हिंदी सिनेमा में जैकी श्रॉफ का नाम उन कलाकारों में गिना जाता है जिन्होंने ‘बाहर’ से आकर फिल्म इंडस्ट्री में न सिर्फ नाम कमाया बल्कि एक समय इसके चोटी के सितारों में गिने गए। 11वीं तक पढ़े जैकी श्रॉफ पर किस्मत एक ट्रैवेल एजेंसी में काम करते वक्त तब मेहरबान हुई जब एक विज्ञापन एजेंसी में काम करने वाले बंदे की नजर उन पर पड़ी और उन्हें अपने जीवन का पहला कमर्शियल हासिल हुआ। उसके बाद देव आनंद की पारखी नजरों ने उन्हें ‘स्वामी दादा’ दिलाई और शो मैन सुभाष घई की नए चेहरों की तलाश ने फिल्म ‘हीरो’। जैकी श्रॉफ के करियर में यूं तो तमाम निर्देशकों ने अहम भूमिका निभाई है लेकिन उनका निर्देशक शशिलाल नायर से याराना हिंदी सिनेमा के तमाम मशहूर किस्सों में शुमार होता है। शशिलाल नायर और जैकी श्रॉफ की फिल्म ‘अंगार’ हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
सलमान की पहली नौकरी
शशिलाल नायर निर्देशित फिल्म ‘अंगार’ की चर्चा शुरू करने से पहले एक दिलचस्प जानकारी आपको ये दे देते हैं कि यही वह निर्देशक हैं जिनके साथ मशहूर राइटर सलीम खान के बेटों सलमान खान और अरबाज खान ने बतौर असिस्टेंट काम करना शुरू किया। ये सिलसिला तीन फिल्मों ‘क्रोध’, ‘परिवार’ और ‘फलक’ तक चला। और, यही वह अभिनेता जैकी श्रॉफ है जो खुद सलमान खान की फोटो खींचते और खुद ही निर्माताओं को ये फोटो दिखाते भी कि इस लड़के को काम दो। जैकी श्रॉफ और सलमान खान का पुराना याराना रहा है। शशिलाल नायर की फिल्म ‘फलक’ के सेट पर जैकी श्रॉफ स्टार हुआ करते थे और सलमान यूनिट के एक असिस्टेंट डायरेक्टर। लेकिन, जैकी ने सलमान को शुरू से बहुत दुलार दिया। ये अलग बात है कि दोनों के बीच एक समय संगीता बिजलानी को लेकर गलतफहमी भी हुई। फिल्म ‘बंधन’ के सेट पर मौजूद लोग बताते हैं कि दोनों के बीच तनातनी बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। माहौल बहुत गरम हो गया था और बड़ी मुश्किल से उस दिन दोनों को शांत किया जा सका। विवाद की वजह बनी थी फिल्म ‘त्रिदेव’ जिसमें जैकी श्रॉफ और संगीता बिजलानी का एक बेहद रोमांटिक और कामुक गाना साथ में फिल्माया गया था।
चंद्रमा जैसी शशिलाल की घटती बढ़ती कलाएं
आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘अंगार’ के बारे में चर्चा शुरू करने से पहले समझ लेते हैं इसके निर्देशक शशिलाल नायर का हिंदी सिनेमा में कद क्या कहता है। सिनेब्लिट्ज नामक पत्रिका में काम करने वाली जर्नलिस्ट माला से शादी करने वाले शशिलाल नायर का हिंदी सिनेमा में अच्छा रुआब रहा है। उनकी बेटी काशवी इन दिनों निखिल आडवाणी के साथ काम कर रही है और जल्द ही अर्जुन कपूर और रकुलप्रीत को लेकर एक फिल्म का निर्देशन करने जा रही हैं। शशिलाल नायर के साथ काम कर चुके पत्रकार मोहन अय्यर बताते हैं, ‘शशिलाल नायर और जैकी श्रॉफ का दोस्ताना बहुत गहरा था। दोनों के बीच एक डायरेक्टर और एक एक्टर से भी बढ़कर रिश्ता था। दोनों ने ‘अंगार’ से पहले फिल्म ‘फलक’ में पहली बार साथ काम किया। उस फिल्म मैं, सलमान खान और अरबाज खान असिस्टेंट डायरेक्टर हुआ करते थे। हम तीनों ने ‘क्रोध’ ‘परिवार’ और ‘फलक’ में असिस्टेंट के तौर पर साथ काम किया। शशिलाल नायर और जैकी श्रॉफ का दोस्ताना इतना गहरा था कि जब जैकी श्रॉफ ने बतौर निर्माता अपनी पहली फिल्म ‘ग्रहण’ बनाई तो भी शशिलाल को ही डायरेक्टर लिया।’ दोनों ने ‘वन टू का फोर’ में भी साथ में काम किया, जिसमें शाहरुख खान हीरो था और जूही चावला हीरोइन। शशिलाल नायर की आखिरी फिल्में ‘एक छोटी सी लव स्टोरी’ और ‘लोलिता’ काफी विवादित रही थीं। ‘लोलिता’ में जब जैकी श्रॉफ ने एक किशोरी के साथ उत्तेजक दृश्य करने से मना कर दिया था तो शशिलाल नायर ने उन्हें एग्रीमेंट का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई तक की धमकी दे डाली थी। बाद में, शशिलाल ने मीना कुमारी की बायोपिक बनाने की भी विफल कोशिश की।
शहरी अपराध गाथाओं की शुरुआती कड़ी
आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘अंगार’ शहरी अपराधों पर बनी एक ऐसी फिल्म है जिसमें देश में तेजी से बदलते सामाजिक ताने बाने को दिखाया गया है। ये उस दौर की फिल्म है जब गरीब उसूलों पर डटे रहने के लिए जान देने पर उतारू है और अमीर पैसे कमाने के लिए किसी की भी जान लेने पर उतारू है। ये एक ऐसे आम आदमी की कहानी है जो अपने आसपास के माहौल को बचाने के लिए अंडरवर्ल्ड से भिड़ जाता है। उसकी लड़ाई सामाजिक उसूलों की है और उसके सामने जो रावण है वो सामाजिक भय पैदा करना चाहता है। शहरी अपराधियों के नेताओं और काराबोरियों से बनते जालबट्टे पर बनी ये उस शुरूआती दौर की फिल्म है जिसने आगे चलकर सुधीर मिश्रा को ‘इस रात की सुबह नहीं’ और राम गोपाल वर्मा को ‘सत्या’ जैसी फिल्में बनाने की हिम्मत दी। शशिलाल नायर और रामगोपाल वर्मा दोनों ही एक दूसरे के सिनेमा का सम्मान करने वाले निर्देशक रहे हैं। तभी तो जब शशिलाल को ये पता चला कि रामू एक बुजुर्ग और एक किशोरी की प्रेम कहानी ‘निशब्द’ बनाने जा रहे हैं, जिसकी कहानी उनकी फिल्म ‘लोलिता’ से मिलती जुलती है तो पहला फोन रामू को शशिलाल ने ही किया।
असली डॉन की कहानी?
