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Apna Adda 08: पैकअप हुआ, अमिताभ बच्चन सामने से निकले और मैंने आवाज लगा दी, वह मुड़े, मैं घबराया और फिर...

Wed, 13 Mar 2024 10:37 AM IST
शुभम शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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नलनीश नील - फोटो : अमर उजाला

कैमरे के सामने आने का मौका भर मिल पाना मुंबई आने वाले संघर्षशील कलाकारों के लिए एक बड़ी उपलब्धि रहती है। हर साल देश दुनिया के तमाम स्कूलों, विद्यालयों और महंगे इंस्टीट्यूशनों से एक्टिंग सीखकर हजारों युवा हिंदी सिनेमा में किस्मत आजमाने मुंबई आते हैं। कंपटीशन आईआईटी और सीपीएमटी से भी तगड़ा होता है लेकिन सपनों की दुनिया ऐसी ही है कि एक बार जो यहां आ गया तो जल्दी जल्दी घर लौटता नहीं है। और, जब जिद ऐसी हो तो फिर सफलता भी झक मारकर पास आती ही है। ऐसी ही कहानी है पीलीभीत से निकले रंगमंच के बेहतरीन कलाकार नलनीश नील की। मुंबई में अपनी पहचान बना रहे नए कलाकारों की सफलता की कहानियां उनके गांव, गली, चौबारे तक पहुंचाने की बैठकी ‘अपना अड्डा’ में आए नलनीश नील के पास किस्से बहुत हैं, ‘अमर उजाला’ के पाठकों के लिए उन्हीं में से चंद यहां पेश हैं..

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नलनीश नील - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सत्यजीत रे आइकन अवार्ड 2024 की आपको बहुत बधाई, नलनीश! ये बताएं कि अभिनय की तरफ झुकाव कब और कैसे हुआ? 
शायद टेलीविजन ने ये शौक मेरे भीतर डाला। दूसरों के घरों पर जाकर टीवी पर आने वाली फिल्में देखते थे और कई बार वहां से भी भगा दिए जाते थे। पिताजी रीतराम बीसलपुर (पीलीभीत) की एक फैक्ट्री में चौकीदार थे, लेकिन मुझे रोते देखा तो एक दिन टेलीविजन खरीदकर ले आए। घर पर टीवी आया तो फिल्में देखने का शौक भी बढ़ा। ननिहाल जाने पर वीसीआर पर फिल्में देखने का मौका मिलता और शायद इसी सब के बीच लगा कि एक्टर बन जाना चाहिए।
 

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नलनीश नील - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिर..?
छोटे शहरों और कस्बों के बच्चों को कोई ये बताने वाला नहीं होता कि जो सपना देखा है, उसे पूरा करने का सही रास्ता क्या है। 18-19 साल का था और उन दिनों अखबारों में फिल्मों और सीरियल में काम करने के लिए इच्छुक लोगों के लिए विज्ञापन निकला करते थे। ऐसे ही एक विज्ञापन में मेरा भी सेलेक्शन हुआ तो मैं बहुत खुश हुआ। तब दिल्ली में रहने वाले चाचा जी ने समझाया कि ये सब फ्रॉड लोग होते हैं, मेरा तो दिल ही टूट गया था।  

 

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नलनीश नील - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

लेकिन, आपने अभिनय की जिद नहीं छोड़ी...?
हां, मेरा मानना है कि जिद करने से वाकई आपकी दुनिया बदल सकती है। हमारे गांव उगनपुर मरोरी से पीलीभीत नजदीक है लेकिन वहां रंगमंच के नाम पर कुछ होता नहीं है। शाहजहांपुर वहां से 50 किलोमीटर दूर है, पर वहां थियेटर होता है। राजपाल यादव का वहां रुतबा रहा है। बीसलपुर से स्नातक होने के बाद मैं शाहजहांपुर आया तो लोग तंज कसने लगे कि हर कोई राजपाल यादव नहीं बन सकता। दिलीप आनंद से वहीं मुलाकात हुई। राजपाल यादव ने भी उनके साथ काफी वक्त गुजारा है। दिलीप के साथ ही पहला नाटक 'झलक दिखला जा' किया, फिर नुक्कड़ नाटकों का सिलसिला चल निकला। शादियों में वीडियोग्राफी भी करता था। साथ ही नाचना और मारधाड़ करना भी सीखता रहा।
 

