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Sudesh Bhosle Interview: जब बिग बी बोले, हमारी आवाजें तो एक जैसी हैं, राज कुमार के लिए गाए ये दो खास गाने

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सुदेश भोसले, अमिताभ बच्चन, राजकुमार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
संगीत की दुनिया में सुदेश भोसले उन गिने चुने सितारों में शामिल हैं जिन्होंने बिना संगीत सीखे ही अपनी गायकी से पूरी दुनिया को दीवाना बना दिया। 1 जुलाई 1960 को मुंबई में जन्मे सुदेश भोसले का गायक बनने का कभी इरादा नहीं रहा। फिर कैसे वह हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन की हिट आवाज और कैसे मिला उन्हें फिल्मों में पहला ब्रेक, अपने जन्मदिन पर ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत में सुदेश भोसले ने खुद इस बात का खुलासा किया।
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अमिताभ बच्चन, सुदेश भोसले - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
शुरू से शुरू करते हैं, लोग आपको अमिताभ बच्चन की आवाज मानते हैं, लेकिन गाने तो आप पहले से भी गा रहे थे, कैसे मिला आपको गायकी का पहला ब्रेक?
जिस फिल्म में मैंने पहली बार गाया, वह फिल्म थी 'जलजला' और इसमें गाने का झे अवसर आशा जी (आशा भोसले) की वजह से मिला। उससे पहले मैं मेलोडी मेकर नामक एक आर्केस्ट्रा ग्रुप में कलाकारों की मिमिक्री करता था और गाने भी गाता था। ज्यादातर शोज किशोर (कुमार) दा के लिए करते थे और उस समय आशा जी अपने शोज के लिए अच्छे संगीत वादक तलाश रही थीं। मेलोडी मेकर को सुनने वह षणमुखानंद हाल आई। आर्केस्ट्रा तो उन्हें अच्छा लगा ही, जाते- जाते उन्होंने मेरे बारे में आयोजक से पूछा कि ये लड़का कौन है? उस कार्यक्रम में उनको एस डी बर्मन और हेमंत कुमार के मेरे गाए गाने बहुत अच्छे लगे थे।
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सुदेश भोसले, आशा भोसले - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिर आशा भोसले से मुलाकात का सिलसिला आगे कैसे बढ़ा?  

कुछ दिनों बाद उनसे एक स्टूडियो में मुलाकात हुई तो उन्होंने मुझसे एस डी बर्मन का गाना सुना। मैंने हिम्मत करके 'अमर प्रेम' का गाना 'डोली में बिठाई के कहार' गाया। डर के मारे मैं आंखें बंद करके गा रहा था। गाना खत्म करके जब मैंने आँखें खोली तो देखा कि आशा जी ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढका हुआ था। उन्होंने हाथ हटाया तो उनकी आंखों से आंसू बह रहे हैं। वह कांपते हुए बोलीं, यूं लग रहा है कि सचिन दा खुद गा रहे हैं। उन्होंने फिर मुझसे वही गाना एक कैसेट में रिकॉर्ड करके भी लिया।

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सुदेश भोसले, आरडी बर्मन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
यानी कि एस डी बर्मन के गाए गाने ने आपकी राह खोल दी?
जी बिल्कुल! अगले ही दिन सुबह सात बजे मेरे पास आर डी बर्मन साहब के यहां से फोन आ गया कि पासपोर्ट लेकर मिलो। वहां आर डी बर्मन साहब, आशा जी, मन्ना डे साहब सब बैठे थे। आशा जी ने परिचय कराया तो पंचम दा बोले  कि मेरे बाप की आवाज में गाते हो, फिर यह कहकर हंसने लगे। उन्होंने मुझे बताया कि जब वह नहा रहे थे तो चुपचाप आशा जी ने मेरे गाए हुए कैसेट को प्ले कर दिया। और, वह घबराकर बाहर आ गए। उनको लगा कि पिता जी कहां से आ गए। वह गाना कैसेट में बिना म्यूजिक के था तो उनको ऐसा लगा कि पिता जी बाथरूम के बाहर खड़े होकर गा रहे हैं।
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सुदेश भोसले - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिर ‘जलजला’ में गाने का ऑफर कैसे मिला? 

इस पहली मुलाकात के बाद आशा भोसले और आर डी बर्मन नाइट में मुझे हिस्सा लेने का मौका मिला। हम लोग हॉन्कॉन्ग गए थे। वहां मैंने जब मैंने किशोर दा का गाया 'सुन मेरे बंधु रे' गाया तो पंचम दा दौड़कर आए और मुझे  गले लगा लिया। उनकी आंखों में आंसू आ गए। वह बोले बॉम्बे जाऊंगा और पहली रिकॉर्डिंग जब भी करूंगा, वह तुम गाओगे। इस तरह से मुझे 'जलजला' में पहला ब्रेक मिला। अमिताभ बच्चन की फिल्म 'इंद्रजीत' का गाना  'जब तक जा में हैं जा, तब तक रहे जवां'  उन्होंने ही गवाया था। फिर संजीव कुमार की फिल्म 'प्रोफेसर की पड़ोसन' में मौका दिया। पंचम दा के लिए आठ नौ गाने गाए।

