्या कम करते हुए पहाड़ से जोड़कर एक अलग राज्य बनाया गया, जिसमें हम लोगों की भागीदारी नगण्य हो गई। भैरहवां विधायक संतोष पांडेय ने बताया कि 2019 में नागरिकता को लेकर एक बार आंदोलन किया गया था। जिसे सरकार ने मान कर रोक लगा दी थी। फिर उसी नागरिकता कानून को लेकर 2020 में लागू करने जा रही है। जिसे हम स्वीकार नहीं करेंगे।

नेपाल की प्रमुख मधेशी पार्टियां
नेपाल में मधेशियों एक बार फिर आक्रोश में हैं। तराई मधेश लोकतांत्रिक पार्टी, संघीय समाजवादी फोरम, तराई मधेश सदभावना पार्टी, रापापा, मधेशी जनाधिकार फोरम,  जनता समाजवादी, मधेशी मोर्चा एवं सद्भावना पार्टी, संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा नेपाली की प्रमुख मधेशी पार्टियां हैं।
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