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Bioscope S2: ‘दीवार’ में बनते बनते रह गई देव आनंद और राजेश खन्ना की जोड़ी, 786 का ये है असली कनेक्शन

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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अपने चर्चित शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के हाल ही में प्रसारित एक एपीसोड में जब इसके होस्ट अमिताभ बच्चन ने फिल्म ‘दीवार’ को लेकर एक सवाल पूछा और इसका सही उत्तर मिलने के बाद की टिप्पणी में फिल्म के लेखकों में से एक सलीम खान का नाम लेकर फिल्म के लेखन की तारीफ की, तो अपने आप में ये एक बड़ी घटना रही। अधिकतर लोगों को भले पता न हो लेकिन अमिताभ बच्चन ने अपने करियर के उत्कर्ष का जितना श्रेय जावेद अख्तर को दिया है, उस अनुपात में सलीम खान की चर्चा करना वह अक्सर भूल जाते रहे हैं। सलीम खान को ये बात अक्सर अखरती भी रही और जैसा कि वह साफ साफ कहने वाले इंसान रहे हैं, अमिताभ बच्चन की चर्चा चलने पर वह अपने मन की फांस फंसी नहीं रहने देते। फिल्म ‘दीवार’ ही हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्मों की सूची में शुरू की 10 फिल्मों में शुमार फिल्म ‘दीवार’ अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक भारत का भी प्रतिबिंब है। यह अपने पति के लापता हो जाने के बाद भी ईश्वर को मानने वाली एक महिला की कहानी है, जिसका बेटा नास्तिक है। या यूं कह लें कि ये एक ऐसे बिगड़े हुए बेटे की कहानी है, जिसकी प्रेमिका उसके साथ शराब पीती है, सिगरेट के धुएं के छल्ले उड़ाती है और अपने प्रेमी के साथ विवाह से पहले शारीरिक संबंध बनाने में उसे दिक्कत नहीं है। ध्यान रहे कि ये फिल्म 1975 में रिलीज हुई है। आज से ठीक 46 साल पहले।
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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
परवानी बाबी और निरूपा राय के दो किरदार कैसे हिंदी सिनेमा में महिला किरदारों के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुए, इस पर चर्चा करने से पहले थोड़ी सी झलक आपको दे देते हैं, उस दौर के सामाजिक, राजनीतिक परिवर्तनों की। सिनेमा के छात्रों के लिए ये समझना बहुत जरूरी है कि किसी फिल्म को कालजयी फिल्म का दर्जा मिलने के लिए सबसे जरूरी है उसके कथानक का अपने निर्माण के समय की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक झलक देना। या कहें कि आने वाले समय में अगर किसी को उस वक्त का समाज, संबंध या संत्रास देखना हो तो संबंधित फिल्म उसके लिए संदर्भ बिंदु का काम कर सके। फिल्म ‘दीवार’ विश्व सिनेमा का भी संदर्भ बिंदु बरास्ते हॉन्गकॉन्ग बनी। दक्षिण की सारी भारतीय भाषाओं में तो इस फिल्म के रीमेक हुए ही, इसे पूर्वी एशिया के देशों ने हाथोंहाथ लपक लिया। एक ही मां के दो बेटों के कानून के दोनों तरफ आ खड़े होने के भारतीय फिल्मों ‘मदर इंडिया’ और ‘गंगा जमना’ के कथानक का जो शहरी विस्तार सलीम जावेद ने फिल्म ‘दीवार’ में दिया, वह इसी के साथ अंतर्राष्ट्रीय हो गया।

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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
फिल्म ‘दीवार’ और ‘शोले’ की शूटिंग एक ही कालखंड में हुई। अमिताभ बच्चन दिन में शोले की शूटिंग करते और रात को ‘दीवार’ की। ‘शोले’ की शूटिंग खत्म हुई तो फिल्म ‘दीवार’  और फिल्म ‘कभी कभी’ की शूटिंग साथ साथ चलने लगी। फिल्म के निर्देशक यश चोपड़ा को डर लगा रहता कि कहीं एंग्री यंग मैन और कवि के किरदारों में अमिताभ बच्चन लोचा न कर लें लेकिन ऐसा हुआ नहीं। लोचा अमिताभ बच्चन के साथ इस फिल्म में क्या हो सकता था, उससे पहले बात उस समय देश में चल रहे उससे बड़े लोचे की। आजादी के तीस साल होने को थे और देश में भारत-चीन युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद बना देशभक्ति का माहौल धीरे धीऱे अपना असर खो रहा था। ट्रेड यूनियनों पर सरकार हावी हो रही थी। राष्ट्रीयकरण फैशन बन चुका था। बेरोजगारी अपने चरम पर थी। ये वो समय था जब केंद्र की कांग्रेस सरकार अपने विरोधियों को चुन चुनकर जेल पहुंचा रही थी। जे पी नारायण का ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा और भारतीय रेल में पहली बार हुई देशव्यापी हड़ताल ने देश में बढ़ते आक्रोश की झलक दिखा दी थी। याद करेंगे तो फिल्म ‘दीवार’ शुरू ही वहां से होती है जहां एक ट्रेड यूनियन नेता कॉरपोरेट के झांसे में आ जाता है। साथी उसका जीना मुश्किल कर देते हैं। वह मुंह छुपाकर भागता है। बेटा हाथ में लिखा पाता है, ‘मेरा बाप चोर है!’
