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शशि कपूर-अमिताभ की इस फिल्म के आज भी दीवाने हैं लोग, चोर-पुलिस के किरदार ने खूब बटोरी तालियां

Mon, 16 Mar 2020 12:00 AM IST
anand anand बीबीसी, हिंदी
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शशि कपूर अमिताभ बच्चन - फोटो : SOCIAL MEDIA
शशि कपूर बॉलीवुड के दिग्गज कलाकारों में से एक थे। उनका जन्मदिन 18 मार्च को होता है। शशि कपूर ने सत्यम शिवम सुंदरम, सुहाग, नमक हलाल और प्यार का मौसम जैसी कई शानदार फिल्मों में काम किया। उन्हीं में से एक फिल्म थी दीवार। दीवार फिल्म में उनके साथ अभिनेता अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म की कहानी और डायलॉग्स को दर्शकों आज ही काफी पसंद करते हैं। ऐसे में आज हम आपको दीवार फिल्म से जुड़े कुछ किस्से बताने जा रहे हैं। 

दीवार भारतीय पॉपुलर सिनेमा की दुनिया का वो शाहकार है, जिसका जादू 45 साल बीतने के बाद भी बना हुआ है। यश चोपड़ा निर्देशित और सलीम-जावेद की लिखी ये फिल्म ठीक 45 साल पहले यानी 24 जनवरी, 1975 को प्रदर्शित हुई थी। फिल्म विश्लेषकों की राय के मुताबिक़ दीवार ने जंजीर से उभरे एंग्री यंग मैन के तौर पर अमिताभ बच्चन की छवि को ऐसा सीमेंटेड किया कि अगले तीन दशक तक उनकी ऐसी छवि बनी रही। वैसे दिलचस्प यह है कि जिस विजय का किरदार निभाकर अमिताभ बच्चन अपने चाहने वालों के दिलों पर आज तक राज कर रहे हैं, उस किरदार के लिए वे पहली पसंद नहीं थे। और ना ही छोटे भाई के पुलिस इंस्पेक्टर का किरदार शशि कपूर को मिलना था।
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Deewaar - फोटो : social media'
विजय का किरदार पहले राजेश खन्ना को निभाना था और रवि की भूमिका के लिए नवीन निश्चल चुने गए थे। लेकिन यश चोपड़ा के साथ इन दोनों की जमी नहीं और फिर ये भूमिका अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के हिस्से में आ गई। इस फिल्म का जादू अगर आज तक क़ायम है तो इसमें अमिताभ बच्चन-शशि कपूर की जोड़ी के अभिनय के अलावा दमदार कहानी, चुस्त पटकथा और एक से बढ़कर एक डॉयलॉग की भूमिका रही है। सलीम-जावेद की ज्यादातर फिल्मों का नायक अपने पिता के खिलाफ विद्रोही तेवर अपनाने वाला नज़र आता है, लेकिन दीवार के नायक के साथ उन्होंने इसका एक मार्मिक पहलू भी जोड़ दिया है।

अमिताभ बच्चन की बांह पर लिखा है- 'मेरा बाप चोर है।' अपने पिता के प्रति अमिताभ दीवार में ग़ुस्से से भरे दिखाई देते हैं लेकिन यहां सांत्वना के बोल उनके पिता को भी मिलते हैं, जिनकी भूमिका एक मिल में मजदूर यूनियन के नेता की है, जिन्हें मालिकों ने षड्यंत्र से चोर बेईमान साबित कर दिया है। दो बेटों को पालने संवारने के साथ साथ नैतिक मूल्यों पर खरी मां की सशक्त भूमिका निरूपा राय ने निभाई है। क्लाइमेक्स में उनकी छवि मदर इंडिया की लीजेंडरी नरगिस की भूमिका से मेल खाती दिखती है जिन्होंने एक लड़की के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करने के चलते अपने नायक बेटे को गोली मार दी थी।
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दीवार फिल्म - फोटो : film
दीवार में ऐसे कई सीन थे, जो 1975 के हिसाब से आम जन मानस को झकझोरने वाले थे। मसलन बचपन से ही अमिताभ बच्चन अपनी मां के साथ मंदिर नहीं जाते हैं, वे मंदिर के बाहर खड़े होते हैं। एक मासूम बताता है कि वह भगवान को नहीं मानता और जो भी करेगा अपने दम पर करेगा। आज के दौर में बनी फिल्मों में ऐसे दृश्य रखे जाएं तो विवाद उत्पन्न हो जाएगा। लेकिन आज से महज चार दशक पहले तक ऐसे सीन फिल्म की कहानी को कहीं दमदार बनाते हैं। भगवान को नहीं मानने वाला वह लड़का बूट पालिश करके पैसा कमाता है ताकि मां की मुश्किलें थोड़ी कम हों। महज सात आठ साल की उम्र में उनका साहस इतना है, पालिश करने के बाद जब एक सेठ उन्हें पैसे फेंक कर देता है तो वे बोलता है, "मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता।"

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दीवार फिल्म - फोटो : file photo
सेठ भी बच्चे की दिलेरी से ऐसा प्रभावित हुआ कि अपने आदमी से बोलता है कि देखना ये लड़का एक दिन बहुत आगे जाएगा। अमिताभ ने अपने बचपने में ही पढ़ाई नहीं करने का फैसला किया ताकि छोटा भाई पढ़ सके। और बीसेक साल बाद जब वही सेठ अपने साथ गैर क़ानूनी काम के लिए उसी युवक को टेबल पर पैसे फेंक कर देता है तो आत्मविश्वास से लबरेज वह युवा कहता है, "मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता।"

अमिताभ बच्चन को ये डॉयलॉग रिपीट करते हुए देखकर सिनेमा हॉल में 1975 में भी तालियां बजती थीं, 1985, 1995 और 2005 में भी। 2020 के मल्टीप्लेक्स के जमाने में भी दीवार लगे तो लोग तालियां बजाए बिना नहीं रहेंगे। अपराध के रास्ते पर काम शुरू करने से पहले दीवार में अमिताभ डॉकयार्ड में कुली की भूमिका में हैं। जहां वे हर दिन मजदूरों से कमीशन वसूलने वाले गुंडों से एक दिन भिड़ जाते हैं। इसका टीजर वे पहले दे देते दैं, जब उनका एक डॉयलॉग आता है, "रहीम चाचा, जो पच्चीस बरस में नहीं हुआ वो अब होगा। अगले हफ्ते एक और कुली मवालियों को पैसे देने से इनकार करने वाला है।" और जब ये मवाली उन्हें पीटने के लिए ढूंढ़ रहे होते हैं तब अमिताभ उनका इंतजार करने उनके ही गोदाम में पहुंच जाते हैं। 
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Deewaar - फोटो : social media
वे कहते हैं, "पीटर तेरे आदमी मुझे बाहर ढूंढ रहे हैं और मैं तुम्हारा यहां इंतजार कर रहा हूं।" इतना कहने के बाद वे दरवाज़ा अंदर से बंद कर देते हैं और चाबी पीटर की ओर फेंकते हुए कहते हैं कि तुमसे चाबी लेकर मैं ये दरवाजा खोलूंगा और यह कहते हुए वे 25 गुंडों से भिड़ गए। यह सिनेमाई पर्दे पर ही संभव है लेकिन ऐसे दृश्यों और ऐसे डॉयलॉग्स ने अमिताभ की सिनेमाई छवि को लार्जर दैन लाइफ़ बना दिया।

