दो और दो प्यार
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘दो और दो प्यार’ देखते समय मैंने तमाम दर्शकों को अपनी सीटों में सुबकते देखा, लेकिन ऐसी अच्छी फिल्मों को देखने भी जब लोग नहीं आते तो दुख तो होता होगा?
हां, मैं ये मानता हूं कि तमाम मेहनत करने के बावजूद जब फिल्म सिनेमाघरों में चलती नहीं है तो बहुत दुख होता है। लेकिन, हम वैज्ञानिकों की तरह हैं। वैज्ञानिकों को अपने सारे सफल प्रयोगों पर भी पेटेंट कहां मिलता है। पर पेटेंट न मिले तो क्या वैज्ञानिक प्रयोग ही न करे। परिश्रम करना, कोशिश करना, कलाकार का धर्म है। ये धर्म दर्शक का है कि सिनेमाघरों में आई अच्छी फिल्मों का साथ दे।