हम और आप सुरक्षित रहें, यही उनका ध्येय है। उन्होंने अपनी ममता को ही लॉकडाउन कर दिया है। कोई अपने दुधमुंहे बच्चे से दूर है तो कोई अपने बच्चों के सवालों का जवाब नहीं दे पा रहीं। मम्मी तुम कहां हो, क्यों घर जल्दी नहीं आतीं? ये सवाल इन दिनों आम हो चुके हैं पर इन सबको छोड़ वे ड्यूटी पर डटीं हैं।
उनका मकसद लॉकडाउन की लक्ष्मण रेखा का पालन कराके सबको सुरक्षित रखना है। हम बात कर रहे हैं खाकी वर्दी वाली महिला कोरोना योद्धाओं की। इनका साथ देने के लिए हमें भी कुछ करना चाहिए। सही मायने में उनकी मदद हो भी सकती है, अगर हम ईमानदारी से लॉकडाउन का पालन करें, घरों में रहें । फिर तो इनकी ड्यूटी अपने-आप थोड़ा आसान बन जाएगी।
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महिला थाने की प्रभारी इंस्पेक्टर अर्चना सिंह।
- फोटो : अमर उजाला।
बच्चों को लगता है मम्मी बदल गईं, अब प्यार नहीं करतीं
महिला थाने की प्रभारी इंस्पेक्टर अर्चना सिंह के दो बच्चे आठ साल का अभिराज सिंह और पांच साल की बिटिया आन्या सिंह हैं। दोनों घर पर सोए होते हैं, तभी वे निकल जाती हैं। सुबह से ही लॉकडाउन का पालन कराना, फिर जरूरतमंदों के बीच भोजन पहुंचाने की जिम्मेदारी के बीच बच्चों की याद आती है, लेकिन फर्ज के आगे सब कुछ भूल जाता है।
यह पूछने पर कि बच्चों से कैसे बात करती हैं, इस पर अर्चना गंभीर हो जाती हैं। वह कहती हैं कि एक दिन बिटिया ने तपाक से बोल दिया कि मम्मी आप मुझे भूल गई हो, हम लोगों को प्यार ही नहीं करती। पहले तो शाम को आइसक्रीम, चाकलेट लेकर आती थी अब वो भी नहीं।
बच्चों की देखभाल पति ही कर रहे हैं। कोशिश यही है कि बच्चे तो समझ जाएंगे, मगर समाज में कोई भूखा ना रहे और बीमारी को फैलने से रोकने की जो जिम्मेदारी मिली है उसका ईमानदारी से निर्वहन कर सकूं।
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रंजू मिश्रा।
- फोटो : अमर उजाला।
खुद के बच्चे से दूर हूं क्योंकि बहुत से बच्चे बाहर खोजते हैं
महिला प्रकोष्ठ में तैनात रंजू मिश्रा की तीन साल की बच्ची प्रान्वी है। पहले तो सुबह उठते ही उसकी जिम्मेदारी थी, जो अब घरवालों के हवाले है। उसके उठने से पहले ही ड्यूटी पर चली जाती हूं। वह कहती हैं कि थोड़ा दर्द जरूर होता है, मगर ड्यूटी पर पहुंचने के बाद सब भूल जाती हूं।
जब भोजन के साथ जरूरतमंदों के पास जाती हूं तो लगता है कि इनको पुलिस की ज्यादा जरूरत है। अगर ड्यूटी नहीं की गई तो तमाम जरूरतमंदों को मदद नहीं मिल सकेगी। बेटी का ख्याल घर वाले रखते हैं। ड्यूटी के बाद घर जाती हूं तो कोशिश यही रहती है कि बेटी या फिर परिवार का कोई सदस्य आसपास न आए।
यह चुनौती बड़ी है, लेकिन पहला कर्तव्य देश और समाज सेवा है। कोरोना की चुनौती से निपटने में जितना हो सकता है, उतना योगदान सबको देना चाहिए।
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उमा देवी।
- फोटो : अमर उजाला।
जुड़वां बच्चे एक साथ ही पास आना चाहते हैं
