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बाइस्कोप: राजेश खन्ना ने मस्ती में मांगी लाखों की रकम, निर्माता ने उनके सामने लगा दिया नोटों का ढेर

Fri, 01 May 2020 09:34 PM IST
anand anand पंकज शुक्ल, मुंबई
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film Hathi Mere Saathi - फोटो : amar ujala mumbai
मई दिवस के दिन मजदूरों की कहानी ही बाइस्कोप में भी। लेकिन, इन मजदूरों की जमात है चौपायों की और फिल्म का नाम है, हाथी मेरे साथी। बेजुबान जानवरों को रुपहले परदे पर इतने शानदार तरीके से दिखाने का प्रयोग हिंदी सिनेमा में इससे पहले नहीं हुआ। हाथी मेरे साथी जिस दिन बंबई में रिलीज हुई, सिप्पी फिल्म्स ने शम्मी कपूर, हेमा मालिनी और राजेश खन्ना स्टारर अपनी फिल्म अंदाज का दो पेज का विज्ञापन साप्ताहिक फिल्म समाचार पत्र स्क्रीन में रिलीज किया, जिसमें अंदाज को एक ऐसी कामयाब फिल्म बताया गया था, जिसने रिलीज के पहले हफ्ते में ही दस लाख रुपये का कारोबार करने का रिकॉर्ड बनाया। अंदाज ने आगे चलकर ऐसी फिल्म का रिकॉर्ड भी बनाया जिसने देश के हर फिल्म वितरण क्षेत्र में 50 लाख रुपये कमाए। फिल्म अंदाज का ये रिकॉर्ड तोड़ा राजेश खन्ना की ही फिल्म हाथी मेरे साथी ने जिसने देश के हर वितरण क्षेत्र में एक करोड़ रुपये की कमाई करने वाली पहली फिल्म का रिकॉर्ड कायम किया।

अंदाज और हाथी मेरे साथी, दोनों फिल्मों को लिखने का काम किया सलीम-जावेद ने। सलीम जावेद की लिखी पहली फिल्म अधिकार के बारे में आप बाइस्कोप में पढ़ ही चुके हैं। अंदाज लिखी तो पूरी की पूरी सलीम जावेद ने ही थी लेकिन इस फिल्म से अलग अलग समयों पर जुड़े रहे तकरीबन सभी लेखकों को इसका क्रेडिट दिया गया, यहां तक कि इसकी कहानी को मूल रूप से एक फ्रेंच फिल्म से उठाकर जी पी सिप्पी को सुनाने वाले मशहूर लेखक सचिन भौमिक को भी अंदाज की लिखाई का क्रेडिट मिला। हाथी मेरे साथी में सलीम जावेद का नाम ओपनिंग क्रेडिट्स में स्क्रीनप्ले लिखने वालों के तौर पर आता है, हालांकि दोनों की चाहत थी कि फिल्म की क्रेडिट्स में उनका नाम ‘रिटेन बाई सलीम जावेद’ के तौर पर जाए।
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Hathi Mere Saathi - फोटो : amar ujala mumbai
फिल्म हाथी मेरे साथी में सलीम जावेद की एंट्री की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। लेकिन इसके बारे में बात करने से पहले आपको बताते हैं कि आखिर हाथी मेरे साथी को बनाने वाले चिनप्पा देवर कौन हैं जिन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्म निर्माताओँ के लिए हिंदी सिनेमा के रास्ते खोले। चिनप्पा देवर दरअसल मशहूर अभिनेता और राजनीतिज्ञ एम जी रामचंद्रन की फिल्मों के निर्माता रहे हैं। बात 1969 की है जब एमजीआर की सियासी गतिविधियां एकदम से बढ़ गईं और फिल्मों से उनकी दूरी बढ़ती गई। देवर तब बिना एमजीआर के छोटे बजट की एक फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे और एक दिन उनके पड़ोसी निर्देशक श्रीधर ने उन्हें एक हिंदी फिल्म बनाने का आइडिया दिया। देवर के दिमाग में तुरंत अपनी ही फिल्म देइवा चेयल की रीमेक बनाने का ख्याल आया। उन्होंने ओरीजनल फिल्म में थोड़ी फेरबदल की और कहानी सुनाने पहुंच गए संजीव कुमार के पास।

संजीव कुमार ने खुद को फिल्म के रोमांटिक ट्रैक के हिसाब का नहीं पाया और चिनप्पा देवर को राजेश खन्ना से मिलने की सलाह दी। राजेश खन्ना से वह फिल्म आराधना की शूटिंग के दौरान मिले। राजेश खन्ना को समझ ही नहीं आया कि वह हां करें या ना करें। उन्हीं दिनों राजेश खन्ना ने जुबली कुमार के नाम से मशहूर अभिनेता राजेंद्र कुमार को उनका कार्टर रोड स्थित बंगला आशीर्वाद बेचने के लिए मना लिया था। जितनी रकम राजेंद्र कुमार ने इस बंगले की कीमत के तौर पर राजेश खन्ना से मांगी, राजेश खन्ना ने वही रकम फिल्म हाथी मेरे साथी करने के नाम पर चिनप्पा देवर से मांग ली। सैंडो एम एम ए चिनप्पा देवर (पूरा नाम) का जितना बड़ा नाम, उतना ही बड़ा उनका दिल। राजेश खन्ना ने जितनी रकम मांगी, वह सब की सब उन्होंने लाकर राजेश खन्ना के सामने रख दी। राजेश खन्ना ने उसी रकम से चर्चित बंगला आशीर्वाद खरीद लिया।

