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Exclusive: साक्ष्यों के अभाव में कहीं कमजोर न पड़ जाए मनीष हत्याकांड की जांच, एसआईटी की लापरवाही है या पुलिसिया भाईचारा

Mon, 25 Oct 2021 10:29 AM IST
vivek shukla रोहित सिंह, गोरखपुर।

सार

अचेत मनीष को नीचे लाते वक्त उसकी चोट से अंदाजा लगाना आसान है कि कपड़ों पर खून के छींटे जरूर आए होंगे, साक्ष्य संकलन के लिए आरोपितों की कस्टडी रिमांड तक नहीं मांगी।
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मनीष गुप्ता हत्याकांड - फोटो : amar ujala
गोरखपुर जिले में साक्ष्यों के अभाव में कहीं मनीष गुप्ता हत्याकांड के आरोपियों के ट्रायल के दौरान अदालत से राहत न पा जाएं। अभी तक जो तथ्य सामने आए हैं उसके मुताबिक केस में साक्ष्य संकलन का स्तर बेहद कमजोर है। जानकार हैरत जताते हैं कि हत्या के दौरान पहने गए कपड़े, वारदात में इस्तेमाल हथियार आदि रिकवर करने के लिए आरोपियों को कस्टडी रिमांड पर लेने की जरूरत एसआईटी ने नहीं समझी।

इस संबंध में कचहरी में अधिवक्ताओं के बीच खासी चर्चा है कि यह एसआईटी की लापरवाही है या पुलिसिया भाईचारा? अधिवक्ताओं का कहना है कि ऐसा न हो कि एसआईटी की ढिलाई आरोपियों को केस में फायदा पहुंचा दे।

जानकारी के मुताबिक 14 दिन की न्यायिक हिरासत पूरी होने और पेशी के दौरान भी एसआईटी की तरफ से पुलिस कस्टडी रिमांड नहीं मांगा गया। जब कस्डटी रिमांड नहीं मांगा तो घटना के मुख्य व सहयोगी आरोपियों की मौजूदगी में मौका-ए-वारदात पर सीन री-क्रिएट कैसे कराते? आगे की स्लाइड्स में पढ़ें पूरी खबर...
 
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मनीष गुप्ता हत्याकांड - फोटो : amar ujala
मामले में आरोपी सभी पुलिस कर्मियों की गिरफ्तारी के बाद मामला शांत हो गया है। एसआईटी की टीम घटना के तीन दिन बाद से लगातार शहर में है। दो दिन पहले वीडियो कांफ्रेंसिंग से आरोपी पुलिस कर्मियों की कोर्ट में पेशी भी हो गई, लेकिन किसी आरोपी के रिमांड पर लेने की सूचना नहीं आ सकी। जानकार सवाल उठा रहे हैं कि अगर आरोपियों को रिमांड पर नहीं लिया तो घटना के वक्त मौजूद साक्ष्य एसआईटी को कहां से मिलेंगे? अगर गिरफ्तारी के वक्त एसआईटी की टीम ने उक्त सामानों की जानकारी ली भी होगी तो उसकी बरामदी और उल्लेख में इतना वक्त क्यों लगा रहा है? जिला एवं सत्र न्यायालय के अधिवक्ताओं का कहना है कि घटना के दौरान पहने गए पुलिसकर्मियों के कपड़े, जूते मोजे, बंदूक सबसे बड़े साक्ष्य हैं।

 
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मनीष हत्याकांड: सीसीटीवी में कैद हुए हत्यारोपी पुलिस। - फोटो : अमर उजाला।
फोटो और वीडियो में दिख रही घटना व पोस्टमार्टम रिपोर्ट में एंटीमॉर्टम चोट के जिक्र से साफ है कि मनीष को काफी गंभीर चोट लगी थी। मनीष के खून के छीटें भी आरोपियों की वर्दी पर या जूते -मोजे पर पड़े होंगे। एसआईटी की टीम ने होटल में खून वाली जगह को तो चिह्नित कर जांच में रखा है, लेकिन इन सबसे अहम कड़ियों को सामने नहीं ला सकी है।

वहीं, मनीष गुप्ता के रिश्तेदारों ने घटना वाले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखने के बाद मनीष को बंदूक की बट से मारने का आरोप लगाया था। ऐसे में तत्कालीन इंस्पेक्टर जेएन सिंह के हमराही के पास मौजूद एसएलआर की बरामदगी भी जरूरी है। अगर उसी एसएलआर से मारा गया होगा तो उस पर भी मनीष के खून और शरीर के चमड़े के निशान जरूर आए होंगे। ऐसे में मामले की तफ्तीश में एसएलआर भी अहम कड़ी हो सकती है।

