शोले
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म के निर्देशक रमेश सिप्पी मानते हैं कि शोले की सफलता में इसके ध्वनि प्रभावों का मुख्य हाथ रहा। वह बताते हैं, 'जय द्वारा उछाले गए सिक्के का चट्टान पर गिरकर खनकना, ठाकुर की हवेली में लगे झूले की किरकिराहट, रेल इंजन से निकली भाप का बंदूक की गोली की आवाज से साम्य और गब्बर सिंह के परदे पर आगमन के समय आती सियारों के रोने सी आवाज, ये सब चीजें मिलकर एक अलग प्रभाव पैदा करती हैं।' सिप्पी मानते हैं कि यह ध्वनि प्रभाव ही था जिसने 'शोले' को मुंबई के मिनर्वा सिनेमाघर से लगातार पांच साल तक उतरने नहीं दिया। मालती सहाय व विमल दिसानायके ने 'शोले: ए कल्चरल रीडिंग' में 'शोले' का पोस्टमार्टम किया था, हालांकि वे दोनों फिल्म की सफलता में महती भूमिका निभाने वाले किसी स्पष्ट कारक तक पहुंचने में तो सफल नहीं रहे, पर वहीं से नींव पड़ी थी इस कालजयी फिल्म को हिट कराने में काम आए तत्वों की खोज करने की। यह खोज आज भी जारी है।