बाइस्कोप के इस सीजन में जब से मैंने 70, 80 और 90 के दशकों की फिल्मों, उनकी मेकिंग और उनसे जुड़े दिलचस्प किस्सों को लिखना शुरू किया, तब से पहली बार इतना लंबा ब्रेक लेना पड़ा। बात सेहत से जुड़ी रही लेकिन फिर भी बिना बताए लिए गए इस ब्रेक के लिए माफी चाहता हूं। आज मैं बताने जा रहा हूं निर्देशक राज खोसला की चर्चित फिल्म ‘दोस्ताना’ के कुछ दिलचस्प किस्से। महेश भट्ट ने राज खोसला की शागिर्दी में ही फिल्ममेकिंग के गुर सीखे और फिल्म ‘दोस्ताना’ की मेकिंग के दौरान ही महेश भट्ट और अमिताभ बच्चन के बीच पंगे हुए। 17 अक्टूबर 1980 को रिलीज हुई फिल्म ‘दोस्ताना’ हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है। फिल्म की रिलीज डेट आपको विकीपीडिया या फिर फिल्म से जुड़ी दूसरी साइट्स पर कुछ और भी मिल सकती है, लेकिन ये फिल्म 17 अक्टूबर को ही देश भर के सिनेमाघरों तक पहुंची थी। निर्देशक राज खोसला की इस आखिरी सुपरहिट फिल्म के निर्माता थे यश जौहर और इसी फिल्म से उनके प्रोडक्शन हाउस यानी धर्मा प्रोडक्शंस की नींव पड़ी जिसके कर्ताधर्ता करण जौहर ने बाद में इसी नाम से एक और फिल्म अभिषेक बच्चन, प्रियंका चोपड़ा और जॉन अब्राहम के नाम से बनाई।
बिहारी बाबू का बिंदास अंदाज
‘दोस्ताना’ के बाइस्कोप का एक संयोग ये भी है कि अभी दो दिन पहले ही, यूं ही संयोगवश शत्रुघ्न सिन्हा से भेंट हो गई। लोखंडवाला बैक रोड पर बने मूवी टॉवर के पोर्टिको में वह अपनी गाड़ी में बैठे थे और मैं उसी बिल्डिंग से बाहर निकला एक मित्र के यहां से रात का भोजन करके। दुआ सलाम के बाद बातें उनके बेटे लव के बिहार विधानसभा चुनाव की होने लगीं। शत्रुघ्न सिन्हा ने विस्तार से अपने बेटे की सीट का महत्व, उसकी भौगोलिक स्थित और उसकी जीत की संभावनाओं पर चर्चा की। बीजेपी नेता के तौर पर शत्रुघ्न सिन्हा से मेरी पहली मुलाकात बरेली में बीजेपी नेता संतोष गंगवार के घर पर हुई थी। उनका स्वभाव शुरू से वैसा ही रहा। न उनमें कभी अभिनेता के तौर पर मुझे किसी तरह का घमंड दिखा और न कभी बीजेपी सरकार में मंत्री बनने के बाद ही किसी तरह का अहंकार उन्होंने दिखाया। उनका जिनसे ‘दोस्ताना’ रहा, हमेशा एक जैसा रहा। बस, अमिताभ बच्चन को छोड़कर।
अमिताभ और शत्रुघ्न का कंपटीशन
अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा संघर्ष के दिनों के साथी हैं। दोनों फिल्म ‘परवाना’ में पहली बार एक साथ दिखे। फिर दोनों ने एक और कम चर्चित फिल्म ‘रास्ते का पत्थर’ में भी साथ काम किया। फिल्म ‘रास्ते का पत्थर’ की कहानी बाद में अनुराग बासु ने अपनी फिल्म ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ में दोहाराई। 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘रास्ते का पत्थर’ में मुकेश का गाया गाना, ‘रास्ते का पत्थर किस्मत ने मुझे बना दिया, जो रास्ते से गुजरा एक ठोकर लगा गया...’ अपने जमाने का सुपरहिट गाना रहा है। मुकेश के प्रशंसकों का ये अब भी फेवरिट गीत है। इन गुमनाम सी फिल्मों के अलावा अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्हा ने ‘काला पत्थर’, ‘दोस्ताना’, ‘शान’ और ‘नसीब’ में साथ काम किया है। इन फिल्मों के बारे में खासियत ये रही कि हर बार शत्रुघ्न सिन्हा को अमिताभ बच्चन से ज्यादा तालियां मिलीं। इन फिल्मों की आउटडोर शूटिंग के दौरान भी लोग जब शत्रुघ्न सिन्हा को देखकर अमिताभ से ज्यादा सीटियां बजाते तो अक्सर अमिताभ परेशान हो जाते। ‘काला पत्थर’ की शूटिंग के दौरान इसके चलते क्या हो चुका है, ये मैं आपको फिल्म ‘काला पत्थर’ के बाइस्कोप में बता ही चुका हूं।
