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Shriya Saran: दृश्यम् 2 की हीरोइन बोलीं, ‘मेरे नाना पढ़ते थे ‘अमर उजाला’, कहते थे अखबार सौ फीसदी सही होता है’

Thu, 10 Nov 2022 08:08 AM IST
निधि पाल अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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श्रिया सरन, अभिषेक पाठक और अजय देवगन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
श्रिया सरन दक्षिण भारत की उन बेहतरीन अभिनेत्रियों में शामिल हैं, जिनकी सुंदरता के चर्चे दुनिया जहान में होते रहते हैं। हिंदी सिनेमा से उनका रिश्ता लगातार बना रहा है और जब लोगों को पता चलता है कि बचपन के 15 साल उनके हरिद्वार में बीते हैं तो वे चौंक जाते हैं। श्रिया का हिंदी अखबारों से करीब का नाता रहा है। वह बताती हैं, ‘नानाजी मेरे रोज सुबह ‘अमर उजाला’ अखबार ही पढ़ते थे। हमें भी अखबार पढ़ने को कहा जाता था और मैं ये बात गर्व से कह सकती हूं कि मेरी बोलचाल की हिंदी को मजबूत करने में हिंदी अखबारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।’ श्रिया सरन से ‘अमर उजाला’ की एक एक्सक्लूसिव मुलाकात...
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श्रिया सरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

हिंदी सिनेमा के लिए हिंदी को कितना जरूरी समझती हैं आप?

हिंदी सिनेमा के लिए हिंदी बोलना बहुत ही जरूरी है। हमें घर में इसीलिए हिंदी अखबार पढ़ने की सलाह दी जाती थी ताकि बोलचाल की भाषा शुद्ध हो जाए। हमें ऊंची आवाज में बोल बोलकर पढ़ने की सलाह दी जाती थी ताकि उच्चारण सही हो। अभी देखकर बड़ा दुख होता है कि लोगों ने पढ़ना ही बंद कर दिया है। पंचतंत्र की कहानियां बचपन में मैंने बहुत पढ़ी हैं लेकिन अब पता नहीं कि वैसी किताबें मिलती भी हैं कि नहीं।

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श्रिया सरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आप हरिद्वार से हैं तो जाहिर है हिंदी अखबारों से आपका तो नाता रहा ही होगा?

हरिद्वार में हमारे घर में अखबार पढ़ना बहुत ही जरूरी होता था। जब मैं छोटी थी तो मेरा बोलने का तरीका ठीक नहीं था तो मुझे अखबार पढ़ने की सलाह दी जाती थी। हिंदी तो मैं बहुत ही खराब बोलती थी कभी-कभी तो हिंदी में फेल भी हो जाती थी। मेरी टीचर मुझे हिंदी अखबार पढ़ने की सलाह देती थी जिससे मेरा उच्चारण सही हो जाए, मेरे घर में हिंदी में ही बात करने की परंपरा थी। मेरे नाना ‘अमर उजाला’ अखबार ही पढ़ा करते थे और उनका यह मानना था कि अखबार में जो लिखा होता है वह 100 प्रतिशत सही होता है। मेरा मानना  है कि हिंदी पढ़ेंगे और हिंदी में सोचेंगे तभी हिंदी सिनेमा को समझ पाएंगे।

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श्रिया सरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तो हरिद्वार की तो अब बहुत याद आती होगी?

मैं हरिद्वार काफी समय से गई नहीं। बचपन से लेकर 15 साल तक मैं हरिद्वार में ही थी और उसके बाद दिल्ली आ गई। हरिद्वार की जिंदगी बहुत ही अच्छी थी, साइकिल से स्कूल और लाइब्रेरी जाती थी। उस समय कुछ खाना-पीना होता था तो पड़ोस वाली आंटी से दोस्ती करके रखते थे ताकि कुछ खाने-पीने को मिल जाए क्योंकि उस समय उतने कैफे वगैरह नहीं थे जहां पर जाकर कुछ खा पी सके। यह उन दिनों की बात है जब हमारे यहां केबल तक नहीं आया था और हम सिर्फ दूरदर्शन देखा करते थे। उस समय 'देख भाई देख' सीरियल देखकर बहुत आनंद मिलता था। उन दिनों बहुत ही साधारण जिंदगी थी और जीने का एक अलग ही मजा था। कभी जंगल में घूमने चले गए कभी नदी किनारे घूमने चले गए। यह सब चीजें मुझे बहुत याद आती हैं।  
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दृश्यम 2 - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपकी जल्द रिलीज हो रही फिल्म 'दृश्यम 2' की बात करते हैं। इसकी पहली कड़ी में आप काम कर ही चुकी हैं तो इसकी सीक्वल को लेकर कितना उत्साह रहा? 

