क्या दो घिसे हुए सिक्के मिलकर एक खनकता कॉइन बन सकते हैं? शाहरुख खान और इम्तियाज अली के मेल-मिलाप से बनी 'जब हैरी मैट सेजल' देखें तो सीधा जवाब है, नहीं। कहने को दोनों दिग्गज हैं मगर चमक खो चुके हैं। इस फिल्म में दोनों ने एक-दूसरे को सहारा देने की कोशिश की परंतु बुरी तरह लड़खड़ाए हैं।
कभी लवस्टोरी के माहिर रहे इम्तियाज की यह कहानी बेदम है और शाहरुख के स्टबल उगे चेहरे में रूमानियत सूख चुकी है। अपनी जवानी खोकर वह पर्दे पर भी बढ़ती उम्र के बच्चों के पिता ही नजर आते हैं। होना यह चाहिए कि दमदार डायरेक्टर-ऐक्टर अपनी प्रतिभा से कोई नई खोज करें लेकिन दोनों सफलता का बोझ अपने सिर पर ढो रहे हैं। ऐसे में कुछ नया कैसे सोचें?
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'जब हैरी मेट सेजल' रिव्यू
मूल कहानी इतनी है कि हैरी पंजाब से यूरोप पहुंच कर ट्रेवल गाइड बन गया और गुजराती सेजल रिश्तेदारों संग घूमने आई है। सेजल के मंगेतर ने उसे पुश्तैनी अंगूठी पहना कर प्रपोज किया। थोड़े समय में पता चलता है कि अंगूठी सुंदरी के अंगुलियों से फिसल गई। सब लौट गए और सेजल हैरी के साथ यूरोप में अंगूठी ढूंढ रही है।
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'जब हैरी मेट सेजल' रिव्यू
खोदा पहाड़ निकली चुहिया की तर्ज पर आखिर रिंग सेजल के पर्स में निकलती है। आश्चर्य कि पूरी कहानी का ढांचा जिस जिज्ञासा पर खड़ा है, उस रिंग के मिलने के दृश्य को इतने ठंडे ढंग से रचा गया है कि मानों कुछ हुआ ही नहीं! सेजल घर लौट जाती है। तब हैरी को अहसास होता है कि वह अपना दिल छोड़ गई और उसका दिल ले गई।
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'जब हैरी मेट सेजल' रिव्यू
बॉलीवुड की हर दूसरी-तीसरी फिल्म में यह हादसा होता है। कहानी की बड़ी कमी यह है कि हैरी के अतीत से जुड़े सवाल अनसुलझे हैं। हैरी बीच-बीच में एकदम सैड हो जाता है और फिल्म अचानक खत्म हो जाती है। हैरान दर्शक पाते हैं कि इस सफर में उनकी जेब कट गई!!
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'जब हैरी मेट सेजल' रिव्यू
फिल्म में शाहरुख किसी एंगल से हॉट नहीं हैं और अनुष्का हर लिहाज से ठंडी हैं। इम्तियाज ने उन्हें टोटल बहनजी और चीनी-गमले टाइप सुंदर बताया है। सेजल लगातार हैरी को जताने की कोशिश करती है कि वह उतनी ठंडी नहीं जितनी वह सोच रहा है। इस चक्कर में फिल्म रेफ्रिजरेटर में रखे महंगे टमाटर जैसी फ्रीज हो जाती है, जो अब मासिक-बजट में भारी लगने लगे हैं।
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'जब हैरी मेट सेजल' रिव्यू
फिल्म गवाह है कि इम्तियाज अली रचनात्मक-शून्य में बदल चुके हैं। अनुष्का में पारंपरिक हीरोइनों वाली बात नहीं, यह फिल्म फिर स्थापित करती है। शाहरुख के लिए यह आत्मा में झांकने का समय है। उनमें अनिल कपूर या अमिताभ बच्चन वाली बात नहीं, जो बढ़ती उम्र में और आकर्षक दिख रहे हैं। यह वक्त गुजारने लायक फिल्म भी नहीं है।
यूरोप के लोकेशन कहानी का हिस्सा नहीं बन पाते क्योंकि निर्देशक नक्शे में रास्ते दिखाता है। शहरों के बजाय सस्ते रेस्तरां-होटलों में घुमाता है। कुल जमा एक रिंग के कथित रूप से खोने-पाने की इस कहानी में अंगूठी का नगीना गायब है। इम्तियाज-शाहरुख के इस बेरौनक प्रस्ताव को स्वीकारना चाहें तो आपकी मर्जी।
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