सलीम-जावेद की कहानी
सलीम-जावेद की लिखी फिल्म ‘दोस्ताना’ कहानी है दो ऐसे दोस्तों की जिनकी पढ़ाई तो साथ में हुई लेकिन एक बन गया पुलिस इंस्पेक्टर विजय और दूसरा वकील रवि। दोनों अपने अपने पेशों की बुलंदियों पर हैं और दोनों कभी एक दूसरे के काम में दखल नहीं देते। एक दिन एक खूबसूरत युवती शीतल थाने में छेड़छाड़ की रिपोर्ट लिखाने आती है तो उसकी मुलाकात विजय से होती है। उसी रोज शीतल की मुलाकात रवि से भी होती है। रवि मन ही मन शीतल को चाहने लगता है लेकिन कह नहीं पाता। विजय अपने दिल की बात साफगोई से आगे रख देता है और उसका प्यार पींगे भरने लगता है। रवि शहर के एक बड़े अपराधी डागा के लिए भी काम करता है। विजय और शीतल की प्रेम कहानी रवि को पता चलती है तो वह टूट जाता है। हालात ऐसे मोड़ पर आते हैं जहां विजय का फांसी के तख्ते से बचना या उस पर झूल जाना रवि के हाथ में होता है। शीतल अपने प्यार को बचाने की फरियाद लेकर रवि के पास जाती है और इसके बाद जो होता है, वह फिल्म के क्लाइमेक्स की नींव रखता है।
यूं पड़ी धर्मा प्रोडक्शंस की नींव
फिल्म ‘दोस्ताना’ बनने का किस्सा वाकई काफी दिलचस्प है। अपने समय के चर्चित अभिनेता आई एस जौहर के छोटे भाई यश जौहर तब देव आनंद की कंपनी नवकेतन फिल्म्स के लिए काम करते थे। देव आनंद ने इमरजेंसी के दौरान उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ मोर्चा खोला। उनके विरोध में फिल्मी सितारों को लेकर खूब रैलियां कीं और इसी दौरान उन्होंने अपने दफ्तर में काम करने वाले यश जौहर को खुद फिल्में बनाने को कहा। तो उधर देव आनंद सियासत करने निकले और इधर यश जौहर ने सलीम जावेद की एक कहानी ली और नवकेतन फिल्म्स के अपने तमाम साथियों जैसे कि जीनत अमान और प्रेम चोपड़ा आदि से बात करके अमिताभ बच्चन को फिल्म के लिए साइन कर लिया। साल 1977 में फिल्म ‘दोस्ताना’ जब लॉन्च हुई तो इसका मुहूर्त क्लैप यश जौहर के बड़े भाई अभिनेता आई एस जौहर ने ही दिया था। सुनील दत्त के साथ फिल्म ‘मुझे जीने दो’ से फिल्म प्रोडक्शन सीखने की शुरुआत करने वाले यश जौहर को चर्चा मिली, देव आनंद की फिल्म ‘गाइड’ से जिसको तय बजट के हिसाब से पूरा करने में यश जौहर ने बहुत मदद की। देव आनंद ने बाद में यश जौहर को अपनी फिल्मों ‘ज्वैल थीफ’, ‘प्रेम पुजारी’ और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का भी प्रोडक्शन सौंपा।
विनोद खन्ना आउट, शत्रुघ्न सिन्हा इन
