श्वेता कीर्ति सिंह
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उन्होंने आगे बताया कि मुझे उन्हें गले लगाने की तीव्र इच्छा हुई। मैं वहीं बैठ गई और ध्यान करने लगी जहां उन्होंने ध्यान किया था, और उन क्षणों में, मुझे लगा कि वह अभी भी मेरे साथ हैं, मेरे भीतर हैं, मेरे माध्यम से जी रहे हैं। ऐसा लगा जैसे उन्होंने कभी मुझे छोड़ा ही नहीं था।