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Sunday Must Watch: बीते हफ्ते की सारी सीरीज के रिव्यू यहां पढ़ें एक साथ, शेफाली शाह के आगे लाइगर, टाइगर सब फेल

सार

इस सप्ताहांत बड़े परदे से लेकर ओटीटी पर कहानियों और किस्सों की भरमार रही। निर्देशक पुरी जगन्नाथ सिनेमाघरों में अपनी तीसरी हिंदी फिल्म ‘लाइगर’ लेकर आए। ओटीटी पर फ्री की वेब सीरीज ‘प्लीज फाइंड अटैच्ड’ का तीसरा सीजन आया।
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Web series - फोटो : Social media
इस सप्ताहांत बड़े परदे से लेकर ओटीटी पर कहानियों और किस्सों की भरमार रही। निर्देशक पुरी जगन्नाथ सिनेमाघरों में अपनी तीसरी हिंदी फिल्म ‘लाइगर’ लेकर आए। ओटीटी पर फ्री की वेब सीरीज ‘प्लीज फाइंड अटैच्ड’ का तीसरा सीजन आया। माधव मिश्रा ‘क्रिमिनल जस्टिस-अधूरा सच’ में आधे अधूरे से लौटे। रानी भारती के दरबार में सियासत की नई गोटियां ‘महारानी’ के दूसरे सीजन में चली जा रही हैं और डीसीपी वर्तिका चतुर्वेदी निकल पड़ी है दिल्ली की गलियों में दहशत का दूसरा नाम बन चुके एक गिरोह का खात्मा करने वेब सीरीज ‘दिल्ली क्राइम’ के दूसरे सीजन में। जब इतना कुछ देखने को हो तो क्या देखें और क्या ना देखें, इसी में आधा वक्त गुजर जाता है। तो चलिए आपको बताते हैं इन सारी वेब सीरीज और फिल्म की कहानियां और इनके असर के बारे में सिलसिलेवार ढंग से...
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दिल्ली क्राइम सीजन 2 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दिल्ली क्राइम सीजन 2: नेटफ्लिक्स

वेब सीरीज ‘दिल्ली क्राइम’ का सीजन 2 सीधे अपने मुद्दे पर आता है। किरदार सारे पहले सीजन में ही पहचाने जा चुके हैं लिहाजा उनका अतीत या उनका वर्तमान सजाने की सीरीज कोशिश नहीं करती। ये सीरीज कहानी की आंखों में आंखे डालकर घूमते कैमरे के साथ फुर्ती से आगे बढ़ती है। सीरीज देखते समय अपराधियों से घिन भी होती है। पुलिस वालों से सहानुभूति भी होती है और सिस्टम से नाराजगी भी मन में आती है। एक पुलिस इंस्पेक्टर है जिसकी अपनी बेटी से सिर्फ इसलिए बातचीत बंद है क्योंकि वह उसकी शादी जल्दी से जल्दी करा देना चाहता है। एक आईपीएस अफसर है जिसके पति को उसके साथ बस कुछ वक्त बिताना है। वह अपनी पोस्टिंग से छुट्टी लेकर घर पर है और बीवी दिल्ली में हो रही सिलसिलेवार हत्याओं की तफ्तीश में व्यस्त है। और, इन सबकी मुखिया है डीसीपी वर्तिका चतुर्वेदी। ये सीरीज इस रविवार के लिए परफेक्ट बिंज वॉच है।

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महारानी सीजन 2 - फोटो : social media
महारानी सीजन 2: सोनी लिव

वेब सीरीज ‘महारानी’ के दूसरे सीजन ने उस श्राप से भी मुक्ति पाई है जो अक्सर वेब सीरीज के दूसरे सीजन के कांधे आ बैठता है। किसी कामयाब सीरीज का दूसरा सीजन बनाना सबसे मुश्किल काम रहा है। यहां पसंघा सुभाष कपूर के पलड़े में इसलिए है क्योंकि सीरीज का पहला सीजन कमजोर निकलने के बावजूद ओटीटी ने इसके दूसरे सीजन को हरी झंडी दी और सुभाष कपूर ने इस मौके को बेकार नहीं जाने दिया। पहले सीजन से कहीं बेहतर बने इसके दूसरे सीजन में पहले सीन से ही रानी भारती निशाने पर हैं। सूबे की सरकार चलानी है। घर में तीन बच्चे हैं और जेल से हर पल उसके खिलाफ साजिशें रची जा रही हैं। ये सीरीज भी अच्छी है और देखी जानी चाहिए।