बतौर प्रोड्यूसर अपनी पहली फिल्म के लिए यश जौहर पहले देव आनंद के भाई विजय आनंद को ही बतौर निर्देशक लेना चाहते थे। दोनों के बीच इसे लेकर बैठकें भी हुईं लेकिन विजय आनंद उन दिनों ‘राम बलराम’ और ‘राजपूत’ जैसी फिल्मों में बिजी थे तो मामला राज खोसला पर आकर अटका। तब तक फिल्म के हीरो अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना थे। विनोद खन्ना को सुपरस्टार बनाने में राज खोसला की फिल्मों ‘मेरा गांव मेरा देश’, ‘कच्चे धागे’ और ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ का बड़ा हाथ रहा है। विनोद खन्ना भी राज खोसला पर आंख मूंद कर भरोसा करते थे। लेकिन, जब राज खोसला ने फिल्म ‘दोस्ताना’ की स्क्रिप्ट पढ़ी तो उन्हें लगा कि इसमें वकील का जो रोल विनोद खन्ना करने जा रहे हैं, उसमें तो जान ही नहीं है और ये रोल विनोद खन्ना के स्टारडम के हिसाब से ठीक भी नहीं है। राज खोसला ने इस बारे में यश जौहर से बात की तो यश जौहर ने उनसे ही पूछ लिया कि विनोद की जगह कौन सा दूसरा हीरो फिट बैठेगा, तो राज खोसला ने तपाक से शत्रुघ्न सिन्हा का नाम ले लिया। फिल्म में इंटरवल से ठीक पहले के सीन का भी एक अद्भुत किस्सा है, ये इकलौता सीन है अमिताभ बच्चन के करियर का जिसमें उन्हें किसी हीरो का थप्पड़ पड़ता है लेकिन पलटकर वह थप्पड़ मारने वाले पर हाथ नहीं उठाते हैं।
महबूब स्टूडियो का वो वन टेक शॉट
अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच वैसे तो फिल्म ‘दोस्ताना’ में तमाम दमदार सीन्स है। राज खोसला को भले विनोद खन्ना इस रोल में फिट न लगे हों, लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा के लिए जो सीन उन्होंने रचे, वे काबिले तारीफ हैं। शत्रुघ्न सिन्हा ने भी इस फिल्म में खूब तालियां बटोरी हैं। शत्रुघ्न सिन्हा के मेकअप मैन प्रसाद का इस फिल्म के दौरान ही निधन हुआ था और उसका अंतिम संस्कार करने के बाद से वह शूटिंग पर आ नहीं रहे थे। यश जौहर ने एक दिन उन्हें फोन करके पूछा कि महबूब स्टूडियो में लगा फिल्म का सेट हटाया जाना है और अमिताभ बच्चन की भी बस आखिरी डेट इस शेड्यूल की बची है तो अगर वह हां करें तो अगले दिन शूटिंग रखी जा सकती है। शत्रुघ्न सिन्हा को देर से आने की आदत थी औऱ अमिताभ बच्चन को हमेशा वक्त से पहुंचने की। उस दिन शूटिंग दो बजे खत्म होनी थी, उसके बाद सेट तोड़ा जाना था। शत्रुघ्न ठीक डेढ़ बजे स्टूडियो में दाखिल हुए। 10 मिनट में तैयार हुए। अपनी लाइनें वह पहले से तैयार करके आए थे और राज खोसला से बोले, ‘टेक करते हैं।’ सब लोग परेशान कि न रिहर्सल, न कोई लाइट मार्किंग, सीधे टेक। पर राज खोसला को भरोसा था। फिल्म के सबसे अहम इस सीन को शत्रुघ्न ने वन टेक में ओके किया। सबने खूब तालियां बजाईं। शत्रुघ्न ने इसका एक टेक और देना चाहा। कैमरा ऑन भी हुआ लेकिन अमिताभ ने बीच सीन में ही उन्हें रोक लिया। वह शत्रुघ्न के गले मिले और बोले, ‘लल्ला, बस करते हैं। उससे बेहतर नहीं हो पाएगा।’
प्रेम चोपड़ा और अमरीश पुरी का दोस्ताना
शत्रुघ्न सिन्हा अब भी उन दिनों को याद करते हैं तो भावुक हो जाते हैं। अपनी आत्मकथा में उन्होंने अमिताभ बच्चन को लेकर खूब बातें की हैं। ये भी बता चुके हैं कि कैसे अमिताभ बच्चन की फिल्मों से उन्हें ऐन मौके पर इसलिए बाहर कर दिया जाता था क्योंकि अमिताभ उनकी मौजूदगी को अपने लिए खतरा मानते थे। दोनों का दोस्ताना फिल्म ‘दोस्ताना’ की तरह असल जिंदगी में भी लंबे अरसे तक बिगड़ा रहा, लेकिन अब फिर दोनों दोस्त हैं और अच्छे दोस्त हैं। फिल्म ‘दोस्ताना’ में काम करने वाले