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बाइस्कोप: 33 साल बाद भी कायम फिल्म ‘पुष्पक’ में दिखा बेरोजगारों का ये दर्द, बिना संवाद की सीधी चोट

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सिनेमा की शुरुआत की बातें अक्सर अब भी होती ही रहती हैं। मूक फिल्मों की बात होती है तो पता चलता है कि कैसे थिएटर में पर्दे के आगे बनी कुएं जैसी जगह में साजिंदे बैठकर सीन के हिसाब से बाजा बजाया करते और गायक भी वहीं अगल बगल खड़े होकर गाने गा दिया करते। फिर तस्वीरें बोलने लगीं और एक बार जो इन तस्वीरों ने बोलना शुरू किया तो इनके कलाकारों की अदाकारी को तो मानो पंख ही लग गए। कलाकारों के संवाद उसके बाद उनका अंदाज बनने लगे। अब तो ये अंदाज बनाने के लिए भी संवाद बोले जाने लगे हैं लेकिन हैरानी हुई थी उस वक्त के दर्शकों को जब भरे पूरे सिनेमा के दौर में साल 1987 में निर्देशक संगीतम श्रीनिवास राव को एक ऐसी फिल्म बनाने की सूझी जिसमें संवाद ही न हों। और, ये विचार उनके मन में कौंधा उस फिल्म की शूटिंग के दौरान, जिसमें वह सहायक निर्देशक थे। फिल्म में एक कलाकार को भयभीत होने के भाव अपने चेहरे पर दिखाने थे और उसे संवाद कोई नहीं दिया गया था। कलाकार ने ऐसा करके दिखा भी दिया तो राव इससे बहुत प्रभावित हुए। वह रात दिन बस यही सोचने लगे कि क्या सिर्फ चेहरे के भावों पर भरोसा करके नए जमाने में ऐसी फिल्म बन सकती है, जिसमें संवाद ही न हों? संगीतम श्रीनिवास राव को अपने इस सवाल का जवाब एक दिन नहाते हुए अपने बाथरूम में मिला और सिर्फ दो हफ्ते में उन्होंने उस फिल्म ‘पुष्पक विमान’ की स्क्रिप्ट लिख डाली, हिंदी पट्टी में ये फिल्म ‘पुष्पक’ के नाम से रिलीज हुई और यही फिल्म हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
संवाद नहीं एक, भाषाएं अनेक
‘पुष्पक विमान’ को सेंसर बोर्ड से कन्नड़ भाषा की फिल्म के तौर पर पास कराया गया। हिंदी में इसे नाम मिला ‘पुष्पक’, तमिल में ‘पेसुम पदम’, तेलुगू में ‘पुष्पका विमानमु’ और मलायलम में ‘पुष्पकविमानम’ नाम से रिलीज किया गया। ये सब उस फिल्म के साथ हुआ है जिसमें कोई संवाद ही नहीं है। 10 सितंबर 1987 के अलावा फिल्म ‘पुष्पक’ की एक रिलीज डेट 27 नवंबर 1987 भी मिलती है। ये फिल्म के हिंदी संस्करण की रिलीज डेट इसलिए मालूम होती है क्योंकि फिल्म के हिंदी संस्करण को सेंसर सर्टीफिकेट ही 17 नवंबर 1987 को जारी हुआ है। फिल्म रिलीज के 25 साल पूरे होने का जश्न हालांकि फिल्म इंडस्ट्री में 10 सितंबर 2012 को ही मनाया गया था। तो मैं बता रहा था कि संगीतम श्रीनिवास राव को बिना किसी संवाद की एक फिल्म बनाने का आइडिया तो काफी पहले आ गया था लेकिन इसकी कहानी सूझने में उन्हें काफी दिन लगे। फिर बाथरूम में मिले ज्ञान पर लिखी गई पटकथा लेकर जब वह कमल हासन के पास गए तो उन्होंने कहानी सुनते ही हां कर दी। फिल्म देख चुके लोगों को याद होगा कि ये वही फिल्म है जिसके लिए कमल हासन ने अपनी ब्रांड बन चुकी मूंछें मुंडवा दी थीं। मूंछों वाले चेहरे के भाव साफ समझ नहीं आते, ऐसा फिल्म निर्देशक संगीतम श्रीनिवास राव का मानना था।

