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Four More Shots Please Season 2 Review: ठग्स ऑफ हिंदुस्तान से भी ज्यादा नकली है ये सीरीज, बचके रहना!

Sat, 18 Apr 2020 02:24 AM IST
Mishra Mishra पंकज शुक्ल, मुंबई
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फोर मोर शॉट्स, प्लीज! सीजन 2 (वेब सीरीज) रिव्यू - फोटो : अमर उजाला

डिजिटल रिव्यू: फोर मोर शॉट्स, प्लीज! सीजन 2 (वेब सीरीज)
कलाकार: सयानी गुप्ता, बानी जे, कीर्ति कुल्हाड़ी, मानवी गगरू, लीजा रे, मिलिंद सोमन, नील भूपलम, प्रतीक बब्बर, सिमोन सिंह, अमृता पुरी, सपना पब्बी..आदि।
सृजनकर्ता: रंगीता प्रीतीश नंदी
निर्देशक: नूपुर अस्थाना
ओटीटी: प्राइम वीडियो
रेटिंग: **


एक खाते पीते घर की या फिर उससे भी आगे कहें कि एक रईस घर की लड़की कैसी होती है? इसका जवाब कोई दूसरा दे, उससे पहले देख लेते हैं कि प्राइम वीडियो की चर्चित वेब सीरीज फोर मोर शॉट्स, प्लीज! के दूसरे सीजन के बनाने वाले कौन हैं? प्राइम वीडियो इसे अपनी महिलाओं की सरपरस्ती में बनी कामयाब सीरीज मानता है। इसके क्रिएटर से लेकर इसकी राइटर, इसकी डायरेक्टर और यहां तक कि इसके तीन सिनेमैटोग्राफर्स में भी एक महिला हैं। तो ये माना जाना चाहिए कि इस सीरीज में जो कुछ दिखाया गया है, वह कहीं न कहीं तो इसी भारत में हो ही रहा होगा। भले 130 करोड़ की आबादी में आधा फीसदी ही सही और ये लोग भी तो ताली और थाली बजाते ही हैं। तो चलिए समझ लेते हैं क्या हैं ये चार और पैग वोदका के?

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Four More Shots Please S2 - फोटो : Social Media

फोर मोर शॉट्स प्लीज की पिछले सीजन की कहानी जहां छूटी थी, वहां से इस सीजन की कहानी आगे बढ़े उससे पहले पिछले सीजन का एक रीकैप है। मतलब ये कि इसके मेकर्स को भी अपनी कहानी पर भरोसा नहीं है कि उनके पिछले सीजन की कहानी लोगों को याद ही होगी। अरे भैया, अगर हिट सीरीज का सीक्वेल है तो थोड़ा दर्शक को भी समझने दो कि कौन सा तार कहां छूटा था। लेकिन नहीं, ये सब दर्शकों के बगलगीर लोग हैं। हर मोड़ पर पुराना किस्सा बताकर ही मानते हैं। कहानी का सिरा इस बार इंस्ताबुल में खुलता है। जहां सिड के एक फोन कॉल पर तीन पढ़ी लिखी, काबिल और तथाकथित संभ्रांत वर्ग की लड़कियां उसे बचाने पहुंच जाती हैं। अगर आपने सीरीज के पहले एपीसोड के इस लॉजिक पर ही अपना माथा पकड़ लिया है तो सीरीज देखना आपके लिए बहुत भारी होने वाला है क्योंकि अभी तो सीरीज के पहले एपीसोड का आधा हिस्सा भी खत्म नहीं हुआ है।

प्रीतीश नंदी की कंपनी ने ये सीरीज बनाई है। रंगीता का नाम इस सीरीज को क्रिएट करने वाले के तौर पर आता है। लेकिन, समझने वाली बात ये है कि अब वो जमाना गया जब अमेरिका में पहले फिल्म देखकर आने वाले हिंदी सिनेमा के निर्माता देसी दर्शकों को बुद्धू बना दिया करते थे। तमाम लोगों को कहो ना प्यार है और ईटी का कनेक्शन बहुत बात में समझ आया लेकिन अब 2020 चल रहा है, कोराना के लॉकडाउन 2.0 में लोगों को सेक्स एंड द सिटी और लिटिल वूमन की जेरोक्स कॉपी से प्रभावित नहीं किया जा सकता। ये सीरीज देखने के बाद मुझे अब वीरे दी वेडिंग क्लासिक फिल्म लगने लगी है।