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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
ये देश की विरासत के पीढ़ी एकांतरण का समय था। रईसों ने अपने बेटों को विरासत में रईसी दी। तमाम नेताओं ने अपने बेटों को विरासत में भ्रष्टाचार दिया और जो जननेता थे, अत्याचारी का मुकाबला करने का साहस रखते थे, उनके बेटों को ये बताने की कोशिश की गई कि तुम्हारा बाप तो चोर है। एक पूरी पीढ़ी के भीतर ये गुस्सा बैठ रहा था कि उसकी पिछली पीढ़ी चोर कैसे हो गई? गुस्सा समाज के उन दबंगों के भीतर भी पनप रहा था जिनके काले धंधे सरकार एक एक कर बंद करवा रही थी। ‘दीवार’ का बिन बाप का बच्चा बड़ा होकर एक गोदी में काम पाता है। वह वहां पर सामान ढोता है। उस जमाने के चर्चित तस्कर हाजी मस्तान की जिंदगी का भी मुंबई का यही पहला चर्चित पड़ाव रहा। विजय फिल्म ‘दीवार’ में मुंबई के सबसे बड़े तस्कर सामंत का वर्चस्व उसके घर मे जाकर  खत्म करता है। हाजी मस्तान ने भी ऐसा ही काम उस समय के सबसे दुर्दांत तस्कर बखिया के घर में घुसकर किया था। कहते तो ये भी हैं कि ये फिल्म हाजी मस्तान की ब्रांडिंग के लिए बनी फिल्म थी। लेकिन, हाजी मस्तान की जिंदगी से फिल्म की समानता बस गोदी और बखिया से आगे नहीं जाती। आगे फिल्म में मां है, मंदिर है, भाई है, पुल है और है बिल्ला नंबर 786 जो विजय को रहीम चाचा देते हैं। उस समय के सामाजिक तानेबाने का ये सबसे बड़ा जीता जागता सबूत है। सलीम-जावेद पर तोहमत कोई कितनी भी लगाए, लेकिन सच ये भी है कि उनके सिनेमा ने भारत के इस धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को मजबूत करने में बहुत योगदान किया है।
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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सन 1973 में फिल्म ‘जंजीर’ की कामयाबी को तुक्का बताने वाले इसके बाद और अगले साल तक लगातार सक्रिय रहे। साल 1974 में अमिताभ बच्चन की चार फिल्में आईं, दो और में वह स्पेशल अपीयरेंस में दिखे। जिन चार फिल्मों में अमिताभ लीड रोल में थे, उनमें से ‘कसौटी’ और ‘बेनाम’ फ्लॉप रहीं। ‘रोटी कपड़ा और मकान’ में मनोज कुमार और जीनत अमान के ही चर्चे होते रहे। लेकिन, साल 1975 की शुरूआत में ही धमाका हुआ। फिल्म ‘दीवार’ के विजय वर्मा ने अमिताभ बच्चन की एंग्री यंगमैन इमेज पर पक्की मोहर लगा दी। पूरे देश में एक अलग तरह के पोस्टर ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा। पीले रंग में पुते शशि कपूर और निरूपा रॉय के चेहरों के साइड में एक लंबा सा फोटो अमिताभ बच्चन का। शर्ट का रंग सुर्ख लाल और कमीज के दोनों हिस्सों की अमिताभ ने कमर पर गांठ लगाई हुई है। ये भी बस संयोग ही था। उस दिन अमिताभ को जो शर्ट मिली वो काफी लंबी थी। अमिताभ ने यूं ही उसमें गांठ लगा दी और फिल्म रिलीज हुई तो ये उस समय के युवाओं का फैशन हो गया। उस समय के नामी पोस्टर डिजाइन दिवाकर करकरे के इस पोस्टर ने हंगामा बरपा कर दिया। उनके चाकू के सहारे पेंट को कैनवस पर एक खास तरीके से सेट करने के हुनर ने इस पोस्टर में अमिताभ के चेहर के गुस्से को एक अलग ही तेवर दिया था। ये और बात है कि यश चोपड़ा के लिए ऐसे तमाम पोस्टर बनाने वाले दिवाकर के रिटायरमेंट के दिन बाद में पुणे में एकांतवास में गुजरे। उनको कष्ट भी रहा कि यशराज फिल्म्स ने कभी किसी खास मौके पर उन्हें याद नहीं किया। ये शिकायत उन्होंने कंपनी के सिल्वर जुबली फंक्शन में न बुलाए जाने पर की भी थी। यशराज फिल्म्स की गोल्डन जुबली देख उन्होंने अभी इसी महीने दुनिया को अलविदा कहा है।
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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