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जब अंदाज बन रही थी तो सलीम जावेद का ज्यादातर वक्त राजेश खन्ना के इर्द गिर्द ही बीतता था। राजेश खन्ना को भी समझ आने लगा था कि फिल्म अंदाज की मेकिंग में इन दोनों नए लड़कों की अहमियत कितनी है। आपको शायद जानकर हैरानी हो कि अंदाज के सेट पर हेमा मालिनी को कभी समझ ही नहीं आया कि ये दोनों नए लड़के हैं कौन और क्यों राजेश खन्ना उनसे इतना बातें करते रहते हैं। खैर, लौटते हैं कि हाथी मेरे साथी में सलीम जावेद की एंट्री कैसे हुई? आराधना सुपरहिट हो चुकी थी और चिनप्पा देवर फिर आ चुके थे  राजेश खन्ना से ये पूछने कि वो जो हाथी और हीरो वाली कहानी उन्होंने सुनाई थी और जिसका एडवांस भी वह दे चुके हैं, उस पर काम कब शुरू करना है। चिनप्पा देवर की खासियत ये रही कि वह मौके पर चौका मारने से कभी नहीं चूकते थे। इस बार उन्होंने राजेश खन्ना से बात यहां से शुरू की कि आराधना के सुपरहिट होने के बाद उन्हें कितनी रकम राजेश खन्ना को और देनी है ताकि उनकी बढ़ी हुई मार्केट प्राइस वह मैच कर सकें। राजेश खन्ना को यही बात भा गई। वह बोले कि आराधना फ्लॉप होती तो क्या मैं अपनी मार्केट प्राइस कम करने को राजी होता। फिल्म तो उसी रेट पर बनेगी जिस रेट पर तय हुई थी। उन्होंने चिनप्पा देवर से कुछ दिन बाद आने को कहा ताकि शूटिंग की तारीखें तय हो सकें।

चिनप्पा देवर तो चेन्नई लौट गए पर राजेश खन्ना परेशान हो गए। उनको कहानी पसंद नहीं आ रही थी। प्यार की दुनिया नाम की इस फिल्म की कहानी लेकर वह पहुंच गए सलीम खान के पास और बोले कि इसे कुछ ऐसा कर दीजिए कि इस पर फिल्म बन सके क्योंकि पैसा अब वह लौटा नहीं सकते। खैर सलीम जावेद ने इसकी पटकथा शानदार तरीके से लिखी। फिल्म ब्लॉकबस्टर हुई और सलीम जावेद का नाम पूरी इंडस्ट्री के दिल औऱ दिमाग दोनों पर छप गया। फिल्म हाथी मेरे साथी के निर्देशन की जिम्मेदारी एम ए थिरुमुगम को मिली जो चिनप्पा देवर के छोटे भाई थे। वाहिनी स्टूडियो में 1970 में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। फिल्म के सारे आउटडोर सीन ऊटी में फिल्माए गए।

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फिल्म हाथी मेरे साथी का संगीत सुपरहिट रहा। फिल्म में मोहम्मद रफी का एक ही गाना था और ये गाना किशोर कुमार व लता मंगेशकर के गाए बाकी चारों गानों पर भारी पड़ा। नफरत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में, खुश रहना मेरे यार, ये गाना जिसने भी सुना, तो थिएटर में तो रोया ही, थिएटर के बाहर तक लोग रोते हुए सिनेमाघरों से निकलते हुए देखे जाते थे। बच्चों के बीच फिल्म हाथी मेरे साथी का क्रेज इतना था कि स्कूलों की बुकिंग तक हफ्ते हफ्ते भर पहले एडवांस में करानी होती थी। फिल्म की रिलीज की तारीख भी अलग अलग जगहों पर अलग अलग क्यों मिलती है, इसे बताने से पहले एक जरूरी किस्सा फिल्म के संगीत का।