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क्रिमिनल जस्टिस सीजन 3 - फोटो : social media
क्रिमिनल जस्टिस-अधूरा सच: डिज्नी+ हॉटस्टार

बीबीसी स्टूडियोज की हिट सीरीज के हिंदी रूपांतरण वेब सीरीज ‘क्रिमिनल जस्टिस’ (Criminal Justice) के साथ भी वही दिक्कत है जो अप्लॉज एंटरटेनमेंट की उधार की विदेशी कहानियों में शुरू से रही है। इनका लेखन भारतीय दर्शकों की सोच और पसंद के हिसाब से नहीं है। कंपनी ने इसके लिए कोई ऐसा सलाहकार भी नहीं रखा है जो उनको बता सके कि गड़बड़ी कहां हो रही है। सीरीज अंग्रेजी सीरीज के दर्शकों की पसंद के हिसाब से बनी है लेकिन भौगोलिक स्थितियां पूरी तरह बदल जाने के बाद भी इसका लेखन वैसा ही रहता है। एक लाइन में कहें तो सीरीज में करंट नहीं है। सुस्त सा लेखन और ऊपर से निर्देशन भी ऐसा जैसे कि बस एक सीरीज बना देने भर के लिए रोहन सिप्पी लगे हुए हैं।

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प्लीज फाइंड अटैच्ड सीजन 3 - फोटो : सोशल मीडिया
प्लीज फाइंड अटैच्ड सीजन 3: अमेजन मिनी टीवी

वेब सीरीज ‘प्लीज फाइंड अटैचड’ (Please Find Attached) का तीसरा सीजन उन लोगों के लिए ही मुफीद है जिनके पास मोबाइल पर बिताने को ढेर सारा टाइम है। हर चार पांच मिनट बाद एक विज्ञापन है जिसे यूट्यूब की तरह आप स्किप नहीं कर सकते। अमेजन मिनी टीवी का मूल मंत्र यही है। फ्री की वेब सीरीज के साथ ढेर सारे विज्ञापन। इन विज्ञापनों के चलते कहानी का तारतम्य बिगड़ता है जो आप देख रहे होते हैं, उसका मजा खराब होता है। पहले एपीसोड के हिसाब से देखें तो इसकी पटकथा भी खास चुस्त नहीं है। साल्सा ट्रेनिंग का हिस्सा बिना किसी खास मकसद के लंबा खिंचता है और बोर करने लगता है।

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लाइगर रिव्यू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
लाइगर: सिनेमाघरों में

लड़ना, भिड़ना और जीतना एक इंसानी जज्बा है। इस जज्बे की कद्र जब भी कहानी में कायदे से की जाती है। फिल्म हिट होती है। फिल्म के निर्माता करण जौहर ने अपने पिता यश जौहर को याद करते हुए अपने पिछले इंटरव्यू में मुझसे कहा था, ‘ए हिट फिल्म इज ए गुड फिल्म’। और, ‘लाइगर’ एक गुड फिल्म नहीं है। ये दर्शकों के धैर्य का इम्तिहान लेती फिल्म है। कहानी ठीक से बघारी भी नहीं गई होती है कि पुरी जगन्नाथ इसमें गानों का तड़का लगाना शुरू कर देते हैं। फिल्म यहीं से लंगड़ी हो जाती है। हीरो के लिए दर्शकों की सहानुभूति जुटाने को वह उसे हकला भी बनाते हैं लेकिन यहां उसकी हकलाहट नकली लगती है। हकलाहट के मनोविज्ञान को ढंग से समझ कर उसे फिल्म के नायक का हथियार भी बनाया जा सकता था और इस हकलाहट की वजह अगर अतीत की कोई घटना होती तो मामला बेहतर जम सकता था।

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