भगवान बुद्ध की धरा भी अफगानिस्तान में दोबारा तालिबान शासन और मानवता पर क्रूरतम प्रहार से आहत है। दो दशक पूर्व तालिबानियों ने जो जख्म दिया था, वह फिर से हरा हो गया है। तथागत की माटी के लोग भी इस दर्द को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं।
बुद्ध विद्यापीठ महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. भारत भूषण द्विवेदी बताते हैं कि अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से महज 150 किमी दूर स्थित बामियान घाटी में पांचवीं एवं छठीं शताब्दी में कुषाणों ने दो विशाल बौद्ध प्रतिमाओं का निर्माण कराया था। करीब 1500 वर्षों तक प्रकृति के थपेड़ों को भी झेलकर ये प्रतिमाएं पूरी दुनिया को मानवता का संदेश दे रही थीं। मार्च 2001 में तालिबानियों ने इनको जमींदोज कर दिया था।
इस घटना के बाद प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह भी काफी आहत हुए थे। उन्होंने 21 दिसंबर 2001 को जनपद प्रवास के दौरान कपिलवस्तु में 180 फीट ऊंची बुद्ध की प्रतिमा का निर्माण कराने की घोषणा करते हुए इसका शिलान्यास भी किया था। अनुयायियों को इससे थोड़ा सुकून तो मिला, लेकिन अफसोस अब तक है। पूर्व सीएम राजनाथ की घोषणा मूर्त रूप नहीं ले सकी। मामला शिलान्यास से आगे नहीं बढ़ सका। अब अफगानिस्तान में दोबारा तालिबानियों के काबिज होने से बुद्ध की धरा खुद को असहज महसूस कर रही है।