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Panchayat 2: ‘गरीब रथ से बांद्रा उतरा तो आधा घंटा लगा बाहर निकल पाने में’, मिलिए सचिव जी जितेंद्र कुमार से

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जितेन्द्र कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
 
आईआईटी खड्गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद मनोरंजन की दुनिया में आए जितेंद्र कुमार का संघर्ष खत्म हो चुका है। 10 साल पहले मुंबई आए जितेंद्र कुमार को देश का पहला डिजिटल स्टार भी कहा जा सकता है। ‘परमानेंट रूममेट्स’ के गिट्टू को अब लोग ‘पंचायत’ के सचिव जी के रूप में पहचानते हैं। वह आईआईटी के अपने सीनियर्स की देखादेखी मुंबई आए। अब उनकी कामयाबी देखकर तमाम दूसरे इंजीनियर भी मुंबई की राह पकड़ते रहते हैं। लेकिन, जितेंद्र कुमार का कहना है कि एक्टिंग से पैसा कमाना यहां आसान नहीं है। इसमें बहुत सारा धीरज लगता है और लगता है समय। हीरो बनने के संघर्ष के दिनों की कुछ यादें जितेंद्र कुमार ने साझा की हैं, 'अमर उजाला' के पाठकों के लिए...
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जितेन्द्र कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जब पिटते पिटते बचे जितेंद्र कुमार
जिस बेटे को घर वालों ने इंजीनियर बनाने के सपने देखे, वह एक दिन कलाकार बनने मुंबई निकल पड़ा। इस पर जितेंद्र कुमार के घरवालों बहुत नाराज हुए थे। जितेंद्र बताते हैं, ‘बस हाथ ही नहीं उठा उनका। मैंने कोटा में दो साल कोचिंग की 11वीं और 12वीं की। फिर आईआईटी खड्गपुर में चार साल पढ़ाई की। वहीं बिस्वपति सरकार से मुलाकात हुई जो एक साल सीनियर थे और नुक्कड़ नाटक किया करते थे। उन्होंने मुझे बताया कि पढ़ाई खत्म करने के बाद वह इंजीनियर नहीं राइटर बनने वाले हैं मुंबई जाकर। मुझसे बोले, तुम भी आ जाना एक्टिंग करने।’
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जितेन्द्र कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बचपन से काउंसलिंग जरूरी
जितेंद्र ये भी मानते हैं कि हमारे देश में बच्चों की करियर काउंसलिंग बचपन से होनी बहुत जरूरी है। वह कहते हैं, ‘इंजीनियरिंग की पढ़ाई बहुत मेहनत का काम होता है। बच्चे से ज्यादा उसके पीछे उसका पूरा परिवार मेहनत करता है। जब यही इंजीनियर एक्टर बनता है तो वह बेसिक प्रोसेस में चला जाता है। ज्यादा मेहनत करने लगता है। हर चीज को ज्यादा विस्तार से समझने की कोशिश करने लगता है। अगर इन बातों के बारे में शुरू से पता हो तो करियर चुनने में ज्यादा आसानी होती है।’

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जितेन्द्र कुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
गरीब रथ से पहुंचे मुंबई
जितेंद्र अपने घर अलवर से पहली बार मुंबई आए गरीब रथ से। बांद्रा टर्मिनस उतरे और प्लेटफॉर्म पर उतरने के बाद बाहर निकलने में ही भ्रमित हो गए। वह बताते हैं, ‘आधा घंटा तो मुझे इसी में लग गया कि यहां से बाहर कैसे निकलना है, कोई बताने को तैयार ही नहीं हो रहा था। गलती मुझसे ये हुई कि मुझे बोरीवली जाना था और ट्रेन वहां रुकी भी पर मैं उतरा नहीं। बोरीवली में कॉलेज के समय का एक दोस्त आईआईटी की कोचिंग चलाता है, मुझे वहीं रुकना था। मैंने तय किया था कि मैं हफ्ते में छह दिन एक्टिंग के लिए रखूंगा और एक दिन कोचिंग करूंगा। तो वहीं पहले नौकरी शुरू की और साथ में एक्टिंग।’
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जितेन्द्र कुमार - फोटो : सोशल मीडिया
आठ साल लगे पहली फिल्म में
जो हाल वेब सीरीज ‘पंचायत’ में सचिव अभिषेक त्रिपाठी का है, वही हाल जितेंद्र कुमार का भी मुंबई में बहुत दिनों तक रहा। जितेंद्र बताते हैं, ‘एक्टिंग से पैसा कमाना यहां आसान नहीं है। इसीलिए यहां बसने का फैसला करने से पहले 2012 में मैं तीन महीने के लिए यहां हालात का जायजा लेने आया था। मुझे तब समझ में आ गया था कि यहां पहचान बनाने में वक्त लगेगा। अच्छा ये हुआ कि उसी समय यूट्यूब प्रचलन में आ गया। हम लोग वहीं अपना टैलेंट दिखाने लगे और फिर ये भी हुआ कि तमाम सारे निर्माता हमारे साथ आ गए और कहने लगे कि हमें भी ऐसा ही कुछ डिजिटल पर बनाना है। आया तो मैं फिल्मों में एक्टिंग करने ही था लेकिन मेरी आठ साल लग गए मेरी पहली फिल्म ‘गॉन केश’ रिलीज होने में।
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पंचायत 2 - फोटो : सोशल मीडिया
खेमेबाजी को लेकर नजरिया
डिजिटल का चलन बढ़ने से लगा था कि मनोरंजन जगत में बदलाव आएगा। लोकतंत्र आएगा। लेकिन जितेंद्र कुमार मनोरंजन जगत की खेमेबाजी को अलग नजरिये से देखते हैं। वह कहते हैं, ‘मेरे हिसाब से तो खेमों की जरूरत नहीं होती लेकिन होता ये है कि कोई कैम्प अगर कोई दिलचस्प फिल्म बना रहा होता है और आपको लगता है कि आप उसके लिए बिल्कुल मुफीद हैं तो मन तो करेगा ही कि वह किरदार मुझे मिले। ओटीटी क्या हैं, ये भी तो अलग तरह के खेमे ही हैं। ये नेटफ्लिक्स, अमेजन सब खेमे हैं। हर लेखक, हर अभिनेता, हर निर्देशक कुछ न कुछ अलग करने की कोशिश करता है। तो यहां जो भी कुछ अलग करना चाहता है, वह अलग अलग खेमों का हिस्सा तो बनता ही है।’
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