कोरोना महामारी का प्रकोप इस कदर छाया हुआ है कि अन्य रोगों के गंभीर मरीजों को सरकारी और निजी अस्पतालों में जगह नहीं मिल पा रही है। ऐसे कई नॉन कोविड मरीज समय पर और पर्याप्त इलाज नहीं मिलने के कारण जीवन की आस छोड़ रहे हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
केस एक
आजाद नगर निवासी मो. आवेश की 16 वर्षीय बेटी के रक्त में शर्करा की मात्रा 550 से अधिक पहुंच गई। एक्यूट रीनल फेल्यर (गुर्दे का अस्थायी रूप से काम बंद करना) की समस्या हुई। निजी अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन कहीं भी बेड खाली नहीं मिला। पर्याप्त इलाज नहीं मिलने से 25 अप्रैल को किशोरी की मौत हो गई।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
केस दो
पिपरा बसंत गोपालपुर निवासी देवेंद्र उपाध्याय (60) गुर्दे के गंभीर रोग से जूझ रहे थे। सोमवार को डायलिसिस कराने के लिए पहुंचे। कोरोना मरीजों के कारण सरकारी और निजी अस्पतालों में उन्हें बेड नहीं मिल सका। विश्वविद्यालय चौराहे के पास परिजनों के सामने तड़प कर उन्होंने दम तोड़ दिया।
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कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : PTI
कोविड 19 की दूसरी लहर काफी घातक साबित हो रही है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन के प्रभारी डॉ. अरुण बताते हैं कि जनवरी 2021 तक सिर्फ इक्का-दुक्का ही मरीज आ रहे थे। इसके बाद अचानक ही मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। अचानक बढ़े मरीजों को इलाज मुहैया कराने के उद्देश्य से जिला और स्वास्थ्य प्रशासन ने सरकारी और निजी अस्पतालों में कोविड सेंटर बनाए।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : pixabay
शहर में करीब तीस निजी अस्पतालों के आईसीयू, वेंटिलेटर सहित आधुनिक चिकित्सायुक्त बेड कोविड मरीजों के लिए सुरक्षित कर दिए गए। अब हाल यह है कि मरीजों की संख्या इतनी अधिक है कि ये बेड खाली नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में नॉन कोविड बीमारियों से जूझ रहे गंभीर मरीजों को इन अस्पतालों में जगह नहीं मिल पा रही है।
स्वास्थ्य मामलों के जानकार बताते हैं कि कई केस ऐसे भी आए कि बेड उपलब्ध होने के बावजूद उन्हें इसलिए नहीं भर्ती किया गया, क्योंकि उनकी कोविड जांच रिपोर्ट नहीं आई थी। कई की जांच कराई गई, लेकिन रिपोर्ट आने तक वह जिंदा नहीं रह सके। इसकी वजह जिले में कोविड मरीजों की बढ़ना है। अस्पताल प्रशासन कोविड मरीजों के इलाज को ही प्राथमिकता दे रहे हैं।