पंचायत 2
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खेमेबाजी को लेकर नजरिया
डिजिटल का चलन बढ़ने से लगा था कि मनोरंजन जगत में बदलाव आएगा। लोकतंत्र आएगा। लेकिन जितेंद्र कुमार मनोरंजन जगत की खेमेबाजी को अलग नजरिये से देखते हैं। वह कहते हैं, ‘मेरे हिसाब से तो खेमों की जरूरत नहीं होती लेकिन होता ये है कि कोई कैम्प अगर कोई दिलचस्प फिल्म बना रहा होता है और आपको लगता है कि आप उसके लिए बिल्कुल मुफीद हैं तो मन तो करेगा ही कि वह किरदार मुझे मिले। ओटीटी क्या हैं, ये भी तो अलग तरह के खेमे ही हैं। ये नेटफ्लिक्स, अमेजन सब खेमे हैं। हर लेखक, हर अभिनेता, हर निर्देशक कुछ न कुछ अलग करने की कोशिश करता है। तो यहां जो भी कुछ अलग करना चाहता है, वह अलग अलग खेमों का हिस्सा तो बनता ही है।’