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बाइस्कोप: राजेश खन्ना के इनकार ने फिरोज खान को बनाया सुपरस्टार, पढ़िए ‘काला सोना’ के दिलचस्प किस्से

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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
एक बार फिर आज का बाइस्कोप फरमाइशी है। फऱमाइश रही फिल्म ‘काला सोना’ का बाइस्कोप लिखने की और इस फिल्म को समझने के लिए समझना ये भी जरूरी है कि आखिर हिंदी सिनेमा में काऊब्वॉय संस्कृति आई कहां से। जैसे भारत अब कृषि प्रधान देश है, वैसे ही अमेरिका का एक बड़ा हिस्सा बरसों पहले कृषि प्रधान ही हुआ करता था। लेकिन अमेरिका तो अमेरिका ठहरा, तो वहां के गोसेवक भी घोड़ों पर बैठकर उन्हें हांकने निकलते थे। यही कहलाए ‘काऊब्वॉय’। धूप से बचने के लिए सिर पर बड़ा सा हैट। पैरों में जींस के ऊपर पैरों को छिलने से बचाने के लिए पहनी हुई चमड़े की पेटी। कमर में चौड़ी बेल्ट और उससे लटकते दो होल्स्टर जिनकी रिवॉल्वर हमेशा भरी रहतीं। अमेरिका के अधिकतर राज्यों में हथियार रखने के लिए लाइसेंस की जरूरत अब भी नहीं होती है, कोई भी बाजार में जाकर या सुपरमार्केट में जाकर बंदूक और गोलियां खरीद सकता है। तो ये ‘काऊब्वॉय’ मुक्तहस्त से गोलियों की बौछार करते रहे और अपना रुतबा जमाते रहे।

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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
देसी काऊब्वॉय
हॉलीवुड सिनेमा में अभिनेता क्लिंट ईस्टवुड के किरदारों को आदर्श ‘काऊब्वॉय’ छवि माना जाता है। हिंदी सिनेमा में इस छवि को  लेकर पहली फिल्म निर्देशक नरेंद्र बेदी ने बनाने की कोशिश की। साल था 1974 और फिल्म थी ‘खोटे सिक्के’। फिरोज खान, डैनी, रेहाना सुल्तान, अजीत, रंजीत और सत्येन कप्पू की ये फिल्म सुपरहिट रही तो इसी के अगले साल जासूसी फिल्में बनाकर नाम कमाने वाले निर्देशक रविकांत नगाइच ले आए फिल्म ‘काला सोना’। ‘खोटे सिक्के’, ‘धर्मात्मा’ और ‘काला सोना’ की हैट्रिक लगी और फिरोज खान बन गए सुपरस्टार। ‘खोटे सिक्के’ की ही तरह ‘काला सोना’ में भी फिरोज खान और डैनी साथ रहे। इस बार जो सितारे और साथ हो लिए वे रहे, परवीन बाबी, प्रेम चोपड़ा और तमाम दूसरे सितारे। फिरोज खान के करियर को सुपरस्टार के ठप्पे से चमकाने वाली फिल्म ‘काला सोना’ ही हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म है।

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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
विलेन का नाम पॉपी सिंह!
इन दिनों हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से लेकर कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री तक गांजा, चरस, अफीम और भी ना जाने कौन कौन सी नशीली चीजों पर हंगामा मचा हुआ है। फिल्म ‘काला सोना’ इसी नशीले पदार्थों की खेती पर बनी फिल्म है। फिल्म के मेन विलेन का नाम ही पॉपी सिंह है जो खेतों में पॉपी की खेती करता है, जिससे ‘काला सोना’ यानी चरस बनता है। फिरोज खान और डैनी की जोड़ी की एक और काऊब्वॉय टाइप की ही फिल्म है ‘चुनौती’, जिसमें हीरोइन नीतू सिंह हैं। निर्देशक सतपाल की ये फिल्म ज्यादा कमाल नहीं कर पाई तो फिरोज खान ने अपना रास्ता बदला। फिरोज खान को तब तक लोग भारत का क्लिंट ईस्टवुड बुलाने लगे थे लेकिन 25 सितंबर 1939 को जुल्फिकार अली शाह खान के तौर पर जन्मे फिरोज खान को दर्शकों की नब्ज पकड़ने में अपने पूरे करियर महारत हासिल रही। साल 1980 में रिलीज हुई उनकी ‘चुनौती’ नहीं चली लेकिन उनकी अपनी बनाई फिल्म ‘कुर्बानी’ सुपर डुपर हिट रही। फिरोज खाना वाला ताना बाना बाद में फिर मिथुन चक्रवर्ती ने अपनाया और 1984 में आई फिल्म ‘जागीर’ में हिट भी रहे। बाद में फिल्म ‘वांटेड’ में भी मिथुन ने यही ‘काऊब्वॉय’ वाला रूप फिर से धरा। पर बात बनी नहीं।

