कहो ना प्यार है
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
मैंने फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ की समीक्षा लिख दी। पेज पर लग भी गई। लेकिन, पेज की प्रूफरीडिंग, डिजाइन चेक, फिर प्लेट बनने और प्रिंटिंग में जाने से पहले इस समीक्षा को दफ्तर में ही दर्जनों लोगों ने पढ़ डाला। सबको उत्सुकता थी कि आखिर ये नया लड़का है कितना दमदार। देर तक दफ्तर में काम करते रहने का कीड़ा शुरू से है तो मैं दफ्तर में ही था। आलम ये कि पेज छपने जाने तक तमाम लोगों ने मुझे टोका कि चाहो तो हेडिंग बदल लो। मैंने कहा, नहीं ठीक है। तो एक काफी सीनियर सहयोगी ने दफ्तर के बाहर चाय की दुकान तक टहलाया और समझाते रहे कि ऐसी भविष्यवाणी तुम्हारे करियर के लिए घातक हो सकती है। कहीं फिल्म फ्लॉप हो गई तो? एकबारगी तो मुझे भी लगने लगा कि मैं बहुत बड़ी बात लिख रहा हूं और फिल्म न चली तो। लेकिन, मुझे ऋतिक के टैलेंट पर भरोसा था, फिल्म का म्यूजिक शानदार था और बड़े भाई व छोटे भाई वाला एंगल बहुत इमोशनल था। इतने में फिल्म निकल ही जानी थी। तो, मैंने उनको यही जवाब दिया कि हेडिंग यही रहने देते हैं, फिल्म नहीं चली तो कहीं और नौकरी देखेंगे।