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Four More Shots Please S2 - फोटो : Social Media
दामिनी रिजवी रॉय की किताब पूरी करने की कमशमकश, अंजना मेनन की खुद से छोटे मर्द के साथ बनती संवरती जिंदगी, उमंग की अपनी समलैंगिक प्रेमी समारा के साथ टूटे रिश्तों से पार पाने की जद्दोजहद और सिद्धि की किसी तरह अपने भीतर की हीनता को मारने के लिए यहां वहां मुंह मारने की आदत। लेकिन, ये सब किसके साथ नहीं होता? लेकिन, क्या एक उच्चवर्गीय लड़की की पहचान यही है कि वह जिंदगी की हर मुश्किल का हल शराब और सेक्स में डूब के ही पाए। एक दो बार ऐसा हो जाए तो समझ आता है लेकिन लड़की जब इसकी आदत बना ले तो फिर उसके एहसास असली नहीं हैं। बिल्कुल नहीं हैं। जिंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें, ये जमीं चांद से बेहतर नज़र आती है हमें, अब भी ऐसा रोमांस करने वाले उस दुनिया में भी मौजूद है जिसे सड़क पर चलते लोग चांद की दुनिया कहते हैं।

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Four More Shots Please' Season 2 - फोटो : Amar Ujala, Mumbai
फोर मोर शॉट्स प्लीज का दूसरा सीजन बनाने वालों को ये भी समझना जरूरी है जिंदगी 24 घंटे डिजाइनर कपड़े पहनने का नाम नहीं है। और, वेब सीरीज एकता कपूर का डेली सोप भी नहीं है। ये हर सीन में मैचिंग लिपस्टिक के नाम पर गहरे रंग तलाश लाने का भी नाम नहीं है और न ही जिंदगी मर्दों की बराबरी करने के लिए हर दूसरी बात में सहेलियों को ‘गाईज’ और ‘मैन’ बोलने का नाम है। औरतों की बगावत का हर रास्ता न तो मर्दों को गाली देने से पूरा होता और न ही उन्हें अपनी साजिशों का निशाना बनाकर। फोर मोर शॉट्स, प्लीज! की निर्देशक नूपुर अपने चारों मुख्य किरदारों को सिर्फ कैरीकेचर बनाकर छोड़ देती हैं औऱ यहीं ये सीरीज अपनी आत्मा मार देती है।
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Four More Shots Please - फोटो : social media
हर बात पर टिप्पणी करने वाले बॉस से बेहतर काम दिखाकर भी अंजना जीत हासिल कर सकती है, दफ्तर छोड़ने की उसे क्या जरूरत, तब जबकि वह खुद वकील है। दामिनी जैसे अपने सहयोगियों के साथ बर्ताव करती है, वैसे तो कोई डेस्क इंचार्ज भी अब नहीं करता। और, वह जज दामोदरन के कत्ल पर किताब लिखती है। साहित्य महोत्सव वाला ड्रामा यहां उसे और कमजोर करता है। उमंग और सिद्धि के किरदार भी दमदार तरीके से निखर नहीं पाए।

प्राइम वीडियो पर इतनी खराब सीरीज शायद इस साल की ये पहली है। हॉटस्टार पर स्पेशल ऑप्स, वूट सेलेक्ट पर असुर, जी5 पर स्टेट ऑफ सीज और प्राइम वीडियो पर ही पंचायत जैसी बेहतरीन सीरीज देखने के बाद पहले एमएक्स प्लेयर की एक थी बेगम ने निराश किया, अब उससे ज्यादा निराश फोर मोर शॉट्स प्लीज ने इसलिए भी किया क्योंकि प्राइम वीडियो की दुकान ऊंची है। इनके पकवान फीके निकलते हैं तो वक़्त बर्बाद होने का दुख तो होता ही है, दर्द इस बात का भी रिसता है कि आखिर ये किस हिंदुस्तान की बात कह रहे हैं?

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