पुष्पक
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
चलते चलते..
फिल्म ‘पुष्पक’ बेरोजगारी से जूझ रहे एक युवा के सपनों की कहानी है। ये कहानी इस सबक की भी है कि रुपया पैसा कितना भी आ जाए लेकिन शांति मेहनत की कमाई से ही मिलती है। बेरोजगार युवक बने कमल हासन को फिल्म में रईस शख्स बने समीर खक्कर के नाम पर फाइव स्टार होटल में खूब ऐश करते दिखाया गया है। लेकिन, आखिर में वह जी कड़ा करके अपनी प्रेमिका को असलियत बता ही देता है। फिल्म का टर्निंग प्वाइंट वह सीन है जब नायिका अपने नायक की हकीकत का पता चलने पर भी उसे माफ कर देती है। वह चलते चलते उसे एक फूल और एक कागज देती है। बेरोजगारी को लेक फिल्म में बहुत सारे तंज हैं। कटिंग चाय भर के ही पैसे होने पर भी गिलास को पूरा भरा होने का एहसास पाने के लिए कौए की कांव कांव सुनकर उसकी कहानी से प्रेरणा लेने वाला सीन भावुक है। भिखारी के पास एक बेरोजगार स्नातक से ज्यादा पैसे होने वाला सीन दिल को कचोटता है। फिल्म में एक ईमानदारी ये दिखती है कि उस वक्त तक लोगों को नौकरियां बिना सोर्स सिफारिश के मिल जाती थीं। फिल्म बनाने के अपने पूरे उद्देश्य को संगीत श्रीनिवास राव ने एक लाइन में समायोजित किया। एक इंटरव्यू में वह कहते हैं, ‘ये फिल्म मेरे लिए बहुत निजी फिल्म है क्योंकि मैं ऐसा ही जीवन जीने में यकीन रखता हूं। मुझे दौलत जमा करने का शौक नहीं है लेकिन मैं ऐसा इंसान भी नहीं हूं जो गरीबी से रोमांस करे। दौलत मेरे लिए अहम तो हैं लेकिन ये मेरे लिए सबकुछ नहीं है।’ आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
फिल्म ‘पुष्पक’ आप यहां मुफ्त में देख सकते हैं: