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Ustad Amir Khan: 'तराने का तानसेन’ थे उस्ताद अमीर खां, शास्त्रीय संगीत और गायकी से बांध देते थे समां

Tue, 15 Aug 2023 09:22 AM IST
साक्षी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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उस्ताद अमीर खां - फोटो : अमर उजाला
हिंदुस्तान में शास्त्रीय संगीत के कई उस्ताद रहे हैं, जिन्होंने अपने संगीत के हुनर से दुनियाभर में खूब नाम कमाया। उन्हीं में से एक थे उस्ताद अमीर खां। उस्ताद अमीर खां से ही हिंदुस्तान में शास्त्रीय संगीत की मौजूदगी थी। गीत-संगीत, तानें और गजलें बच्चों-बच्चों के जुबान पर चढ़े रहते थे। शास्त्रीय संगीत की समझ में उनका कोई हाथ नहीं पकड़ सकता था। हिंदुस्तान के शास्त्रीय संगीत को देश-दुनिया तक फैलाने वाले उस्ताद आमिर खान का आज जन्मदिवस है। चलिए इस मौके पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें।  
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उस्ताद अमीर खां - फोटो : Social media
उस्ताद अमीर खां का जन्म 15 अगस्त, 1912 को इंदौर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनका एक संगीत परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम शाहमीर खां था, जो भिंडी बाजार घराने के सारंगी वादक थे। वह इंदौर के होलकर राजघराने में बजाया करते थे। उनके दादा, चंगे खां तो बहादुर शाह जफर के दरबार में गायक थे। अमीर अली खां जब केवल नौ वर्ष के थे, तब उनकी मां का देहांत हो गया था।

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उस्ताद अमीर खां - फोटो : Social media
अमीर और उनका छोटा भाई बशीर अपने पिता से सारंगी सीखते हुए बड़े होने लगे, लेकिन जल्द ही उनके पिता ने महसूस किया कि अमीर का रुझान वादन से ज्यादा गायन की तरफ है, इसलिए उन्होंने अमीर अली को ज्यादा गायन की तालीम देने लगे। खुद इस क्षेत्र में होने की वजह से अमीर अली को सही तालीम मिलने लगी और वो अपने हुनर को और ज्यादा मजबूत करते गए।

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उस्ताद अमीर खां - फोटो : Social media
अमीर खां अपने एक मामा से तबला भी सीखा। अपने पिता के सुझाव पर अमीर अली ने 1936 में मध्य प्रदेश के रायगढ़ संस्थान में महाराज चक्रधर सिंह के पास कार्यरत हो गये, लेकिन वहां वे केवल एक वर्ष ही रहे। 1937 में उनके पिता की मृत्यु हो गई। वैसे अमीर खां 1934 में ही बम्बई (अब मुंबई) आ गए और मंच पर प्रदर्शन भी करने लगे थे। इसी दौरान वे कुछ वर्ष दिल्ली में और कुछ वर्ष कलकत्ता (अब कोलकाता) में भी रहे, लेकिन देश विभाजन के बाद स्थायी रूप से बम्बई में जा बसे।

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उस्ताद अमीर खां - फोटो : Social media
अमीर खां बाद में आकाशवाणी इंदौर में सारंगी वादक बने। फिल्म संगीत में भी उस्ताद अमीर खां का योगदान अहम था। ‘बैजू बावरा’, ‘शबाब’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘रागिनी’, और ‘गूंज उठी शहनाई’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी आवाज का जादू बिखेरा था। बंगला फिल्म ‘क्षुधितो पाशाण’ में भी उनका गायन सुनने को मिला था। उनके गायन और तरानों से पूरी महफिल झूम उठती थी। उनमें गायकी का अलग ही जुनून था। उनकी इंदौर की गायकी को शास्त्रीय संगीत का पहला अंतर्मुखी घराना कहा जाता है। इसी वजह से उन्हें 'तराने का तानसेन' भी कहा जाता था। उस्ताद अमीर खां साहब का 13 फरवरी, 1974 को एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया।

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