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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
रविकांत नगाइच की पारखी नजर
दक्षिण के मशहूर सिनेमैटोग्राफर रहे रविकांत नगाइच ने हिंदी फिल्म में जीतेंद्र के साथ फिल्म ‘फर्ज’ बनाकर अपनी स्टाइल की मुनादी कर दी थी। इसके बाद तो वह जिस हीरो पर हाथ रख देते वही उनके साथ काम करने को तैयार हो जाता। हॉलीवुड फिल्मों पर उनकी पैनी नजर रहती थी और जो भी अमेरिका जाता, उससे बस वह अंग्रेजी फिल्मों के बारे में जानकारी ले आने की ही फरमाइश किया करते थे। रविकांत नगाइच ने राजेश खन्ना के साथ  ‘द ट्रेन’ और ‘मेरे जीवन साथी’ बनाई। अमिताभ बच्चन के साथ ‘प्यार की कहानी बनाई। धर्मेंद्र के साथ ‘कीमत’ बनाई और इसके बाद नंबर आया फिरोज खान का, जिनके साथ उन्होंने ‘काला सोना’ बनाई। इन्हीं रविकांत नगाइच ने ‘काला सोना’ के चार साल बाद मिथुन चक्रवर्ती को लेकर सुपरहिट फिल्म ‘सुरक्षा’ बनाई और हिंदी सिनेमा को एक नया सुपरस्टार दिया।

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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
कहानी कोकीन की
‘काला सोना’ में जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं फिरोज खान का काऊब्वॉय वाला लुक जारी ही थी। नाम है उनका फिल्म में राकेश। उसे पॉपी सिंह की तलाश है जिसने उसके पिता को मार दिया था। पॉपी सिंह कोकीन का स्मगलर है। पॉपी का पता लगाते लगाते राकेश एक दूर दराज के पहाड़ी इलाके में पहुंचता है, जहां उसकी मुलाकात शेरा से होती है। य़हीं उसकी मुलाकात दुर्गा से होती है। दुर्गा और शेरा इससे पहले कि राकेश पर भरोसा कर पाएं, उसके इरादों पर शक़ करते हैं। लेकिन, कहानी आगे बढ़ती है। पॉपी सिंह के खिलाफ सब एक होते हैं। बीच में दिक्कतें भी तमाम आती हैं, कुछ आंखों में आंसू ला देने वाले लम्हे भी आते हैं, लेकिन अंत भला सो सब भला हो ही जाता है।


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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हिंदी सिनेमा के पहले लिव-इन कपल
फिल्म ‘काला सोना’ की हीरोइन हैं परवीन बाबी और फिल्म में सेकंड लीड हीरो जैसे दमदार किरदार के तौर पर दिखे डैनी डेंजोग्पा। फिल्म की कहानी आगे बढ़ाने से पहले मैं थोड़ा आपको दूसरे रास्ते ले चलता हूं, डीटूर समझते हैं ना। तो ये डीटूर है डैनी और परवीन बाबी की प्रेम कहानी का। जी हां, परवीन के जीवन में महेश भट्ट के आने से पहले, कबीर बेदी के आने से पहले और अमिताभ बच्चन के आने से पहले यानी सबसे पहले जो शख्स सबसे करीब आया था, वह थे डैनी। डैनी और परवीन बाबी हिंदी सिनेमा के पहले लिव इन कपल माने जाते हैं। दोनों का रिश्ता चार साल चला। और, उस दौर में चला जब परवीन बाबी अपने करियर के शीर्ष पर थीं। अमिताभ बच्चन के साथ वह ‘दीवार’ कर रही थीं। ‘काला सोना’ से साल भर पहले रिलीज हुई अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘मजबूर’ को परवीन बाबी के करियर का टर्निंग प्वाइंट भी माना जाता है। 1983 में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन के ट्रिपल रोल वाली फिल्म ‘महान’ तक परवीन बाबी उनके साथ 10 फिल्में कर चुकी थीं। इस दौरान डैनी का परवीन बाबी से ब्रेकअप हो चुका था। महेश भट्ट अपनी पहली पत्नी लॉरेन ब्राइट उर्फ किरण भट्ट और बेटी पूजा को छोड़कर परवीन बाबी पर फिदा हो चुके थे। परवीन बाबी इस सबके बाद भी डैनी के घर पहुंच जाती थीं और उनके बेडरूम तक में जाकर बैठ जाती थीं। ये बात उन दिनों की है जब डैनी के जीवन में किम यशपाल आ चुकी थीं।

