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संडे बाइस्कोप: शिल्पा-अक्षय अफेयर, शोले का ‘गे गेम’ और ‘सिलसिला’ के टेंशन के साथ कुछ दिलचस्प किस्से

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बाइस्कोप में इन फिल्मों का जिक्र - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
जिंदगी की फिलॉसफी समझाने वाले तमाम गीतों में से मेरा एक फेवरिट गीत रहा है, ‘आदमी मुसाफिर है आता है जाता है, आते जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है...।’ फिल्म ‘अपनापन’ के लिए गाए लता मंगेशकर के इस गाने के बोलों जैसा ही तो सबका जीवन है। बस समझने का फर्क है। हिंदी सिनेमा में फिल्मों की मेकिंग के भी ऐसे तमाम किस्से हैं, जिनसे होकर गुजरने वाले मुसाफिर अपनी यादें छोड़ जाते हैं। बीते हफ्तों की छह फिल्मों में मुख्य रूप से दिखे अमजद खान, संजीव कुमार, राज कुमार, ओम पुरी जैसे कलाकार अब हमारे बीच नहीं है। ‘सिलसिला’ की मेकिंग के तमाम राज खोलने वाले यश चोपड़ा की भी बस यादें ही बाकी हैं। आइए ‘संडे बाइस्कोप’ में एक बार फिर दबाते हैं रिवाइंड बटन और देखते हैं झलकियां उन फिल्मों की जो बीते हफ्ते के डेली ‘बाइस्कोप’ में जगह पाने में सफल रहीं।
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चक दे इंडिया - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
सलमान ने साइन की थी ‘चक दे इंडिया’
फिल्म की स्क्रिप्ट जब बनकर तैयार हुई तो बताते हैं कि फिल्म में महिला हॉकी टीम के कोच के किरदार कबीर खान को निभाने के लिए सबसे पहले जॉन अब्राहम का नाम ही आदित्य चोपड़ा के दिमाग में आया। फिल्म ‘धूम’ में लोगों ने उन्हें पसंद भी खूब किया था लेकिन बात बनी नहीं। फिर बात शाहरुख खान पर आई, लेकिन शाहरुख ने पहली बार तो ये फिल्म इसलिए करने से मना कर दी क्योकि उस वक्त वह करण जौहर की फिल्म ‘कभी अलविदा न कहना’ में व्यस्त थे। आदित्य चोपड़ा ने फिर इसके बाद सलमान खान से इस रोल के लिए बात की। सलमान खान फिल्म के लिए साइन भी हो गए लेकिन कहते हैं कि फिल्म के निर्देशक शिमित अमीन से सलमान खान की पटी नहीं। और, लौट के ये फिल्म फिर शाहरुख खान के पास ही आ गई।

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धड़कन - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
खूब बंटे अक्षय और शिल्पा की शादी के फोटो
यही वह फिल्म है जिसके कुछ शूटिंग स्टिल्स पत्रकारों को ये कहकर पहुंचाए गए कि अक्षय कुमार और शिल्पा शेट्टी की शादी हो गई है। तमाम लोगों ने इस पर यकीन भी कर लिया, हालांकि बाद में ये सब पब्लिसिटी स्टंट निकला। लेकिन, जो सच था वो ये कि फिल्म के हीरो अक्षय कुमार से फिल्म की हीरोइन शिल्पा शेट्टी अटूट प्रेम करती थीं। और, जब अक्षय उन्हें छोड़ ट्विंकल खन्ना के पास चले गए तो उनका दिल भी वैसे ही टूटा जैसे कभी अक्षय के शिल्पा के पास आने पर रवीना टंडन का टूटा था। आज की तारीख में रवीना टंडन और शिल्पा शेट्टी दोनों अच्छे दोस्त हैं और अगर किसी भरोसे के शख्स साथ हो तो दोनों अपने पुराने किस्सों के मजे भी खूब लेती हैं।

