काश
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
मृत्यु से पहले के जीवन पर बनी फिल्म
हिंदी सिनेमा में फिल्मों के तमाम फॉर्मूले रहे हैं। वैसे ही जैसे कहानियां लिखने वाले मानते हैं कि पूरी दुनिया की सारी कहानियों का वर्गीकरण कुछ तय खांचों में किया जा सकता है। बात में कुछ कुछ दम भी लगता है जैसे कि इनमें से एक फॉर्मूला है तयशुदा मृत्यु से पहले का जीवन उल्लास के साथ जीना। देखने में ये एक विरोधाभासी अलंकार है, मृत्यु और उल्लास। आमतौर पर तो मृत्यु का तो शोक मनाया जाता है और पता चल जाए कि किसी व्यक्ति की मृत्यु आसन्न है तो फिर तो पूरा गली मोहल्ला पहले से शोक मनाने लगता है। लेकिन, ऋषिकेश मुखर्जी के ‘आनंद’ ने कहानी का ये क्षेपक बदल दिया। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा का एक ऐसा नायक दिया जिसे अपनी निश्चित मृत्यु के बारे में पता है लेकिन वह जितने दिन भी जीना चाहता है, खुलकर खिलखिलाकर जीना चाहता है और कहता है, ‘बाबूमोशाय! जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए..!’ यहां फिल्म ‘काश’ में मृत्यु दो जीवनों के बीच सेतु का काम करती है। जो परिवार में सबसे छोटा है, उसे सबसे पहले जाना है, ये तय होने के बाद जो कुछ फिल्म में होता है, वही इसका असली मर्म है। जैकी श्रॉफ और डिंपल का सादगी भरा बेहतरीन अभिनय है और इन दोनों के बेटे बने मास्टर मकरंद का चेहरा देखकर कलेजा अपने आप मुंह को आने लगता है।
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