महिला थाने में तैनात उमा देवी के पांच साल के जुड़वां बच्चे हैं। अनमोल और अभिमान। दोनों एक साथ ही बात करना चाहते हैं। पास भी आना चाहते हैं, लेकिन चाहकर भी उनके करीब नहीं जा पाती हैं। वह कहती हैं कि एक दिन जैसे ही ड्यूटी पर आई, पति का फोन आ गया।
वह बोले की बच्चे बात करना चाहते हैं। दोनों बोल पड़े कि अभी मिलना है और जहां हो बता दो, पापा के साथ आ जाएंगे। यह सुनते ही आंख नम हो गई। मां की ममता भी जागी, लेकिन फर्ज निभाने की मजबूरी सामने खड़ी थी। फर्ज को चुना और ड्यूटी करने लगी। बच्चों को किसी तरह से समझाया। इस महामारी में तमाम परिवार ऐसे हैं, जिनके बच्चों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी पुलिस की है।
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रीना उपाध्याय।
- फोटो : अमर उजाला।
मेरे लिए तड़पता है बच्चा
सिपाही रीना उपाध्याय की तीन साल की बेटी राधा और एक साल का दुधमुंहा बच्चा है। बच्चे को ऊपर का दूध पीने की आदत नहीं थी, मगर ड्यूटी के आगे इसे छुड़वाना पड़ा। अब वह बाहर का दूध ही पीता है। रीना चाहकर भी उसे गोद में नहीं लेती हैं।
वह कहती हैं कि एक घर में बच्चों से अलग रहना बहुत कठिन होता है, लेकिन यह त्याग उनकी, परिवार की सुरक्षा के लिए है। जब ड्यूटी से रात में घर जाती हूं तो बच्चों के पास जाने से डर लगता है। लगता है कि बाहर ड्यूटी की है। जगह-जगह गए हैं।
कहीं कोई दिक्कत हुई तो परिवार परेशान होगा। घर में घुसते ही हाथ की सफाई और नियमों का पालन कर उसके पास जाना होता है। कई दिन बच्चा एकदम मेरे पास आने के लिए तड़प जाता है, लेकिन फर्ज के आगे उसका दर्द भूल जाती हूं।
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संगीता सिंह।
- फोटो : अमर उजाला।
नाराज बच्चों ने बॉय-बॉय करना छोड़ा
महिला थाने में तैनात संगीता सिंह की दो बेटियां तीन साल की प्रिया सिंह, हर्षिता सिंह और पांच साल का बेटा आदित्य है। सब इस तरह से नाराज हैं कि अब वह घर से निकलने पर बॉय-बॉय भी नहीं बोलना चाहते हैं। वह खुद को क्वारंटीन करके रखती हैं, क्योंकि रोजाना बाहर आना होता है।
वह कहती हैं कि बच्चों से दूरी बनाकर रखती हूं। रात में घर जाने पर भी बच्चों के करीब नहीं जाती हूं। बच्चों को यही लगता है कि मां बदल गई है और वह प्यार नहीं करती है। उन मासूमों को अभी इतनी समझ नहीं है कि ड्यूटी, फर्ज के साथ ही उनके पास ना आना मजबूरी है। हां, इतना सुकून है कि रोज सबको अपनी आंखों से देख लेती हूं।
एक साल की बच्ची को छोड़कर आती हूं
सिपाही आसिया बेगम के दो बच्चे हैं। छह साल का रिशु तो तब भी समझ जाता है मगर एक साल की दूधमुंही फ्रूटी नहीं समझती है। घर से निकलते ही वह दहाड़ें मारकर रोती है। उसे किसी तरह से छोड़कर आती हैं। वह कहती हैं कि महामारी ने सब कुछ बदल दिया है।
अब ड्यूटी और जरूरतमंदों की मदद ही याद रहती है। बच्चों से दूरी बनाए रखना ही ठीक है। कोरोना संक्रामक बीमारी है। एक से दूसरे व्यक्ति के पास पहुंचती है। बच्चों की देखभाल परिवार के लोग कर लेते हैं। पहली चुनौती इस बड़े संकट से निपटना है। खाकी वर्दी का फर्ज अदा करना है। अब बच्चे भी मेरे बगैर रहना सीख रहे हैं।