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Exclusive: 72 करोड़ पुस्तकों का प्रकाशन कर चुका है गीता प्रेस, करोड़ों में प्रकाशित हुई हैं ये पुस्तकें

Fri, 17 Sep 2021 04:04 PM IST
vivek shukla अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
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गीता प्रेस गोरखपुर। - फोटो : अमर उजाला।
दुनिया भर में धार्मिक पुस्तकों के लिए प्रसिद्ध गीता प्रेस से अब तक लगभग 72 करोड़ से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। इन पुस्तकों में सर्वाधिक संख्या 15 करोड़ 60 लाख श्रीमद्भागवत गीता की है। इसके अलावा रामचरित मानस, पुराणों, हनुमान चालीसा, दुर्गा सप्तशती, सुंदरकांड की भी संख्या करोड़ों में है।

वर्ष 1921 के आसपास जयदयाल गोयंदका ने कोलकाता में गोविंद भवन ट्रस्ट की स्थापना की थी। इसी ट्रस्ट के तहत वहीं से वह गीता का प्रकाशन कराते थे। पुस्तक में कोई त्रुटि न हो इसके लिए प्रेस को कई बार संशोधन करना पड़ता था। प्रेस मालिक ने एक दिन कहा कि इतनी शुद्ध गीता प्रकाशित करवानी है तो अपना प्रेस लगा लीजिए। गोयंदका ने इस कार्य के लिए गोरखपुर को चुना। 1923 में उर्दू बाजार में दस रुपये महीने के किराए पर एक कमरा लिया गया और वहीं से शुरू हुआ गीता का प्रकाशन। धीरे-धीरे गीताप्रेस का निर्माण हुआ और इसकी वजह से पूरे विश्व में गोरखपुर को एक अलग पहचान मिली।

15 भाषाओं में होता है पुस्तकों का प्रकाशन
गीता प्रेस के उत्पाद प्रबंधन लालमणि तिवारी ने बताया कि गीताप्रेस से 15 भाषाओं में पुस्तकों का प्रकाशन होता है। इनमें हिंदी, संस्कृत, बंगला, मराठी, गुजराती, तमिल, कन्नड़, असमिया, उड़िया, उर्दू, तेलगू, मलयालम, पंजाबी, अंग्रेजी, नेपाल भाषाएं शामिल हैं।
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गीता प्रेस गोरखपुर। - फोटो : अमर उजाला।
करोड़ों में प्रकाशित हुई हैं ये पुस्तकें
  • श्रीमद्भगवतगीता - 15 करोड़ 58 लाख
  • रामचरित मासन  एवं तुलसी साहित्य - 11 करोड़ 39 लाख
  • पुराण, उपनिषद् आदि ग्रंथ - दो करोड़ 61 लाख
  • महिलाओं एवं बालकोपयोगी पुस्तकें - 11 करोड़ छह लाख
  • भक्त चरित्र एवं भजनमाला - 17 करोड़ 40 लाख
  • अन्य प्रकाशन - 13 करोड़ 73 लाख
  • कुल - 71 करोड़ 77 लाख

 
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गीता प्रेस गोरखपुर। - फोटो : अमर उजाला।
गीता प्रेस का मुख्य द्वार पर होते हैं कई तीर्थों के दर्शन
गीता प्रेस के मुख्य द्वार पर कई तीर्थों के दर्शन एक साथ हो जाते हैं। दुनिया में ऐसा कोई दूसरा द्वार नहीं है जिसमें एक साथ इतने तीर्थों के दर्शन हो सके। चारों दिशाओं से यह द्वार अनूठा दिखता है। गीता प्रेस के मुख्य द्वार पर हिंदू के साथ बौद्ध, जैन एवं सिख धर्मों के पूजा स्थलों का समावेश है। जो लोग गीता प्रेस आते हैं वह इसके मुख्य द्वार के सामने शीश नवाना नहीं भूलते हैं।

 

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गोरखपुर गीता प्रेस। - फोटो : अमर उजाला।
खास है गीता प्रेस का लीला चित्र मंदिर
गीता प्रेस में स्थित लीलाचित्र मंदिर के जैसा मंदिर पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। यहां श्रीमद्भागवत गीता के 18 अध्याय दीवारों पर लिखे गए हैं। यहां बीके मित्रा, जगन्नाथ और भगवानदास द्वारा बनाए गए देवी-देवताओं के 700 से अधिक चित्र हैं। इनकी सुंदरता देखकर मन प्रफुल्लित हो उठता है। लीला चित्र मंदिर एवं गीता प्रेस के प्रवेश द्वार का लोकार्पण तत्कालिन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 29 अप्रैल 1955 में किया था।

 
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गीताप्रेस की मासिक पत्रिका कल्याण। - फोटो : अमर उजाला
ऐसे हुई कल्याण की शुरुआत, छप चुकी हैं 16.50 लाख प्रतियां
गीता प्रेस के उत्पाद प्रबंधक लालमणि तिवारी ने बताया कि दिल्ली में अप्रैल 1926 में आयोजित मारवाड़ी अग्रवाल सभा के आठवें अधिवेशन में घनश्यामदास बिड़ला ने भाईजी को अपने विचारों व सिद्धांतों पर आधारित एक पत्रिका निकालने की सलाह दी। गीताप्रेस के संस्थापक सेठजी जयदयाल गोयंदका की सहमति से 22 अप्रैल 1926 को पत्रिका का नाम कल्याण निश्चित हुआ। इसी वर्ष भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के संपादकत्व में कल्याण का प्रथम साधारण अंक मुंबई से प्रकाशित हुआ। दूसरे वर्ष कल्याण का प्रथम विशेषांक भगवन्नामांक गोरखपुर से प्रकाशित हुआ। तभी से कल्याण का प्रकाशन गीताप्रेस से हो रहा है। अबतक गीताप्रेस से कल्याण की 16 करोड़ 50 लाख से अधिक प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। जो पूरे विश्व में प्रत्येक माह पहुंचाई जाती है।

गीता प्रेस के उत्पाद प्रबंधक लालमणि तिवारी ने कहा कि कम दामों में शुद्ध और सरल भाषा में गीता को घर-घर पहुंचाने के लिए गीता प्रेस की स्थापना हुई थी। इसी उद्देश्य के साथ आज भी गीता प्रेस से गीता के साथ ही अन्य धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन कर लागत से कम मूल्य पर लोगों को धार्मिक पुस्तकें उपलब्ध करा रहा है।


 
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