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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
कमाल के गायक हैं डैनी
फिल्म ‘काला सोना’ में डैनी ने आशा भोसले के साथ एक गाना भी गाया है, लेकिन ये राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान या आमिर खान जैसा शौकिया गायन नहीं है। डैनी एक बहुत ही प्रतिभावान गायक रहे है और उनकी ये खूबी उस दौर के संगीतकारों को भी खूब पता थी। मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन से डैनी का मिलना जुलना रहता था और डैनी का सपना ही था कि एस डी बर्मन के संगीतबद्ध किसी गाने में उनको मौका मिले। डैनी का सपना जल्द ही पूरा हुआ। एक दिन सचिन देव बर्मन ने डैनी को कहा कि वह उनकी आवाज में एक गाना रिकॉर्ड करने जा रहे हैं। डैनी बहुत खुश हुए। एस डी के पैर छुए और चलने लगे। तो सचिन देव बर्मन ने कहा कि ये गाना तुम्हें लता मंगेशकर के साथ गाना है। डैनी के तो पैरों के नीचे से यूं लगा कि किसी ने जमीन खींच ली हो। उन्होंने खुद को हवा में तैरता महसूस किया। बड़ी मुश्किल से नाम भी दोहरा पाए, ‘लता मंगेशकर!’


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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
लता और आशा के साथ गाए गाने
संगीतकार एस डी बर्मन को डैनी की गायन प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। ये गाना डैनी ने गाया निर्देशक आत्माराम की फिल्म ‘ये गुलिस्तां हमारा’ के लिए जिसमें मुख्य कलाकार थे, देव आनंद और शर्मिला टैगोर। फिल्म में डैनी ने बतौर अभिनेता काम भी नहीं किया है। उनका ये गाना पूरी तरह एक प्लेबैक सिंगर के तरह ही था। ‘काला सोना’ में भी डैनी ने अपनी गायन क्षमता का प्रदर्शन बेहतरीन तरीके से किया। फिल्म ‘काला सोना’ के गाने लिखे मजरूह सुल्तानपुरी ने और संगीत था आर डी बर्मन का। एक सुपरहिट फिल्म का जैसा संगीत होना चाहिए था ‘काला सोना’ का संगीत वैसा बन नहीं पाया। लेकिन डैनी का वो गाना तो देखना बनता है।


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काला सोना - फोटो : जी5
राजेश खन्ना को मिला था पहला ऑफर
फिल्म ‘काला सोना’ के निर्माताओं में से एक हरीश शाह का अभी 7 जुलाई को ही निधन हुआ है। हरीश शाह और विनोद शाह दोनों मिलकर फिल्मे बनाते रहे और उनकी गिनती हिंदी सिनेमा के दिलदार निर्माताओं में होती थी। फिल्म ‘काला सोना’ की शूटिंग पर भी उन्होंने दिल खोलकर पैसे खर्च किए। वैसे ये फिल्म पहले वह राजेश खन्ना के साथ बनाने वाले थे, लेकिन राजेश खन्ना लगातार फिल्म के निर्माताओँ को टालते जा रहे थे। बहाना तो तारीखों का था, लेकिन कहा यही जाता था कि राजेश खन्ना खुद को काऊब्वॉय इमेज में ढालने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे और सीधा इनकार भी नहीं कर पा रहे थे। फिर एक दिन शाह बंधुओं ने राजेश खन्ना के टालूपन को ही उनका ना समझ फिल्म ‘काला सोना’ का एलान फिरोज खान के साथ कर दिया।

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काला सोना - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
चलते चलते...
राजेश खन्ना को मोटी रकम साइनिंग के लिए मिल चुकी थी तो उनसे कहा गया कि कम से कम मुहूर्त क्लैप देने भर का तो समय निकालकर आ जाइए। वह उस पर भी नहीं आए। अब उनको इस बात का गुस्सा था कि बिना उनको बताए फिरोज खान को कैसे साइन कर लिया गया। फिल्म की शूटिंग के दौरान जंगल में शिकार के भी बहुत किस्से हैं। मामला यहां कुछ कुछ वैसा ही होते होते रह गया था जैसा सलमान खान के साथ फिल्म ‘हम साथ साथ हैं’ की शूटिंग के दौरान जोधपुर के निकट के जंगलों में हुआ था। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

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(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
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