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पूर्वांचल के व्यापार और राजनीतिक गठजोड़ को दर्शाती है वेब सीरीज मिर्जापुर की कहानी

Fri, 16 Nov 2018 09:13 PM IST
अभिनव चौहान
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वेब सीरीज : मिर्जापुर
निर्देशक, पटकथा: करन अंशुमान, पुनीत कृष्णा
निर्माता: फरहान अख्तर, रितेश सिदवानी
पात्र: पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु शर्मा, स्वेता त्रिपाठी, विक्रांत मैसी, श्रेया पिलगांवकर, कुलभूषण खरबंदा
स्टार रेटिंग: 4/5
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अमेजन प्राइम वीडियो पर मिर्जापुर वेब सीरीज आखिरकार रिलीज हो ही गई। वेब सीरीज ने हिंदुस्तान के उभरते निर्देशकों और पटकथा लेखकों को जो अवसर दिए हैं उनको वह विश्व स्तरीय कैसे बना सकते हैं उसकी झलक मिर्जापुर में दिखाई देती है। खून खराबे के दृश्य देखते हुए आपको हॉलीवुड के 300-राइजिंग ऑफ एन एंपायर जैसे विश्वस्तरीय एडीटिंग का एहसास होगा। मुंबई मूल के होने के बावजूद करन अंशुमन ने जिस तरह से सीरीज में जान डाली है वह देखने लायक है। सीरीज दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब दिखाई देती है इसकी बड़ी वजह उसमें कलाकारों की सशक्त एक्टिंग है।
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सीरीज का टीजर देखकर अगर आपको लग रहा है कि यह आपको गैंग ऑफ वासेपुर जैसा मसाला पेश करेगी तो ये गलतफहमी हो सकती है। मिर्जापुर में कालीन के कारोबार और उसकी आड़ में सामाजिक वर्चस्व कायम करने के लिए किए जाने वाले धंधों को निभाने में क्या कुछ होता है, कैसे पुलिस, राजनीतिज्ञों से गठजोड़ किया जाता है यह सब कुछ इसमें फिल्माया गया है। इसके अलावा कॉलेज की राजनीति पूर्वांचल में जैसे की जाती है वैसी है। लड़कपन का प्यार देखने को नहीं मिलेगा। असल जिंदगी में एक व्यस्क के जीवन में प्यार के नाम पर जो कुछ घट सकता है उसे  दिखाया गया है। लिहाजा आपको वो सब कुछ स्क्रिप्टेड नहीं लगेगा।