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नलनीश नील - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चयन के लिए जो शर्तें हैं, उसका अनुभव कैसा रहा?
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में चयन की पहली शर्त है, 10- 12 नाटकों में काम करने का अनुभव। मैंने नाटक तमाम कर लिए थे, लेकिन प्रमाण पत्र कोई देता नहीं था। थियेटर में भी राजनीति चलती रहती है। फिर मेरा चयन लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादमी में हो गया। इसके लिए जिस दिन मेरा इंटरव्यू होना था, मुझे याद है मैं वहां अकादमी के पास गणेशजी की एक प्रतिमा के पास खड़े होकर रो रहा था। गणेशजी की कृपा से ही मेरा वहां एडमीशन हुआ और वहां से निकलकर 2010 में मुंबई आने से लेकर अब तक उनकी कृपा बहुत रही है। आगे भी वह जिधर ले जाएंगे, सही रास्ता ही होगा।
 

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नलनीश नील - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

तो, मुंबई आने के बाद कैमरे के सामने पहला रोल क्या मिला?
महुआ चैनल का एक धारावाहिक था 'इम्तिहान'। बताया गया कि चार-पांच दिन का काम है और एक दिन का हजार रुपये मिलेगा। मैं खुशी खुशी पहले ब्रेक के लिए पहुंच गया। वहां गया तो गुंडों के साथ लाठी पकड़ाकर खड़ा कर दिया। पैसे भी तुरंत नहीं मिले। जिसने काम दिलाया, उसने चार सौ रुपये कमीशन काट लिया और छह सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से जो पैसे मिले, वह भी छह महीने के बाद।

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नलनीश नील - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मुंबई आने के बाद राजपाल यादव से नहीं मिले

राजपाल यादव उन दिनों फिल्म 'अता पता लापता' बना रहे थे। इस फिल्म में 175 कलाकारों ने काम किया था। राजपाल यादव से मिलने जो भी आता था, उसे वह अपनी फिल्म में काम दे देते थे। उस फिल्म की शूटिंग के दौरान मैंने बहुत सारी तकनीकी चीजें सीखीं। वहीं से यशराज फिल्म्स में ऑडिशन देने गया तो मुझे फिल्म 'शुद्ध देसी रोमांस' में काम करने का मौका मिला। 
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तो अब तक आपका सफर कैसा रहा?
ये तो तय है कि जहां भी मुझे अभिनय का मौका मिला है, लोग संतुष्ट नजर आते हैं। लेकिन, मेरा सफर अभी थोड़ा कठिन है। मंजिल दूर है पर थकना नहीं है। कई बड़ी फिल्मों में छोटे छोटे रोल करता रहा हूं। छोटे परदे के अपराध धारावाहिकों में तो खूब काम किया है। बीच में बीमा कंपनी का एजेंट भी बना। फिल्म 'थ्री स्मोकिंग बैरेल्स' में बड़ा रोल मिला और यहीं से ठोस पहचान भी बनी। 'गुलाबो सिताबो' में अमिताभ बच्चन के साथ काम करना अब तक के सफर की सबसे अच्छी याद है।

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नलनीश नील - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अच्छा, कोई खास लम्हा उनके साथ का जो आप पाठकों के साथ साझा करना चाहें?

फिल्म 'गुलाबो सिताबो' में मैंने अमित जी के साथ 45 दिन काम किया। उनके साथ पहले एक विज्ञापन फिल्म में भी काम कर चुका था। लेकिन उनके साथ तब फोटो नहीं खिंचवा पाया था। 'गुलाबो सिताबो' की शूटिंग के आखिरी दिन मैंने सोच रखा था कि आज ये मौका जाने नहीं देना है। पैकअप के बाद बच्चन साहब जैसे ही सामने से गुजरे। मैंने हड़बड़ाकर पीछे से आवाज लगा दी। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो मेरी तो हवा टाइट हो गई। लेकिन, उन्होंने बहुत सहज भाव से पूछा, ‘क्या बात है?’ मैं सकपका गया। यहीं भूल गया कि फोटो खिंचवानी है। हड़बड़ाहट में मेरे मुंह से निकल गया कि मेरे माता-पिता को आपसे बात करनी है। वह मुस्कुराए। इशारा किया कि कपड़े बदलकर आता हूं। वह लौटकर आए। मुझे बुलाया और वीडियो कॉल पर मेरे माता-पिता से बात की। 

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आने वाले दिनों में दर्शक आपको किन कहानियों में देखेंगे?
अभिनेता श्रेयस तलपड़े के साथ हाल ही में एक वेब सीरीज 'मन्नू और मुन्नी की शादी’ पूरी की है। इसके अलावा एक वेब सीरीज निठारी कांड पर भी बन रही है, 'गोश्त'। कुछ और कहानियों और किस्सों पर काम चल रहा है। मैं चूंकि प्रशिक्षित अभिनेता हूं तो चाहता हूं कि इस क्षेत्र में जो लोग बिना किसी प्रशिक्षण के आ गए हैं, उनकी मदद करूं। मैं नियमित अभिनय प्रशिक्षण देता हूं। इसके अलावा और भी कुछ सामाजिक कार्यों में समय लगाता रहता हूं।

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