सिनेमा पर लिखना दो तरह से होता है। एक जिसमें लेखक अपने शब्दों का भंडार उड़ेलकर खुद के साहित्यकार होने का दावा अपने पाठकों के समक्ष करना चाहता है, दूसरा होता है लिखना उस आम बोलचाल में जिसे फिल्में देखने वाला अपनी बोली समझता है। प्रेमचंद जैसा रस ऐसे लेखन में आना चाहिए। सिनेमा पर साहित्य बहुत गढ़ा गया है लेकिन वह आम दर्शक को रस इसीलिए नहीं दे पाता है क्योंकि उसमें दर्शक की रूचि का ध्यान रखने की बजाय लिखने वाले की अपनी काबिलियत का प्रदर्शन ज्यादा होता है। बाइस्कोप में मैंने क्लिष्ट हिंदी से बचने की कोशिश की है। आलंकारिक भाषा से भी परहेज किया है। इस संडे आपके लिए इस गुलदस्ते में छह फिल्में, दीवाना मुझ सा नहीं, क्रिमिनल, क्रांतिवीर, रेशमा और शेरा, कलयुग और राम तेरी गंगा मैली। तो पढ़िए इनके रोचक किस्से। सोमवार के बाइस्कोप में हम बात करेंगे अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी की शादी के तुरंत बाद रिलीज हुई दोनों की फिल्म ‘अभिमान’ की।