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जाने भी दो यारो - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हालात पर व्यंग्य का कालजयी सिनेमा
सिनेमा में व्यंग्य को कुंदन शाह की फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ ने एक अलग ही मंजिल तक पहुंचाया है। भले मसाला फिल्मों के दौर में पहली बार रिलीज होने पर लोगों को उस समय के हालात पर इस फिल्म में किए गए व्यंग्य समझ नहीं आए लेकिन इसके कथानक ने एक बार जो धीरे धीरे असर करना शुरू किया तो जिसने भी हिंदी सिनेमा को पढ़ा, लिखा या समझा, उसने ये फिल्म जरूर देखी। आज भी ये फिल्म हिंदी सिनेमा की कालजयी कृतियों में गिनी जाती है। फिल्म के हर कलाकार और तकनीशियन के अलावा इसे देख चुके हर दर्शक के दिल के ये फिल्म काफी करीब है और आगे भी रहेगी।
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धर्मकांटा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
प्राण की जगह आए ‘जानी’ राजकुमार
फिल्म ‘धर्मकांटा’ की एक खास बात यहां और बताते चलते हैं कि फिल्म में जीतेंद्र और राजेश खन्ना के पिता का रोल पहले प्राण करने वाले थे, लेकिन फिर सुल्तान अहमद ने इस रोल के लिए राज कुमार से बात की। राज कुमार को सुल्तान अहमद का बात करने का तौर तरीका बहुत पसंद आया। फिल्म की शूटिंग में एक बार राज कुमार को एक सीन करना था जिसमें उनके हाथ में हीरो का एक हार होता है। सीन के दौरान जब राज कुमार को नकली हीरो का हार पकड़ाया गया तो उन्होंने फेंक दिया। उसके बाद बताते हैं कि सुल्तान अहमद ने अपने घर से असली हीरो का हार मंगाया और तब जाकर शूटिंग आगे बढ़ सकी। इसी के बाद सुल्तान अहमद को राज कुमार ने एक नया नाम दे दिया, जानी मुगल ए आजम।

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सिलसिला - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
होने वाली भाभी बनी बीवी
फिल्म ‘सिलसिला’ की कहानी तो आपको याद ही होगी। ये इकलौती फिल्म है जिसमें शशि कपूर ने अमिताभ बच्चन के बड़े भाई का रोल किया है, नहीं तो उम्र में बड़े होने के बावजूद शशि कपूर फिल्मों में उनके छोटे भाई ही बनते रहे। तो फिल्म में दो भाई हैं, दोनों अपने अपने क्षेत्र में दिग्गज बन चुके हैं। एक का साहित्य की जमीन पर नाम उग चुका है। दूसरा आसमान में अपना नाम लिख चुका है। दोनों की शादियां नजदीक हैं और फिर हो जाता है एक हादसा...! छोटा भाई अपनी प्रेमिका को भूल बड़े भाई की पसंद से शादी कर लेता है। दोनों का परिवार चल निकलता है और फिर एक दिन छोटे के जीवन में लौट आती है उसकी प्रेमिका। दोनों फिर मिलते हैं। फिर दिल खिलते हैं। रातें गुलजार होती हैं। सवेरे शानदार होते हैं। लेकिन, कब तक? प्यार पूरा ही हो जाए तो फिर प्यार कैसा? तमाम अंधेरी संकरी सुरंगों से गुजरती हुई ये प्रेम कहानी जिस सामाजिक मुहाने पर आकर निकलती है, उसमें इसके राइटर सागर सरहदी भी कुछ अलग करते तो सन 1981 में भला क्या करते।

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शोले - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
पंचम की बनाई ध्वनियों का तिलिस्म
फिल्म के निर्देशक रमेश सिप्पी मानते हैं कि शोले की सफलता में इसके ध्वनि प्रभावों का मुख्य हाथ रहा। वह बताते हैं, ‘जय द्वारा उछाले गए सिक्के का चट्टान पर गिरकर खनकना, ठाकुर की हवेली में लगे झूले की किरकिराहट, रेल इंजन से निकली भाप का बंदूक की गोली की आवाज से साम्य और गब्बर सिंह के पर्दे पर आगमन के समय आती सियारों के रोने सी आवाज, ये सब चीजें मिलकर एक अलग प्रभाव पैदा करती हैं।’ सिप्पी मानते हैं कि यह ध्वनि प्रभाव ही था जिसने ‘शोले’ को मुंबई के मिनर्वा सिनेमाघर से लगातार पांच साल तक उतरने नहीं दिया।

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