कोरोना महामारी के बीच गोरखपुर शहर में कई हॉस्पिटल और नर्सिंग होम संचालक बॉयोमेडिकल वेस्ट इधर-उधर फेंक रहे हैं। ऐसे में महामारी के बीच अन्य बीमारियों का खतरा पनपने लगा है। जबकि प्रतिदिन शहर से साढ़े तीन टन के आसपास बॉयोमेडिकल वेस्ट निकलता है। लेकिन इसके निस्तारण को लेकर न तो प्रशासन गंभीर है और न ही हॉस्पिटल और नर्सिंम होम संचालक। बॉयोमेडिकल वेस्ट उठाने के लिए बकायदे एक निजी फर्म को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। निजी फर्म 21 गाड़ियों से 621 डंपिंग प्वाइंट से मेडिकल वेस्ट उठाने का दावा कर रहा है। जबकि हकीकत इससे परे है।
जानकारी के मुताबिक जिले में करीब 339 नर्सिंग होम हैं। जबकि 400 के आसपास क्लीनिक। इन नर्सिंग होम, अस्पताल और क्लीनिक से प्रतिदिन साढ़े तीन टन के आसपास बॉयोमेडिकल वेस्ट निकलता है। इस बॉयोमेडिकल वेस्ट के लिए स्वास्थ्य विभाग ने एमपीसीसी (मेडिकल पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटी) को उठाने की जिम्मेदारी दी है।
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BRD medical college
- फोटो : अमर उजाला
यही फर्म बीआरडी और जिला अस्पताल समेत सीएचसी और पीएचसी से भी बॉयोमेडिकल वेस्ट का उठान करती है। लेकिन कोरोना महामारी के बीच यह व्यवस्था धराशाई होती दिख रही है। खंचाजी चौराहे के पास काफी मात्रा में बॉयोमेडिकल वेस्ट मिलने से इसके निस्तारण पर सवाल खड़े हो गए हैं। इससे पहले भी छात्र संघ चौराहे के आसपास बॉयोमेडिकल वेस्ट मिल चुका है। बताया जाता है कि वहां पर प्रतिदिन बॉयोमेडिकल वेस्ट खुले में फेंका जाता है। जिसका उठान पांच से सात दिन बाद होता है।
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डॉ. खालिद अब्बासी
- फोटो : अमर उजाला।
चार एकड़ जमीन मिले तो सुलझ जाए समस्या
नर्सिंग होम एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. खालिद अब्बासी ने बताया कि बॉयोमेडिकल वेस्ट को लेकर लगातार शिकायतें मिलती हैं। खुलेआम नाले व सार्वजनिक जगहों पर बॉयोमेडिकल वेस्ट फेंकना कई बीमारियों को दावत देने जैसा है। इसे लेकर एसोसिएशन की ओर से नगर निगम को पत्र भी लिखा गया है। नगर निगम से चार एकड़ जमीन की मांग की गई है। अगर नगर निगम जमीन उपलब्ध करा दे, तो बॉयोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण की सभी प्रक्रियाएं हम लोग खुद ही पूरा कर लेंगे। इसे लेकर कई बार प्रशासन को भी पत्र लिखा गया है।
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मेडिकल वेस्ट।
- फोटो : अमर उजाला
एक करोड़ रुपये आएगी लागत
डॉ. खालिद अब्बासी ने बताया कि जमीन में निर्माण, मशीनों को स्थापित करने और संचालित करने की जिम्मेदारी एसोसिएशन की होगी। इसमें करीब एक करोड़ रुपये तक की लागत आएगी। 70 लाख रुपये की कचरे को विसंक्रमित करने वाली मशीन ही लगेगी। निजी अस्पताल से जुड़े संचालकों का कहना है कि फर्म की गाड़ी सप्ताह में दिन में एक बार आती है। ऐसे में अस्पताल का सैकड़ों क्विंटल संक्रमित कचरा रोजाना जैसे-तैसे निस्तारित हो रहा है।
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मेडिकल वेस्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
पांच से सात दिन बाद उठाते हैं वेस्ट
डॉ. खालिद अब्बासी ने बताया कि जिस फर्म को बॉयोमेडिकल वेस्ट उठाने की जिम्मेदारी दी गई है। वह बेडों के अनुसार रुपये लेता है। लेकिन इसके बाद भी उसे वेस्ट उठाने में पांच से सात दिन का समय लग जाता है। इसकी वजह यह है कि उसके पास गाड़ियों की कमी है। ऐसे में वेस्ट पड़ा रहता है। कई बार लोग उसे अस्पतालों के आसपास भी फेंक देते हैं।
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डॉ. अमित मिश्रा।
- फोटो : अमर उजाला।
वेस्ट के निस्तारण में लापरवाही पर सजा का है प्रावधान
आईएमए के मीडिया प्रभारी डॉ. अमित मिश्रा ने बताया कि बॉयोमेडिकल वेस्ट से स्वस्थ लोगों में एचआइवी, हेपेटाइटिस बी और सी, पेट की गंभीर बीमारियां, सांस के रोग, ब्लड इंफेक्शन, स्किन इंफेक्शन के साथ-साथ केमिकल एक्सपोजर का भी खतरा है। इस संबंध में कायदे-कानूनों की बात की जाए तो बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट और हैंडलिंग एक्ट 1998 के संशोधित नियम 2016 इसकी एक व्यवस्था देता है। इसके मुताबिक मेडिकल कचरे के निस्तारण में कोई गड़बड़ी न हो, इसके लिए जरूरी है कि मेडिकल वेस्ट की उचित छंटाई के बाद जिन थैलियों में उन्हें बंद किया जाए उनकी बार-कोडिंग हो। इसमें लापरवाही मिलने पर पांच साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : PTI
जनरल वेस्ट नगर निगम में जाता है
एमपीसीसी के मैनेजर सतीश साहनी ने बताया कि कई बार निजी अस्पतालों से जनरल वेस्ट का कचरा निकलता है, जिसे नगर निगम से परमिशन लेकर उसी क्षेत्र में निस्तारित कर दिया जाता है। जबकि बॉयो मेडिकल वेस्ट संतकबीरनगर इंडस्ट्रियल एरिया में भेजा जाता है। मेडिकल वेस्ट में कोई भी लापरवाही नहीं बरती जाती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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इंफेक्शन प्रिवेंशन कमेटी की जांच कागजों में
बॉयोमेडिकल वेस्ट के लिए इंफेक्शन प्रिवेंशन कमेटी स्वास्थ्य विभाग की ओर से बनाई गई है। यह कमेटी बॉयोमेडिकल वेस्ट के निस्तारण के बारे में जानकारी लेती है। लापरवाही मिलने पर कार्रवाई भी कर सकती है। लेकिन कमेटी की जांच केवल कागजों में ही हैं।
पांच रंग के डिब्बों में रखा जाता है संक्रमित कचरा
प्राइवेट अस्पताल को अपने संस्थानों में कुल पांच तरह के डिब्बे व प्लास्टिक का उपयोग करना चाहिए। इसमें लाल, पीला, नीला, काला व हरा रंग का प्लास्टिक बैग व डस्टबिन होना चाहिए। लाल-ब्लड बैग, ट्यूब के पाइप, सिरिंज व आईवी सेट। पीला- मानव ऊतक, प्लास्टर, रूई, गंदी पट्टियां, नीला- सुईयां, ब्लेड, खाली दवाओं के वायल व एम्पुल, काला- बेकार दवाएं, हरा- कागज, धातु के टुकड़े तथा अन्य कचरा।