सूर्यवंशम फिल्म का हिंदी सिनेमा में अलग ही फैन बेस है। ये उन फिल्मों में से है जिन्हें आप अपने घर का ऐसा जरूरी सामान कह सकते हैं जिसे घर में रखने का मन भी नहीं करता और फेंकने का भी दिल नहीं करता। 21 साल पहले इस फिल्म को थिएटर में देखते समय लोगों की प्रतिक्रियाएं अब भी याद आती हैं, तो मन अब भी सिहर जाता है। अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म जो मैंने थिएटर में बचपन में देखी, वह थी जंजीर। और, सूर्यवंशम तक आते आते अमिताभ बच्चन के नाम का सम्मान दिन पर दिन बढ़ता ही गया। पर, उस दिन सिनेमा हॉल में लोगों ने जो कहा, वह यहां लिखने लायक नहीं है।
बंबई जब मुंबई नहीं हुआ था, उन दिनों अक्सर हम लोग बांद्रा में मोहम्मद रफी के बंगले रफी मैंशन के पास वाले गुरुनानक पार्क में शाम के वक्त बैठा करते थे। मिथुन चक्रवर्ती पास वाली इमारत गार्डन व्यू में सबसे ऊपर टैरेस फ्लैट में रहते थे और शाम के वक्त अक्सर अपनी फॉक्स वैगन वैन से निकलते। हमारी मंडली के नियमित सदस्य नईम खान फख्र से बताते, दो ही लोग के पास ये गाड़ी है बंबई में एक अमित के पास और एक 'मिठून' के पास। मैं उन्हें करेक्ट करने की कोशिश करता कि अमित नहीं अमिताभ बच्चन। तो नईम भाई हंसते हुए बोलते, ये भैया लोग (बंबई में उत्तर प्रदेश के लोगों को लोग भैया बोलते हैं) हमेशा पूरा नाम ही बोलेगा, अमिताभ बच्चन। जैसे पंजाब के लोगों के लिए बंबई में तब फख्र करने लायक नाम धर्मेंद्र हुआ करता था, यूपी के लोग भी अमिताभ बच्चन पर अपना अधिकार समझते थे। ये फिल्म सूर्यवंशी के रिलीज होने से और 10-12 साल पहले की बात है।