सुष्मिता सेन
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘आर्या’ के रचयिता राम माधवानी की शूटिंग की तकनीक काफी निराली हैं, वह पूरे सेट पर तमाम कैमरे लगाकर कलाकार को मुक्त रूप से अभिनय करने के लिए छोड़ देते हैं, तो ये नई तकनीक कहीं आपके लिए चुनौती बनकर तो नहीं आई?
नहीं, ये एक चुनौती नहीं है। ये एक तोहफा है क्योंकि ऐसा माहौल पाकर आप एक्टिंग करना भूल जाते हैं। आप भूल जाते हो कि आपके सामने कैमरा भी हैं। आपको बस सीन पता होता है कि ये यहां से शुरू होता है और वहां जाकर खत्म होता है। जैसे मैं बताऊं कि आप गाड़ी में बैठकर आए, आपने घंटी बजाई। दरवाजा खुलने पर आप अंदर तक गए। ये एक ही सीन का हिस्सा है और अगर कैमरे शुरू से लेकर आखिर तक लगे हुए हैं जो आपको दिख भी नहीं रहे तो आप इसे स्वाभाविक रूप से करते दिखेंगे। तब आप अदाकारी करने की बजाय इसे जी रहे होंगे। जब कैमरा हमें दिखता है तो फिर हम कलाकारी दिखाने लगते हैं। अदाकारी छोड़कर किरदार को जीने लग जाना तो एक कलाकार के लिए उपहार ही है चुनौती तो बिल्कुल नहीं। अब मुझे आकर अगर कोई कहे कि आपका फिर से क्लोज अप, मिड शॉट लॉन्ग शाट, क्रेन, जिमी जिब करना हो तो मुझे फिर से ये सब भूलना पड़ेगा।