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता
संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ‘पुष्पक विमान’ ने दक्षिण भारत में होने वाले फिल्मफेयर पुरस्कारों में भी तीन पुरस्कार जीते। ये पुरस्कार थे, बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट एक्टर। कमल हासन जब फिल्म करने को तैयार हो गए तो राव के सामने पहली समस्या आई कि इसमें पैसा कौन लगाएगा। उस वक्त सिर्फ 35 लाख रुपये की लागत से बनी इस फिल्म में जब कोई पैसा लगाने को तैयार नहीं हुआ तो राव ने खुद ही फिल्म निर्माण करने का फैसला कर लिया। ये बात किसी तरह कन्नड़ अभिनेता श्रृंगार नागराज को पता चली तो उन्होंने राव के फैसले की तारीफ की और खुद भी फिल्म में पैसा लगाने का वादा कर दिया। फिल्म की कहानी ऐसी थी कि इसमें किसी कलाकार को कोई संवाद ही नहीं बोलना था तो राव के पास पूरी छूट थी कि वह इस फिल्म को अखिल भारतीय फिल्म बनाने के लिए हर भाषा के सिनेमा से कलाकार ले सकते थे। कमल हासन के अलावा फिल्म में अमला आईं। भाड़े के हत्यारे के तौर पर संगीतम श्रीनिवास राव की पहली पसंद अमरीश पुरी थे, लेकिन अमरीश पुरी उन दिनों इतने व्यस्त थे कि फिल्म के लिए चाहकर भी तारीखें नहीं निकाल पा रहे थे।

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सारिका की सिफारिश पर टीनू की एंट्री
अमरीश पुरी की जब तारीखें नहीं मिल सकीं तो उन दिनों कमल हासन के साथ साये की तरह रहने वाली उनकी पूर्व पत्नी अभिनेत्री सारिका ने फिल्म में तब टीनू आनंद की एंट्री कराई। टीनू आनंद भी ये मानते हैं कि फिल्म ‘पुष्पक’ उन्हें सारिका की सिफारिश पर ही मिली। वह कहते हैं, ‘इस फिल्म में शूटिंग करना मेरे लिए लाइफ चेंजिंग एक्सपीरियंस रहा। हमने फिल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले इसकी खूब वर्कशॉप्स कीं। लेकिन शूटिंग के समय हमें निर्देशक कभी बताते नहीं थे कि फ्रेम में कहां से आना है, कहां लाइट पकड़नी है और कहां से एग्जिट लेनी है। सब कुछ बहुत ऑर्गेनिक तरीके से होता था। राव साब कुर्सी डालकर सेट पर चिल किया करते थे और हम सबने बहुत ही मस्ती भरे माहौल में ये फिल्म पूरी की। फिल्म की जो अंतर्धारा है वह इतने साल बाद आज भी नहीं बदली है, और आज भी कोई अगर इस फिल्म का रीमेक करना चाहे तो मैं तो खुशी खुशी तैयार हूं। हां, छूट मुझे वैसी ही मिलनी चाहिए जैसी ओरीजनल फिल्म के निर्देशक ने दी थी।’

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
बेरोजगारी का दर्द बयां करने वाली फिल्म
फिल्म ‘पुष्पक’  में कमल हासन, अमला, टीनू आनंद के बाद उन दिनों ‘खोपड़ी’ ने नाम से मशहूर हुए सीरियल ‘नुक्कड़’ के कलाकार समीर खक्कर को राव ने साइन किया फिल्म में एक ऐसे रईस आदमी के रोल में जो हमेशा नशे में रहता है और जिसकी बीवी अपने प्रेमी के साथ रंगरेलियां मनाने में व्यस्त रहती है। ये प्रेमी इससे शादी करना चाहता है और इसके लिए रईस आदमी को रास्ते से हटाने के लिए भाड़े के कातिल की सेवाएं लेता है। कहानी के बीच में कमल हासन की एंट्री एक बेरोजगार युवक के तौर पर होती है जो नौकरी तलाशने के लिए यहां वहां भटक रहा है। फिल्म ‘पुष्पक’ एक कालजयी फिल्म है। इसमें दिखाई गई दृश्यावलियां आज भी उतनी ही सामयिक हैं, जितनी 33 साल पहले थीं। फिल्म की ओपनिंग बहुत ही मादकता भरे माहौल में होती है। बिल्डिंग में झाड़ू लगाने वाली बाई के आसपास की ध्वनियों के साथ सामंजस्य बनाने वाले सीन से ही देखने वाले की आंखें और कान फिल्म के वीडियो और ऑडियो के साथ सिंक हो जाते हैं। अपनी बरसाती से इमारत की महिलाओं को ताड़ने वाले बेरोजगार के रोल में कमल हासन इसके बाद कहानी का सिरा पकड़ लेते हैं और इसे आखिर तक घुमाकर इसकी माला बना देते हैं।

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पूरी फिल्म का सबसे कमाल का सीन
फिल्म ‘पुष्पक’  में पुल पर भिखारी को एक रुपया दिखाने के बाद भिखारी जिस तरह यहां वहां से खोजकर अपनी दौलत प्रदर्शित करता है, वह दृश्य चकरा देने वाला है। एक पढ़ा लिखा युवक और एक रुपया, राह पर भीख मांगने वाले के पास अनगिनत रुपये। या फिर वह दृश्य जिसमें रईस आदमी की सड़क पर फेंकी आइस्क्रीम को कमल हासन अपनी मुट्ठी की छाया में कैद करना चाहते हैं, सड़क पर गिरे रुपये के टैक्सी के टायर में चिपककर निगाह से दूर हो जाने के बाद के भाव भी कमल हासन के चेहरे पर देखने लायक हैं। देखिए ये सीन..