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सुदेश भोसले, उनका बेटा सिद्धांत, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पहली बार अमिताभ बच्चन के लिए गाने का मौका आपको कैसे मिला?
ये संयोग फिल्म 'अजूबा' में बना। फिल्म के निर्माता, निर्देशक शशि कपूर साहब ने मुझसे 'ओ मेरा जाने बहार आ  गया' गवाया और अमित जी को सुना दिया। वह परेशान कि उन्होंने तो ये गाना गाया ही नहीं। इसके बाद शशिश जी ने ही मेरी मुलाकात अमिताभ बच्चन से कराई। तब पहली बार मैंने साक्षात अमिताभ बच्चन को देखा। उन्होंने कहा, हमारी आवाजें तो बहुत मिलती जुलती हैं। पता ही नहीं चलेगा कि किसने गाया है। जब अमित जी ने मेरी आवाज स्वीकार कर ली तो फिर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी के दिमाग में आया कि कुछ नया  प्रयोग करते हैं। और, फिर इस तरह से फिल्म 'हम' का जुम्मा चुम्मा' गाना बना। 
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सुदेश भोसले, राजकुमार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
एक तरफ आप अमिताभ बच्चन की फिल्मों के हिट आवाज बने तो वहीं आपने दिग्गज अभिनेता राजकुमार के लिए भी उन्हीं की स्टाइल में गाना गाया...
मैं तो मिमिक्री आर्टिस्ट हूं। मुझे किसी की भी आवाज में गाना मुश्किल नहीं लगता। फिल्म 'सौदागर' का गीत 'इमली का बूटा' मैंने और मोहम्मद अजीज ने गाया था। मेरा हिस्सा राजकुमार साहब पर फिल्माया गया।  'तिरंगा' में नाना पाटेकर और राजकुमार पर फिल्माया गीत 'पी ले पी ले ओ मेरे राजा' देखकर ऐसा लगता है कि राजकुमार साहब खुद गा रहे हैं। मैने अनुपम खेर के लिए भी फिल्म 'श्रीमान आशिक' में गाया है। मेरी आवाज के साथ  इस तरह से तो बहुत प्रयोग हुए हैं।

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बेटे सिद्धांत के साथ सुदेश भोसले - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
संगीत की तरफ आपका रुझान कैसे हुआ, कुछ अपनी विरासत के बारे में भी बताइए?
मेरी मम्मी सुमनताई भोंसले शास्त्रीय गायिका थी। उनकी मां यानी मेरी नानी दुर्गा बाई शिरोडकर भी अपने जमाने में शास्त्रीय गायन के लिए मशहूर रहीं। पिता मेरे एन आर पेंटर के नाम से मशहूर थे। फिल्मों के पोस्टर की पेंटिंग करते थे। मैंने भी उनके साथ ही 1974 से लेकर 1984 तक पोस्टर पेंट किए हैं। उन्हीं दिनों मुझे एस डी बर्मन के गाने अच्छे लगे और उन्हें गाने का मुझे चस्का लग गया। इन गानों ने ही मुझे मेलोडी मेकर आर्केस्ट्रा ग्रुप में शामिल होने का मौका दिया। और, इस ऑर्केस्ट्रा को सुनने आशा भोसले आईं तो मेरी किस्मत ही बदल गई।
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पत्नी व बेटे के साथ सुदेश भोसले - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

मौजूदा पीढ़ी के संगीतकारों में आपने संगीतकार सोहेल सेन के साथ 'हाउसफुल 4' और संगीतकार मिथुन के साथ फिल्म 'शमशेरा' में गाने गाए हैं, क्या फर्क लगता है बीते हुए कल और आज के संगीत संयोजन में? 

इसे एक लाइन में ऐसे समझ सकते हैं कि पहले संगीतकार घर पर बुलाते थे, गाने समझाते थे, किसके लिए गा रहे हैं ये समझाते थे, गाने की  सिचुएशन बताते थे, फिल्म में किस मूड में ये गाना गाना है, टोन क्या रखनी है, सब बताते थे, लेकिन अब तो संगीतकार रिकॉर्डिंग तक पर नहीं आते हैं। उनके संयोजक ही सब काम देख लेते हैं। न ये पता होता है कि किसके लिए गा रहे हैं, और न ये पता होता है कि फिल्म में ये गाना क्यों गाया जा रहा है। एक जमाना हमने ऐसा भी देखा है जब अमिताभ बच्चन जी खुद पर फिल्माए जाने वाले हर गाने की रिहर्सल तक पर आते थे। रिकॉर्डिंग पर तो वह सौ फीसदी मौजूद रहते थे, और फाइनल टेक वह ही फाइनल करते थे। अब तो सब मशीन है। आत्मा मर चुकी है। जो कुछ हो रहा है, सब मशीन कर रही है।
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