फिल्म ‘दीवार’ को कहने वाले हॉलीवुड फिल्म ‘ऑन द वाटर फ्रंट’ से भी प्रेरित बताते हैं। सिर्फ ‘मदर इंडिया’ और ‘गंगा जमना’ ही नहीं बल्कि बाद में ‘परिंदा’ और ‘गुलाम’ भी करीब करीब इसी कहानी पर बनी फिल्में हैं। और तारीफ की बात ये है कि ये सब फिल्में अलग अलग समय की सुपरहिट फिल्में रही हैं। एन टी रामाराव और रजनीकांत ने भी इसी कहानी पर फिल्में बनाईं और वे भी सुपरहिट रहीं। लेकिन, क्या आपको पता है कि यश चोपड़ा और राजेश खन्ना की बनाई कंपनी यश राज फिल्म्स ने ये फिल्म नहीं बनाई है बल्कि इसके निर्माता है गुलशन राय। जिन्होंने इसके पहले यश चोपड़ा को फिल्म ‘जोशीला’ में भी मौका दिया था। देव आनंद को लेकर बनी फिल्म ‘जोशीला’ फ्लॉप रही, नहीं तो फिल्म ‘दीवार’ में देव आनंद और राजेश खन्ना की जोड़ी बनी होती। तब फिल्म में मां का किरदार वैजयंती माला करने जा रही थीं। देव आनंद को कहानी जमी नहीं तो तय हुआ कि राजेश खन्ना बड़े भाई का रोल कर लेंगे और नवीन निश्चल को मिल जाएगा छोटे भाई का रोल लेकिन राजेश खन्ना और यश चोपड़ा में उन्हीं दिनों ‘अहं’ का टकराव शुरू हो गया थी।

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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
यश चोपड़ा और अमिताभ बच्चन की उन दिनों खूब जमने लगी थी और यश चोपड़ा ने ही इस फिल्म में विजय वर्मा के रोल के लिए अमिताभ बच्चन का नाम पर मोहर लगाई। सलीम खान ने अमिताभ के नाम की सिफारिश इस रोल के लिए यश चोपड़ा से की थी। कहा ये भी जाता है कि ये कहानी पहले अमिताभ के पास आई और फिर वह इसे यश चोपड़ा के पास लेकर गए। फिल्म में अमिताभ के आने के बाद यश चोपड़ा मां का किरदार पहले वहीदा रहमान को देने वाले थे, लेकिन बाद में ये एहसास होने पर कि वहीदा तो उसी समय ‘कभी कभी’ में अमिताभ के अपोजिट हैं, यश चोपड़ा ने ये विचार त्याग दिया। लेकिन, वहीदा रहमान को अमिताभ बच्चन की मां बनना भाग्य में ही लिखा था और वह अमिताभ बच्चन की मां आगे चलकर फिल्म ‘महान’ और ‘कुली’ में बनीं भी। वहीदा रहमान का नाम कटने के बाद फिल्म ‘दीवार’ में निरूपा रॉय की एंट्री हुई और उसके बाद छोटे भाई के रोल में आ गए शशि कपूर। फिल्म में अमिताभ बच्चन को नास्तिक के रूप में दिखाया गया है और असल जिंदगी में अमिताभ बच्चन बहुत बड़े पुजारी हैं। ऐसे में जब फिल्म का वो क्लाइमेक्स वाला सीन शूट करने की बारी आई, जिसमें अमिताभ को भगवान शिव की मूर्ति के सामने मोनोलॉग बोलना था, तो उनकी हिम्मत जवाब दे गई। बताते हैं कि उस दिन सुबह की शिफ्ट में 11 बजे से लेकर रात 10 बजे तक यश चोपड़ा और अमिताभ बच्चन एक बंद कमरे में इस सीन का रिहर्सल करते रहे और फिर जब टेक हुआ तो यह दृश्य हिंदी सिनेमा का ऐतिहासिक सीन बन गया।
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दीवार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
फिल्म ‘दीवार’ को अंग्रेजी में डब करके ‘आइ विल डाई फॉर मामा’ के नाम से रिलीज किया गया था। पश्चिम में तो इसकी ज्यादा हलचल सामने नहीं आई लेकिन पूरब में फिल्म ने तहलका मचा दिया। हॉन्गकॉन्ग के श़ॉ ब्रदर्स ने इसी कहानी को ‘द ब्रदर्स’ के नाम से 1979 में बनाया और फिल्म ‘द ब्रदर्स’ ने आगे चलकर तमाम हॉलीवुड फिल्मों के लिए संदर्भ बिंदु का काम किया। एन टी रामाराव ने इसी कहानी को तेलुगू में ‘मागाडू’ के नाम से बनाया। तमिल में ये फिल्म रजनीकांत ने ‘थी’ के नाम से बनाई। मलयालम में ममूटी के साथ यही फिल्म  ‘नाथी मुथाई नाथी वारे’ के नाम से बनी। पर्शियन और तुर्की भाषा में भी फिल्म ‘दीवार’ के रीमेक बन चुके हैं। बाइस्कोप में आज इतना ही, जल्द ही फिर मिलेंगे किसी और सुपरहिट फिल्म के किस्सों के साथ..!


(‘बाइस्कोप’ कॉलम में प्रकाशित यह आलेख बौद्धिक संपदा अधिकारों के तहत संरक्षित हैं।)
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