प्रेम चोपड़ा औऱ अमरीश पुरी भी आपस में पक्के दोस्त थे। प्रेम चोपड़ा और अमरीश पुरी ने शिमला में साथ में थिएटर भी किया। अमरीश पुरी रंगमंच में प्रेम चोपड़ा के सीनियर थे लेकिन इस फिल्म में उन्होंने प्रेम चोपड़ा के गुर्गे का रोल किया है। अमरीश पुरी की आवाज तब तक विविध भारती के नाटकों खासतौर से ‘हवा महल’ में प्रसारित उनके एक नाटक से काफी मशहूर हो चुकी थी। उनके प्रशंसकों ने उन्हें इस फिल्म में उनकी आवाज से ही पहचाना। आगे चलकर अमरीश पुरी हिंदी सिनेमा के बहुत बड़े विलेन बने।
दमदार कलाकारों ने कराई शानदार कमाई
फिल्म ‘दोस्ताना’ में प्राण, हेलेन, शरत सक्सेना, पेंटल, गोगा कपूर, विकास आनंद और इफ्तिखार ने भी अहम किरदार किए हैं। साल 1980 में रिलीज हुई फिल्मों में कमाई के मामले में फिल्म ‘दोस्ताना’ चौथे नंबर पर रही। उस साल कमाई का रिकॉर्ड फिरोज खान की ‘कुर्बानी’ ने बनाया था जिसमें फिरोज खान लेना अमिताभ बच्चन को चाहते थे और फिल्म बनी विनोद खन्ना के साथ और इधर ‘दोस्ताना’ में यश जौहर लेना विनोद खन्ना को चाहते थे और फिल्म बनी शत्रुघ्न सिन्हा के साथ। उस साल दूसरे और तीसरे नंबर पर कमाई करने वाली फिल्में थीं, ‘आशा’ और ‘राम बलराम’। कमल हासन ने बाद में इस फिल्म की तमिल रीमेक ‘सत्तम’ के नाम से बनाई।
आनंद बक्षी के गीत, लक्ष्मी-प्यारे का संगीत
फिल्म ‘दोस्ताना’ सलीम जावेद की उन गिनी चुनी फिल्मों में शामिल है जिनका संगीत काफी हिट रहा। इस फिल्म के लिए आनंद बक्षी ने बहुत ही खूबसूरत गाने लिखे और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की धुनों का तो खैर कहना ही क्या। किशोर कुमार का खिलंदडपना अगर ‘बहुत खूबसूरत जवां एक लड़की...’ में अलग असर करता है तो यही आवाज आशा भोसले का साथ पाकर ‘दिल्लगी ने दी हवा, थोड़ा सा धुआं उठा और आग जल गई’ में बिल्कुल रूमानी हो जाती है। लेकिन, फिल्म की गायिकी में असल लाइम लाइट रही मोहम्मद रफी पर। उनका सोलो गाना ‘मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया, सुना है कि तू बेवफा हो गया’ साल का सुपर डुपर हिट गाना रहा। और, फिल्म का ऑल टाइम हिट गाना वो रहा जिसे मोहम्मद रफी और किशोर कुमार ने मिल कर गाया, ‘बने चाहे दुश्मन जमाना हमारा, सलामत रहे दोस्ताना हमारा...’
चलते चलते...
फिल्म ‘दोस्ताना’ से जुड़े किस्सों में इस बात का जिक्र मिलता है कि फिल्म ‘दोस्ताना’ की मेकिंग के दौरान ही महेश भट्ट एक बार अमिताभ बच्चन से मिलने आए थे। वह चाहते थे कि अमिताभ अपनी पुरानी दोस्त परवीन बाबी से एक बार बात करें लें तो शायद उनकी हालत सुधर जाए। परवीन बाबी उन दिनों बीमार रहने लगी थीं और महेश भट्ट के साथ होने पर भी अक्सर अमिताभ का नाम लेकर जोर जोर से रोने लगती थीं। एक खास बात फिल्म से ये भी जुड़ी है कि राज खोसला ने ‘दोस्ताना’ में भी अपनी पहली हिट फिल्म ‘सीआईडी’ का वह सीन दोहराया जिसमें पूछताछ करते इंस्पेक्टर पर एक कैदी की मौत का इल्जाम लग जाता है। फिल्मफेयर ने कुछ ही दिन पहले फिल्म की रिलीज डेट 8 अक्टूबर बताई थी और 28वें फिल्मफेयर पुरस्कारों में भी फिल्म ‘दोस्ताना’ को एक भी पुरस्कार नहीं मिला था। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।