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इस मंदिर में ब्रिटिश हुकूमत के अंग्रेज अफसर आते थे मत्था टेकने, इसका इतिहास जानकर हो जाएंगे हैरान

Sun, 31 May 2020 08:30 AM IST
vivek shukla गुफरान अहमद, सिसवा बाजार।
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MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
उत्तर प्रदेश महराजगंज क्षेत्र के बड़हरा महंत गांव में 234 वर्ष पूर्व स्थापित भगवान जगन्नाथ का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर में श्रावण शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिवसीय चलने वाला झूलोत्सव व रथ यात्रा में शामिल होने व भगवान के दर्शन करने के लिए दूर दराज से श्रद्धालु आते हैं।
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MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
इस प्राचीन मठ की ऐतिहासिक महत्ता इतिहास के पन्नों में दर्ज है। ब्रिटिश हुकूमत में जब किसी अंग्रेज अधिकारी की तैनाती गोरखपुर क्षेत्र में होती थी तो वह अधिकारी सर्वप्रथम मान्यता के अनुसार इस मंदिर में आकर मत्था टेकते थे। उसके बाद ही अपना कार्य आरंभ करते थे।

मान्यता है कि 234 वर्ष पूर्व जगन्नाथ पुरी ओडिशा से वैष्णव रामानुज दास अपने शिष्यों के साथ नारायण मूर्ति धाम नेपाल जा रहे थे। उन्हें थकान हुई तो बड़हरा महंथ गांव में विश्राम के लिए रुके। रात्रि विश्राम के दौरान भगवान जगन्नाथ ने उन्हें सपने में दर्शन दिया और कहा कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन से मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है। ऐसे में इस स्थान पर मंदिर की स्थापना करो, जिससे क्षेत्र का कल्याण होगा।
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MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
बड़हरामठ के मठाधीश महंत संकर्षण रामानुज दास ने बताया कि इन दिनों कोरोना के वजह से श्रद्धालु नहीं आ रहे हैं। 234 साल में पहली बार मंदिर श्रद्धालुओं के लिए बंद है। पुजारी के द्वारा हर रोज महाआरती होती है। इस मंदिर का इतिहास ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है। ईश्वर से प्रार्थना है कि देश को कोरोना से मुक्त करें। सभी लोग स्वस्थ एवं सुखी हो। महाआरती में हर रोज ऐसी ही मंगलकामनां की जाती है।

वर्ष 1786 चैत्र मास में स्थापित हुआ था मंदिर
ओडिशा से आने वाले रामानुज दास ने वर्ष 1786 में मंदिर को स्थापित कराया। उस समय यह क्षेत्र पड़ोसी राष्ट्र नेपाल के अधीन होने के साथ दुर्गम और काफी भयावह था। स्वप्न में भगवान के दर्शन के बाद इसे पवित्र स्थल मानकर जब रामानुज दास यहां तपस्या में लीन हो गए तो इसकी जानकारी निचलौल के राजा महादत्त सेन को हुई। राजा ने स्वयं आकर रामानुज का दर्शन किए।

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MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
मंदिर में तमाम उत्सव मनाए जाते
मंदिर में चंदन यात्रा, स्वान यात्रा, रथ यात्रा, झूलनोत्सव, विजयादशमी, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, श्री राम जन्मोत्सव, वामन जयंती आदि उत्सव मनाए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ की भव्य प्रतिमा को मंदिर के गर्भगृह में मखमली रेशमी वस्त्रों, आभूषणों, चांदी की रत्नजड़ित सिंहासन पर रखा गया है। पूजा-अर्चना व आरती के बाद प्रत्येक दिन मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। लेकिन इन दिनों कोरोना के वजह से मंदिर श्रद्धालुओं के लिए बंद है।

हर रोज होती महाआरती
प्रत्येक दिन मठाधीश व पुजारियों द्वारा रात्रि 8 बजे शंखनाद, घंटे व नगाड़े के बीच महाआरती की जाती है। जिसमें समूचा गांव भगवान जगन्नाथ की भक्ति में लीन हो जाता है। पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ की नीलाद्रि पद्धति से विशेष पूजा व आरती होती है।
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MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
आसपास के जिलो से आते हैं श्रद्धालु
सावन माह में झूलोत्सव का आयोजन होता है। पांच दिन तक मंदिर परिसर में मेला चलता है। इस बीच जिले से ही नहीं गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, सिद्धार्थनगर, वाराणसी आदि जिलों से श्रद्धालु मेला देखने के लिए आते हैं। पांच दिनों तक रात्रि में प्रवचन व रेडियो, दूरदर्शन कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं।

अनुष्ठान के बाद हुई थी बारिश
बुजुर्ग बताते हैं कि वर्ष 1932 में क्षेत्र में बरसात न होने के कारण फसल सूख गई थी। क्षेत्र के लोग मठ के छठवें मठाधीश नारायण रामानुज दास के शरण में आए। उनकी विनती पर महंत ने भगवान के गर्भगृह के समक्ष अन्न जल त्याग कर अनुष्ठान पर बैठ गए। अनुष्ठान के तीसरे दिन बरसात हुई और कुछ दिन में चारों ओर हरियाली छा गई।

मुराद पूरी हुई तो कमरा बनवाया
करीब 100 वर्ष रहने घुघली क्षेत्र के भरवलिया निवासी भुलाई मिश्र ने यहां आकर भगवान जगन्नाथ की पूजा अर्चना की। इसके बाद उनके घर पुत्र पैदा हुआ। उन्होंने मंदिर में ही एक कमरे का निर्माण करवाया था।
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