 

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मनीष हत्याकांड की जांच करती एसआईटी। - फोटो : अमर उजाला।
गिरफ्तारी और पूछताछ को हो गई, लेकिन सीन री-क्रिएट नहीं कराया
घटना के वक्त जो बातें सामने आईं, उसके मुताबिक तत्कालीन इंस्पेक्टर जगत नारायण सिंह एंड कंपनी ने मनीष को होटल से रात 12:11 बजे नीचे लाती है। 12:36 बजे मनीष को मानसी अस्पताल लेकर जाती है। अस्पताल का स्टाफ मनीष को भर्ती करने से मना देता है। इस सब में करीब 10 मिनट का समय लग जाता है। सीसीटीवी में ये बातें साफ दिखती हैं।

इसके बाद रामगढ़ताल थाने के तत्कालीन रात्रि इंचार्ज व दरोगा अजय राय ने बताया था कि उन्हें 1:12 बजे रात में ही थाने से फोन आया था। रात 1:40 बजे वह थाने पहुंच कर वहां से दो-तीन मिनट बाद मेडिकल कॉलेज के लिए निकल गए थे। रात 2:05 बजे मनीष को मेडिकल कॉलेज लेकर पुलिस की टीम पहुंचती है। पूरे घटनाक्रम का सीन री-क्रिएट पुलिस वालों के साथ करना क्या जरूरी नहीं था? होटल के कमरे के अंदर आखिर क्या बात हुई थी? अगर आरोपी पुलिसकर्मियों की मान लें और मनीष बिस्तर से गिरा तो उस समय होटल के कमरे के अंदर दृश्य क्या रहा होगा?

 
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मनीष हत्याकांड के आरोपी। - फोटो : अमर उजाला।
पुलिस टीम द्वारा कमरे की जांच के दौरान एक फोटो सामने लाई जाती है, जिसमें मनीष हाफ पैंट और टीशर्ट पहने हैं, जबकि थोड़ी देर बाद ही अचेत मनीष सिर्फ अंडरवियर में दिखते हैं? सवाल है कि अगर खुद गिरा तो हाफ पैंट कहां चला गया? क्या एसआईटी की टीम को आरोपितों के साथ घटनास्थल पर जाकर पूरी घटना नहीं समझनी चाहिए थी? इस संबंध में एसआईटी प्रभारी आनंद प्रकाश तिवारी (एडीशनल सीपी) से सवाल किया गया तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

एसआईटी ने होटल स्टाफ के साथ सीन री-क्रिएट किया था
एसआईटी की टीम जिस दिन गोरखपुर जांच के लिए आई थी, उसी दिन होटल में जाकर सीन री-क्रिएट किया था। अस्पताल और मेडिकल कॉलेज जाकर भी सीन री-क्रिएट किया था, लेकिन आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ। गिरफ्तारी के बाद सभी आरोपियों से थाने पर ही एसआईटी की टीम ने घंटों पूछताछ जरूर की थी।

 
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मनीष गुप्ता हत्याकांड के मामले में जांच करती एसआईटी। - फोटो : अमर उजाला।
...फिर तो लाभ आरोपियों के पक्ष में ही जाएगा
किसी भी मामले में पुलिस को पूरी घटना से संबंधित साक्ष्यों के संकलन के लिए मजिस्ट्रेट के सामने पत्र के माध्यम से पुलिस कस्टडी रिमांड (पीसीआर) के लिए आवेदन करना होता है। न्यायालय अपनी समझ के आधार पर रिमांड देती है या आगे का समय निर्धारित कर देती है। इस मामले में वारदात के वक्त पहनी गई पुलिस की वर्दी एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है।

गिरफ्तारी के बाद कोर्ट में पेश करने के दौरान लिखित में इन साक्ष्यों के दिखाया गया है कि नहीं? जैसे, आरोपियों ने वर्दी कहां छुपाई या कहां है? हमराही की एसएलआर इतने दिनों तक कहां है? यह सब महत्वपूर्ण तथ्य हैं और तफ्तीश में इनकी उपेक्षा की गई तो कोर्ट में केस मजबूती से रख पाना संभव नहीं होगा और इसका लाभ अभियुक्तों के पक्ष में जाएगा।
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