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नीलम कोठारी की जगह आईं अमला
फिल्म में फरीदा जलाल, के एस रमेश, लोकनाथ, प्रताम के पोथेन, पी एल नारायण और राम्या की भी अहम भूमिकाएं हैं। राम्या को यहां देखेंगे तो पहचानना भी मुश्किल हैं। बाकी कलाकारों की तरफ और आगे बढ़ने से पहले यहां ये भी मैं बता देना चाहता हूं कि फिल्म की हीरोइन के लिए संगीतम श्रीनिवास राव की पहली पसंद अमला नहीं बल्कि उस वक्त की चर्चित अभिनेत्री नीलम थीं। नीलम का काम उन दिनों उनकी एक रिश्तेदार शहनाज देखती थीं और वह चाहती थीं कि फिल्म में उनको पूरी शान औ शौकत के साथ पेश किया जाए। निर्देशक राव नीलम को फिल्म में बहुत सादगी के साथ दिखाना चाहते थे। शहनाज की ये मांग भी उन्होंने मान ली थी कि नीलम की फीस के एवज में उन्हें फिल्म के दिल्ली वितरण अधिकार दे दिए जाएंगे। लेकिन बाद में न नीलम को ये रोल मिला और न ही शहनाज को फिल्म के दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स। फिल्म में भिखारी के रोल में दिखते हैं चर्चित तेलुगू अभिनेता पी एल नारायणा। अमला के पिता के रोल के लिए राव पहल मशहूर जादूगर पी सी सरकार को लेना चाहते थे। लेकिन इसी बीच उन्हें टेलीविजन पर बैंगलोर के जादूगर के एस रमेश का शो देखने का मौका मिल गया है और उन्होंने तुरत फुरत उन्हें फिल्म के लिए साइन कर लिया। अपने पहले ही सीन में अपनी बीवी को देखकर जिस तरह रमेश सिगरेट गायब करते हैं और फिर बीवी के जाने पर उसे हवा में ही पकड़कर हवा में ही पकड़ी गई तीली को होठों से रगड़कर सुलगाते हैं, वह सीन कमाल का सीन है।

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पुष्पक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

चलते चलते..
फिल्म ‘पुष्पक’ बेरोजगारी से जूझ रहे एक युवा के सपनों की कहानी है। ये कहानी इस सबक की भी है कि रुपया पैसा कितना भी आ जाए लेकिन शांति मेहनत की कमाई से ही मिलती है। बेरोजगार युवक बने कमल हासन को फिल्म में रईस शख्स बने समीर खक्कर के नाम पर फाइव स्टार होटल में खूब ऐश करते दिखाया गया है। लेकिन, आखिर में वह जी कड़ा करके अपनी प्रेमिका को असलियत बता ही देता है। फिल्म का टर्निंग प्वाइंट वह सीन है जब नायिका अपने नायक की हकीकत का पता चलने पर भी उसे माफ कर देती है। वह चलते चलते उसे एक फूल और एक कागज देती है। बेरोजगारी को लेक फिल्म में बहुत सारे तंज हैं। कटिंग चाय भर के ही पैसे होने पर भी गिलास को पूरा भरा होने का एहसास पाने के लिए कौए की कांव कांव सुनकर उसकी कहानी से प्रेरणा लेने वाला सीन भावुक है। भिखारी के पास एक बेरोजगार स्नातक से ज्यादा पैसे होने वाला सीन दिल को कचोटता है। फिल्म में एक ईमानदारी ये दिखती है कि उस वक्त तक लोगों को नौकरियां बिना सोर्स सिफारिश के मिल जाती थीं। फिल्म बनाने के अपने पूरे उद्देश्य को संगीत श्रीनिवास राव ने एक लाइन में समायोजित किया। एक इंटरव्यू में वह कहते हैं, ‘ये फिल्म मेरे लिए बहुत निजी फिल्म है क्योंकि मैं ऐसा ही जीवन जीने में यकीन रखता हूं। मुझे दौलत जमा करने का शौक नहीं है लेकिन मैं ऐसा इंसान भी नहीं हूं जो गरीबी से रोमांस करे। दौलत मेरे लिए अहम तो हैं लेकिन ये मेरे लिए सबकुछ नहीं है।’ आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।


(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)

फिल्म ‘पुष्पक’ आप यहां मुफ्त में देख सकते हैं:

 

 

 

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