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वेब सीरीज मिर्जापुर के कालीन कारोबार, तमंचों के धंधे और पुलिस-राजनीतिज्ञों के इर्द-गिर्द घूमती है। वेब सीरीज की एक बड़ी खासियत है कि यह बडे़ पर्दे की तरह केवल एक ही नाम या पात्र पर केंद्रित नहीं रहती। बल्कि हर पात्र को उसके किरदार को पूरी तरह निभाने का मौका देती है। वो इसमें दिखाई देता है। कालीन के बड़े कारोबारी अखंडानंद त्रिपाठी उर्फ कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) के साम्राज्य का बोलबाला मिर्जापुर में हैं। उनके बेटे फूलचंद त्रिपाठी उर्फ मुन्ना भैया (दिव्येंदु शर्मा) शहर में अपना सिक्का जमाने के लिए हर कोशिश में लगे हुए हैं। इसी शहर के साधारण वकील रमाकांत पंडित (राजेश तैलंग) अपनी ईमानदारी को पूरी शिद्दत से निभाते हैं।
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कॉलेज की राजनीति से लेकर विधानसभा की राजनीति तक हर गठजोड़ दिखाई देता है। पुलिस का अच्छा और बुरा दोनों किरदार दिखाए गए हैं। उनकी मजबूरी और जरूरत को भी बेहतर तरीके से प्रदर्शित किया गया है। पंकज त्रिपाठी का किरदार ज्यादा सशक्त है। अपने बिहारी होने की खासियत उन्होंने इस सीरीज में इस्तेमाल की है। पूर्वांचल को वो अच्छे से जानते हैं लिहाजा उनकी एक्टिंग में यह दिखाई देता है। एक बाहुबली की गंभीरता को उन्होंने निभाते हुए किरदार के साथ न्याय किया है। अली फजल मूल रूप से लखनऊ से हैं तो उत्तर प्रदेश का पूरा पुट देने में कामयाब दिखाई दिए हैं।
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दिव्येंदु बड़े पर्दे पर अपने कॉमिक रोल के लिए पसंद किए जाते रहे हैं। लेकिन यहां उनके अभिनय का नया पक्ष देखने को मिला है। एक बाहुबली के बिगड़े नवाबजादे की हरकतों को किरदार के जरिए उभारने में वह कामयाब रहे हैं। बाकी किरदार भी अपने साथ न्याय करते दिखाई देते हैं। पूर्वांचल के समाज में महिलाओं को कारोबार की भूमिका में कम ही रखा जाता है। सीरीज और पटकथा की मांग के अनुसार हर एक स्त्री पात्र को पर्याप्त तरीके से दर्शाया गया है। एक सिद्धांतवादी पिता और समाज की चकाचौंध और बदलते माहौल में अपने परिवार के लिए सुरक्षा के लिए बहकने वाले बेटों के बीच का द्वंद्व बखूबी फिल्माया गया है।
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पूर्वांचल में दो समाज हैं एक उच्च वर्गीय और एक निम्न वर्गीय, मध्यम वर्गीय समाज वहां गायब है इसलिए बड़े उद्योग होने के बाद भी वहां विकास न होना एक बड़ी वजह है। करन अंशुमान ने निर्देशन के दौरान इस बात का ख्याल रखा है और उसे दर्शाया है। एक जगह कमी जरूर दिखाई देती है, मीडिया की। पूर्वांचल में पत्रकारिता भी बेबाकी के साथ की जाती है और अवेध धंधों में पत्रकारों के लिप्त होने या मजबूती से विरोध करने का एक पक्ष सीरीज में गायब दिखाई दिया। डायलॉग अच्छे हैं, फिल्मांकन और अभिनय भी जबरदस्त है।

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सीरीज में सभी कुछ अच्छा नहीं हैं। कुछ कमियां भी दिखाई देती हैं। फ्रेम में अंधेरा और डिम लाइट कई जगह उसे कमजोर करती है। तमंचे के धंधे में लिप्त होने के बाद भी बाहुबलियों के आसपास एके-47 या अधुनिक हथियार लेकर उनके बॉडीगार्ड नहीं चलते हैं। उनके पास पिस्टल या रिवॉल्वर ही मिलेगी। सीरीज के कुछ दृश्यों में अंग रक्षकों के साथ एके-47 जैसे असलहे दिखाई देते हैं जो कई बार आपको थोड़ा सा काल्पनिक अनुभव करवा सकते हैं।
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पहले ही एपीसोड में बाहुबली के बेटे का साधारण वकील के घर आकर धमकाने और जानलेवा हमले, मारपीट के पूरे हमले के बाद भी एक वकील का केस न करना, बाहुबली अखंडानंद त्रिपाठी और वकील रमाकांत पंडित का आमना-सामना न होना एक कमी अनुभव करवाता है। यहां निर्देशक ने सवाल खड़े करने की जगह छोड़ दी है। पूर्वांचल के कॉलेजों में बेशक दबंगई से छात्र राजनीति होती है लेकिन चलती कक्षा में एक टीचर के सामने बाहुबली के बेटों की भी हिम्मत नहीं होती दबंगई दिखाने की। वहां के शिक्षक भी पूरी ठसक से नौकरी करते हैं। निर्देशक यह दिखाने में असफल रहे हैं और भी कई कमजोरियां फिल्मांकन के दौरान आपको मिल सकती हैं। लेकिन 18 से 32 की आयु वर्ग के दर्शकों को एक अच्छा सिनेमा देखने को जरूर मिलेगा जो कल्पना जगत से काफी दूर होगा।
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