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Panchayat Review: इसे देखेंगे तो लॉकडाउन खुलते ही गांव भाग जाने का मन हो आएगा

Sun, 05 Apr 2020 08:16 PM IST
Avinash Pal पंकज शुक्ल, मुंबई
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Panchayat - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
डिजिटल रिव्यू: पंचायत (वेब सीरीज)
कलाकार: रघुवीर यादव, नीना गुप्ता, जितेंद्र कुमार, चंदन रॉय, फैसल मलिक, पूजा सिंह आदि।
निर्देशक: दीपक कुमार मिश्र
सृजनकर्ता: टीवीएफ
ओटीटी: प्राइम वीडियो
रेटिंग: ****

तो पिछले छह साल में देश का कितना ‘विकास’ हुआ भला, कितने गांव खुले से शौच में मुक्त हुए, कितने घरों में चूल्हे के बदले गैस पहुंच गई और कितनी महिला जनप्रतिनिधियों को वाकई इस समाज और इस लोकतंत्र ने उनके उसी रूप में अपना लिया, जिस रूप में वह महिला सशक्तीकरण के नाम पर सीटें आरक्षित होने से पहले थीं? सवाल बहुत भारी हैं। लेकिन, क्विंटल और टन के जमाने में टीवीएफ की नई वेब सीरीज पंचायत आपको ले चलती है उधर, जहां पूजा का कपड़ा आज भी गज भर लगता है और जहां बारात में पूड़ी आज भी पसेरी भर आटा के हिसाब से बनती है।
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पंचायत - फोटो : सोशल मीडिय
ये है वाराणसी से मोटरसाइकिल से जाने भर की दूरी पर बसा गांव फुलेरा। बड़ा अफसर बनने का सपना पाले एक लड़का मजबूरी में गांव आता है सचिव की नौकरी करने। इसके बाद की कहानी 25 से 35 मिनट के आठ एपीसोड में बित्ता बित्ता आगे खिसकती है। बिल्कुल ठीक अंदाजा लगाना हो तो आपको गांव में खुले में शौच का किस्सा याद करना पड़ेगा। क्योंकि, इस गांव का प्रधान पति और उप प्रधान दोनों खुले में आनंद पाते हैं। असली महिला प्रधान को चूल्हे पर खाना बनाने का 35 साल का अनुभव है और ये कॉन्फीडेंस भी है कि खाना तो उनके चौके में अच्छा ही बनेगा।
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पंचायत - फोटो : सोशल मीडिया
एमबीए प्रवेश परीक्षा की तैयारी और ग्राम पंचायत कार्यालय में सचिव की नौकरी के बीच फंसे अभिषेक की कहानी है पंचायत। मार्को पोलो का स्वेटर पहनने वाले अपने दोस्त से मोबाइल पर सलाह लेते रहने वाले अभिषेक को गांव में साल भर और रुके रहने का आकर्षण आखिरी एपिसोड के आखिरी सीन में पानी की टंकी पर मिलता है। लेकिन, इस बीच ये सीरीज कभी भुतहा पेड़ में विज्ञान के अध्यापक के फैलाए अंधविश्वास तो कभी चक्के वाली कुर्सी के चक्कर में अहं की लड़ाई तो कभी मॉनीटर चोरी के बहाने गांवों में पुलिस की कार्यप्रणाली पर तगड़ी चोट करती है।

टीवीएफ वाले आमतौर पर अपनी सीरीज में किसी न किसी प्रोडक्ट की ब्रांडिंग करते हैं, यहां ब्रांडिंग भारत की है। लेकिन ये हरीश भिमानी वाले भारत की कहानी नहीं है। यहां दो पीढ़ियों के लोग भी दोस्त बनकर साथ में बियर पी सकते हैं और सेल्फी खींच सकते हैं। गांव की एक महिला सीधे डीएम को उसके बात करने के तरीके पर टोक सकती है। और, ये उस भारत की कहानी है जहां बेटे का नाम आरव रखने पर पिता को लगता है कि कहीं अक्षय कुमार आशीर्वाद देने न आ जाएं।

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पंचायत - फोटो : सोशल मीडिया
दरअसल, वेब सीरीज पंचायत कहानी है ही नहीं। ये किस्से हैं जो गांव से नाता रखने वाले इस देश के हर उस इंसान की जेबों में कहीं गुम हो चुके हैं, जिन्होंने बटुए भारी करने के लिए शहर के रास्ते पकड़ लिए। कोरोना ने सबको घरों में बंद किया है तो गांव याद आ रहे हैं। और, इस याददाश्त की टीस बढ़ाती है निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा की पंचायत। अजब पंचायत लगाए हैं मिश्रा जी। ऊपर से चंदन कुमार की लिखावट भी गजब।

शुभ मंगल ज्यादा सावधान के बाद जितेंद्र कुमार को मिली शोहरत पर वेब सीरीज पंचायत में उनकी अदाकारी शक्कर के शर्बत में पड़े रुह अफज़ा सा असर करती है। लौकी छीलने से लेकर मैगी बनाते तक चेहरे पर दिखने वाली लाचारी हो, दरोगा की पूछताछ से झल्लाए सरकारी नौकर की बेकरारी हो या फिर बुजुर्ग प्रधान पर हाथ उठाने वाले लफंगों की ठुकाई की तैयारी हो, जितेंद्र कुमार ने हर किस्से की संदर्भ, प्रसंग सहित पूरी व्याख्या की है। और, प्रस्तुति पंक्तियों में अलंकार और मुहावरे सजाने का काम किया है विकास बने चंदन रॉय और डिप्टी प्रधान ‘ऑफीसियल’ बने फैसल मलिक ने।
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पंचायत - फोटो : सोशल मीडिया
नीना गुप्ता तो बधाई हो के बाद से ऐसा डटी हैं एक्टिंग की पिच पर कि दूसरे को स्ट्राइक ही नहीं दे रही हैं। लेकिन यहां गजराज राव की जगह दूसरी तरफ रघुवीर यादव हैं। तमाम दिग्गज एक्टरों को एक्टिंग का ककहरा सिखाने वाले रघुवीर ने नॉन स्ट्राइकिंग एंड पर रहते हुए यहां सेंचुरी मारी है, कैसे? इसके लिए आपको ये सीरीज देखनी पड़ेगी। बस आठ एपीसोड हैं। लगातार देखेंगे तो भी बस एक बार में पूरी कर सकते हैं। और, देखने के बाद किसी तरह का पछतावा तो नहीं ही रहेगा, हां, रिंकी वाले अगले सीजन का इंतजार जरूर रहेगा।

इन नियमित किरदारों के अलावा अलग अलग एपीसोड में आने वाले कलाकार भी अच्छा काम कर गए हैं, जैसे मॉनीटर चोरी की तफ्तीश करने वाला दरोगा, चिलम फूंककर बरगद के पेड़ के दौड़ने की कहानी बनाने वाला मास्टर या फिर आत्माराम की अम्मा। तकनीकी टीम में से प्रियदर्शिनी ने माहौल के हिसाब से कॉस्ट्यूम बिल्कुल सटीक रखे हैं। अमिताभ सिंह ने एक साधारण से गांव को अपने कैमरे से वाकई बहुत सुंदर दिखाया है। अमित कुलकर्णी का संपादन चुस्त है। अनुराग सैकिया के संगीत में थोड़ा यूपी वाला पुट दिखता तो काम पैंतीस हो जाता। हां, कुछ एपीसोड में गालियां इस्तेमाल की गई हैं तो स्मार्ट टीवी पर देखते समय हाथ वॉल्यूम वाले बटन पर ही रखें।

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