इस फिल्म को लेकर मैं बहुत उत्साहित थी। सात साल से नंदिनी एक सच को दिल में छुपाए किस घुटन से जी रही है यह फिल्म में दिखाया गया है। यह एक ऐसी बात है जिसे आप किसी से कभी साझा नहीं सकते। इस दौरान उसके बच्चों पर क्या गुजरी होगी? सोचकर ही मन सिहर जाता है। मैंने नंदिनी  के किरदार को फिर से जिया है। फिल्म की शूटिंग के पहले दिन हम चारों लोग बैठकर सुबह का नाश्ता कर रहे थे तभी मेरे मुंह से ‘दृश्यम’ के निर्देशक स्वर्गीय निशिकांत कामत का नाम निकल गया फिर याद आया अरे इस फिल्म को तो अभिषेक निर्देशित कर रहे हैं।
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श्रिया सरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

'दृश्यम' का निर्देशन निशिकांत ने किया और अब इसकी सीक्वल ‘दृश्यम 2’ का निर्देशन अभिषेक कर रहे हैं। दोनों में तुलना तो होगी ही, आपके हिसाब से अभिषेक पाठक लोगों की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरेंगे? 

अभिषेक पाठक ने फिल्म ‘दृश्यम 2’ बहुत अच्छे से बनाई है और बहुत ही अच्छा काम किया है। किरदार तो वही हैं लेकिन इन्होंने इसमें अपना नजरिया भी डाला है और अपने तरीके से बनाया है। इतने साल से काम करके मुझे ये तो समझ आ ही जाता है कि फिल्म कैस बन रही है। ‘दृश्यम 2’ एक बेहद शानदार फिल्म बनी है, बाकी जब फिल्म रिलीज होगी तो दर्शक भी देखकर समझ ही जाएंगे कि फिल्म कैसी बनी है। 

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श्रिया सरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
दक्षिण भारतीय सिनेमा से आने वाली तमाम अभिनेत्रियों को हिंदी सिनेमा में शोहरत मिलती रही है, लेकिन अब ऐसा कम होता दिखता है, क्या भौगोलिक परिदृश्य के हिसाब से सुंदरता के मायने बदल जाते हैं?

इस बार में कुछ भी ठोस तरीके से तो कह पाना बहुत मुश्किल है लेकिन जहां तक मैं समझती हूं इसमें किस्मत का भी हाथ होता है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि मुझे दक्षिण भारतीय फिल्मों के साथ साथ हिंदी सिनेमा में भी काम करने का मौका मिला। जो अच्छा हुआ उसके लिए मैं सभी की बहुत आभारी हूं और जो नहीं हुआ, या जो नहीं मिला उसके बारे में ज्यादा सोचने से फायदा नहीं। हां, मैं यह कोशिश कर सकती हूं कि जो गलतियां मुझसे पहले फिल्मों के चुनाव को लेकर हुई हैं वे दोबारा ना हो।
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श्रिया सरन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, करीना कपूर जैसी शादीशुदा अभिनेत्रियों को मां बनने के बाद भी अच्छा काम मिला और उनकी सेकेंड इनिंग्स भी शानदार रही है। दर्शकों की सोच में आए इस बदलाव को आप कैसे देखती हैं?

अगर गौर किया जाए तो तीस चालीस साल पहले तक शादीशुदा अभिनेत्रियां धड़ल्ले से काम करती थीं। फिर बीच में ऐसा दौर आया कि शादी करने और मां बनने के बाद खुद अभिनेत्रियों ने ही काम करना बंद कर दिया। शायद तब उनके हिसाब से कहानियां भी नहीं लिखी जा रही थीं। अब लेखक प्रौढ़ महिलाओं के हिसाब से भी अच्छी कहानियां लिख रहे हैं और इसके चलते सबको अच्छा काम करने का मौका मिल रहा है। मेरे हिसाब से सिनेमा में अब अभिनेत्रियों की वैवाहिक स्थिति की तरफ दर्शक ध्यान नहीं देते बशर्ते परदे पर उनका अभिनय अच्छा हो रहा हो।

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