हुआ यूं कि फिल्म के संगीत के लिए चिनप्पा देवर ने शंकर जयकिशन को साइन कर रखा था। लेकिन, वे दोनों समय लेकर संगीत बनाते थे और देवर को फिल्म के गाने जल्दी चाहिए थे ताकि वे फटाफट शूटिंग पूरी कर फिल्म को रिलीज कर सकें। उन्हें नाम सुझाया गया लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का। लेकिन, दोनों उन दिनों सुपरबिजी थे। देवर को पता चला कि लक्ष्मीकांत के बेटे का पहला जन्मदिन है। वह शाम को बिना बुलाए लक्ष्मीकांत के घर पहुंच गए। रास्ते में उन्होंने सोने की ढेर सारी गिन्नियां खरीदीं और लक्ष्मीकांत के घर पहुंचकर उस साल भर के बच्चे पर निछावर कर दीं और लौट आए। इसके बाद लक्ष्मीकांत को अपनी पत्नी की जिद पर ये फिल्म करनी प़ड़ी। चिनप्पा देवर ने लक्ष्मीकांत और प्यारेलाल को फिल्म के साइनिंग अमाउंट के तौर पर चांदी की प्लेट में रखकर एक एक लाख रुपये दिए। फिल्म के हिट होने के बाद इतनी ही रकम दोनों को और दी गई। किसी हिंदी फिल्म के संगीतकार को एक फिल्म में संगीत देने के लिए मिली ये तब तक की सबसे बड़ी रकम बताई जाती है।
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फिल्म हाथी मेरे साथी को राजेश खन्ना ने पहले दिल्ली और आसपास के शहरों में 1 मई को रिलीज कराया। फिल्म को शुरू के तीन दिनों में अच्छा रेस्पॉन्स नहीं मिला तो चिनप्पा देवर थोड़ा उदास थे। इस पर राजेश खन्ना ने कहा कि आप दिल्ली आ जाओ यहां बैठकर बात करते हैं। चिनप्पा देवर चेन्नई से ट्रेन से दिल्ली के लिए निकल पड़े और इधर सोमवार से फिल्म निकल पड़ी। फिल्म की इतवार के बाद इतनी माउथ पब्लिसिटी हुई कि सोमवार के बाद से सारे थिएटरों में सारे शोज हाउसफुल होने लगे। फिल्म निर्माता निर्देशक शक्ति सामंत के साथ मिलकर इसके बाद राजेश खन्ना ने फिल्म वितरण कंपनी शक्ति राज ने बनाई और इसी कंपनी ने बंबई में 14 मई को इस फिल्म को शानदार तरीके से रिलीज किया। फिल्म इतनी बड़ी सुपरहिट हुई कि एम जी रामचंद्रन ने चिनप्पा देवर को बुलाकर इस फिल्म को फिर से तमिल में बनाने को कहा। नाल्ला नेरम नाम से 1972 में रिलीज हुई ये फिल्म तमिल में भी ब्लॉकबस्टर रही।

इस फिल्म का दुखद पहलू ये रहा कि फिल्म में सलीम जावेद को लेखन का पूरा क्रेडिट दिलवाने का वादा राजेश खन्ना ने सलीम खान से पहली मुलाकात में किया था। लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई तो संवाद लेखक के रूप में फिल्म में नाम इंदर राज आनंद का गया। जबकि फिल्म को दोबारा लिखे जाने के बाद इसके 90 फीसदी संवाद सलीम जावेद के बचे। फिल्म सुपरहिट हुई तो चिनप्पा देवर ने राजेश खन्ना के कहने पर मुंबई के ट्रेड अखबारों में एक इश्तहार जरूर दिया कि ये फिल्म सलीम जावेद ने लिखी है हालांकि इसमें भी दोनों के नाम की वर्तनियां गलत छपीं। राजेश खन्ना ने इस पूरे प्रकरण के दौरान जिस तरह से पेश आए, उससे भी सलीम जावेद का दिल टूटा। देवर फिल्म्स की हिंदी में उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्म रही इसके बाद उन्होंने तमाम और फिल्में बनाई लेकिन हाथी मेरे साथी का रिकॉर्ड कोई नहीं तोड़ पाया।

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Hathi Mere Saathi - फोटो : amar ujala mumbai
फिल्म हाथी मेरे साथी की कहानी बस इतनी सी है कि एक बच्चे राजू की जान रामू नाम का एक हाथी बचाता है। बच्चा अनाथ हो जाता है तो रामू और उसके तीन और दोस्तों के साथ ही रहने लगता है। बड़ा होकर वह अपना सर्कस खोलता है और सारे जानवरों को अपने दोस्तों की तरह ही रखता है। राजू की दोस्ती रईस की बेटी तनु से होती है। दोनों की शादी होती है। एक बच्चा होता है और एक दिन तनु को गलतफहमी हो जाती है कि रामू उसके बच्चे को मारना चाहता है। बस, शंका का ये बीज रामू और तनु के बीच घमासान मचा देता है। रामू अपनी कुर्बानी देकर दोनों को फिर से मिला देता है। ये फिल्म वैसे तो ओटीटी इरॉस नाउ पर और गूगल मूवीज व यूट्यूब पर पैसे खर्च करके ही देखी जा सकती है लेकिन अगर आपके पास रिलायंस जियो का नंबर है तो उस नंबर से लॉग इन करके जियोसिनेमा पर ये फिल्म आप अपने लैपटॉप पर मुफ्त में देख सकते हैं और मोबाइल वाले जियो सिनेमा एप के बारे में तो आपको पता ही होगा।


(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं)
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