शशिलाल नायर निर्देशित फिल्म ‘अंगार’ कई मायनों में हिंदी सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्म मानी जाती है। कुछ कुछ हॉलीवुड फिल्म ‘गॉडफादर’ की कहानी जैसी आगे बढ़ती इस फिल्म के बारे में ये भी कहा जाता है कि इसे करीम लाला की छवि सुधारने के लिए वैसे ही बनाया गया जैसे यश चोपड़ा की फिल्म ‘दीवार’ हाजी मस्तान की छवि सुधारने के लिए बनी थी। ऐसी ही एक फिल्म उमेश मेहरा की ‘मुजरिम’ भी बताई जाती है कि जिसका असली उद्देश्य पता चलने पर मिथुन दुबई की शूटिंग छोड़ वापस भारत आ गए थे। और, बहुत पंगों के बाद ही इसकी शूटिंग मुंबई में हो सकी थी। ये फिल्में अपराधियों का महिमामंडन करने के लिए नहीं बनीं, बल्कि इन्हें बनाने के पीछे का मकसद दुनिया को ये बताना रहा कि मुंबई के तमाम बड़े अपराधी हालात से मजबूर होकर बंदूक उठाने को मजबूर हुए और इनके अपराधों के लिए इन्हें बल्कि समाज को दोषी ठहराना चाहिए। संजय दत्त ने ऐसी ही एक फिल्म ‘वास्तव’ की थी।
कादर खान के संवादों का कमाल
‘अंगार’ में जैकी श्रॉफ और नाना पाटेकर आमने सामने हैं। दोनों की भिड़ंत इससे पहले विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में भी हो चुकी थी। इन सारी फिल्मों का जिक्र यहां इसलिए भी है कि हिंदी सिनेमा में जब भी अपराध आधारित कोई फिल्म बनती तो मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा जैसे निर्देशक इसे पूरा फिल्मी बनाने में कोई कसर नही छोड़ते। यहां तक कि बाद में आए टीनू आनंद जैसे निर्देशक भी ‘कालिया’ के बहाव में बह गए। बिना अतिशय नाटकीयता के बनी अपराध फिल्मों का जो सिलसिला ‘परिंदा’ और ‘मुजरिम’ जैसी फिल्मों से शुरू हुआ उसे ‘अंगार’, ‘इस रात की सुबह नहीं’ और ‘सत्या’ जैसी फिल्मों ने एक नए मुकाम तक पहुंचाया। तारीफ करनी होगी इन सारी फिल्मों की लेखकीय टीमों की जिन्होंने खुद पर संयम रखते हुए अपनी कहानियों के किरदारों को नौटंकी से बचाए रखा और कहानियों की नाटकीयता को एक दायरे में बांधे रखा। फिल्म ‘अंगार’ के तो संवाद भी काफी प्रभावशाली रहे और इन्हें लिखने के लिए कादर खान को सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला।
कहानी चॉल में रहने वाले जग्गू की
फिल्म ‘अंगार’ की कहानी एक चॉल में रहने वाले जग्गू की कहानी है। वह अपने माता पिता (अच्युत पोतदार औऱ सुलभा देशपांडे) के साथ रहता है। बेरोजगार है। मुसीबतें उसके पास बिन बुलाए आ जाती हैं। लेकिन, जग्गू दिल का सच्चा इंसान है। मिली भी उसे यूं ही मिली है। बस्ती के लोग भी उसे प्यार करते हैं। इस हंसती खेलती बस्ती पर नजर पड़ती है माजिद नाम के बिल्डर की जो दरअसल अंडरवर्ल्ड डॉन जहांगीर खान का बेटा है। माजिद बस्ती की जमीन हासिल करने के लिए हर दांव खेलता है। जग्गू पर उसका तुरुप का पत्ता भी फेल होता है तो वह बस्ती खाली कराने के लिए खतरनाक साजिश रचता है। इस बीच माजिद के भाई का कत्ल हो जाता है और जग्गू को जेल हो जाती है। मिली पर मुसीबतें आती हैं। जग्गू को ये सब जेल में पता चलता है और फिर सुलग उठते हैं एक साथ कई कई ‘अंगार’। माजिद के किरदार में नाना पाटेकर ने कमाल की अदाकारी इस फिल्म में की है। इस किरदार को करने के लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट विलेन अवार्ड भी मिला, हालांकि नाना इस बात को लेकर पिनपिनाते रहे कि वह फिल्म के विलेन नहीं हैं। उन्हें तो बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिलना चाहिए। शशिलाल नायर की झोली में इस फिल्म ने बेस्ट स्पेशल इफेक्ट्स का नेशनल फिल्म अवार्ड भी डाला।
आनंद बक्षी का जीवन दर्शन
फिल्म ‘अंगार’ को बॉक्स ऑफिस पर अच्छी सफलता मिली। साल 1992 में रिलीज हुई फिल्मों में कमाई के मामले मे ये टॉप 10 फिल्मों में नौवें नंबर पर शामिल रही। फिल्म को जब भी याद किया जाता है तो नाना पाटेकर और जैकी श्रॉफ के किरदार तो याद आते ही हैं, साथ ही चेहरे के सामने एक रील की तरह घूम जाते हैं कादर खान, मजहर खान, डिंपल कपाड़िया और किरन कुमार के किरदार। फिल्म को परदे पर इसकी अंतर्धारा के करीब रखते हुए पेश किया था सिनेमैटोग्राफर ईश्वर बिदरी ने। मिनिएचर टेकनीक के सहारे बिदरी और नायर ने फिल्म में कुछ विशिष्ट दृश्य रचने में भी कामयाबी पाई और इन्होंने उस साल की नेशनल फिल्म अवार्ड्स ज्यूरी को भी प्रभावित किया। वामन भोसले और गुरुदत्त शिराली की एडिटिंग ने फिल्म को आखिर तक चुस्त बनाए रखा। फिल्म का संगीत खासतौर से यहां उल्लेखनीय है क्योंकि इस फिल्म में एस पी बालासुब्रहमण्यम ने अपने करियर के दो शानदार हिंदी गीत गाए हैं। फिल्म में एक डांडिया गीत ‘चल आगे और देख पीछे’ सुदेश भोसले और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया है। इस एक गाने ने फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर काफी मदद बी की। फिल्म में एक गाना और भी उल्लेखनीय है, ‘मुश्किल में है कौन किसी का..’। एसपीबी के सुरों और आनंद बक्षी के शब्दों ने जितना बेहतरीन जीवन दर्शन प्रस्तुत इस गाने में समझाया है, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने उतना ही जानदार संगीत भी इस गाने का दिया है, सुनिए यहां..
चलते चलते..
फिल्म ‘अंगार’ में जो रोल नाना पाटेकर ने किया है वह रोल जैकी श्रॉफ ने एक बार अनुपम खेर को भी सुनाया था। अनुपम इस रोल को करने के लिए बहुत उत्साहित भी थे। वह शशिलाल से मिले। दोनों में बातें हुईं। अनुपम को लगा था कि जैकी श्रॉफ उनके लिए सिफारिश करेंगे पर फिल्म नाना पाटेकर को लेकर शुरू हो गई। बताते हैं कि इसे लेकर अनुपम और जैकी के रिश्तों में थोड़ी बहुत कड़ुवाहट भी कुछ दिनों तक रही। दूसरों के लिए फिल्में निर्देशित करते रहे शशिलाल इसी फिल्म से निर्माता भी बने। वह ‘अंगार’ में अपनी पिछली फिल्म ‘क्रोध’ के हीरो सनी देओल को ही रिपीट करना चाहते थे, जिसकी वजह से डिंपल कपाड़िया ने भी फिल्म साइन कर ली थी लेकिन बाद में उनकी जगह जैकी आए तो डिंपल ने फिल्म छोड़ने का मन बना लिया। उनकी जगह शिल्पा शिरोडकर को लेने की चर्चा भी शुरू हो गई थी, पर बाद में डिंपल ने हां कर दी। फिल्म ‘अंगार’ की रीमेक बनाने की चर्चा भी कुछ साल पहले शुरू हुई थी। एंडमॉल नामक कंपनी ने तब इसे अभिषेक बच्चन के साथ बनाने की तैयार की थी लेकिन रीमेक राइट्स के लिए जितने पैसे शशिलाल नायर मांग रहे थे, एंडमॉल इंडिया उतने देने को तैयार नहीं थी। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।