मोदी है तो मुमकिन है के नारों से बहुत पहले अमिताभ की सिनेमाई छवि ऐसी ही थी अमिताभ है तो कुछ भी मुमकिन है। उस दौर में भारतीय युवाओं में महत्वाकांक्षा और मौजूदा परिस्थितियों को लेकर जो आक्रोश था, उसका सबसे बड़ा चेहरा अमिताभ बच्चन जिन दो फिल्मों से बन गए, उनमें पहली जंजीर थी जिसमें वे पुलिस अधिकारी के तौर पर सिस्टम का हिस्सा था। और दूसरी फिल्म दीवार रही जिसमें उन्होंने सारे सिस्टम को धता बता दिया था।
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Deewaar - फोटो : social media
देखते देखते अमिताभ बच्चन इस फिल्म में नामी स्मगलर बन जाते हैं जबकि दूसरी ओर उनके छोटे भाई पुलिस इंस्पेक्टर। इन्हीं दो भाइयों के बीच के एक संवाद और सीन को दर्शक भुलाए नहीं भुलते। इस संवाद में बड़े भाई के तौर पर अमिताभ कहते हैं, "आज मेरे पास बिल्डिंग है, प्रापर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है, क्या है, क्या है? तुम्हारे पास।" अमिताभ की लगभग चीखती हुई आवाज़ के सामने शशि कपूर एकदम धीमी आवाज़ में कहते हैं, "मेरे पास मां है।"

उनका इस छोटे से संवाद के सामने अमिताभ का सारा दंभ मानो चकनाचूर हो जाता है। विजय का किरदार इस टूटन को महसूस भी करता है लेकिन अब उसकी जिंदगी उस रफ्तार से उस सड़क पर दौड़ रही है जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। यही वजह है कि जब कैबरे डांस करने वाली परवीन बॉबी से उनकी दोस्ती होती है तो अंतरंग पलो में एक बेड पर अमिताभ बेचैनी में सिगरेट फूंकते नजर आते हैं। और परवीन बॉबी से कहते हैं, "ना जाने क्यूं मुझे लगता है, तुम समझ सकती हो मुझे।"
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shashi kapoor - फोटो : file photo
जब परवीन बॉबी गर्भवती हो जाती हैं तब अमिताभ बच्चन को अपने पिता के चोर कहे जाने की बात याद आती है और उनके अंदर का जमीर जागता है, अमिताभ अपराध की दुनिया से वापस लौटने का फैसला लेते हैं लेकिन आपसी गैंगवार की होड़ के चलते ये संभव नहीं हो पाता है। इस फिल्म में अमिताभ कुली के तौर बिल्ला नंबर 786 का इस्तेमाल करते हैं जो लगातार उनकी मदद करता है, आखिर में अपने छोटे भाई के हाथों गोली मारे जाने से पहले यह बिल्ला उनके हाथ से छिटक जाता है।

इस फिल्म के अंतिम दृश्य में जो विजय का किरदार जीवन में कभी मंदिर नहीं गया था वो गोली से घायलावस्था में कार दौड़ाता हुआ मंदिर पहुंचता है, जहां उनकी मां इंतजार कर रही है। क्योंकि बेटे ने अपराध की दुनिया छोड़ने और आत्मसमर्पण करने से पहले मां से मिलने का वादा किया हुआ था। आखिर में अमिताभ अपनी मां की गोद में दम तोड़ देते हैं। इन आखिरी दृश्यों में ये साफ झलकता है कि निरूपा राय अपने बड़े बेटे को कितना चाहती थीं, उनके चेहरे से यह अहसास साफ झलकता है कि अगर मुश्किल चुनौतियां ना आई होतीं तो विजय भी अच्छाई के रास्ते पर चलता। लेकिन ये जानते समझते हुए भी वह हमेशा सच्चाई के साथ यानी अपने छोटे बेटे के साथ रहीं।
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Shashi Kapoor - फोटो : file photo
ये भी कहा जाता रहा है कि अमिताभ के विजय का किरदार मुंबई के माफिया सरगना हॉजी मस्तान के जीवन से प्रभावित था। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के अलावा निरूपा राय के रोल को खूब तारीफ मिली लेकिन फिल्म ने परवीन बॉबी को भी बॉलीवुड में स्थापित कर दिया। उनके अलावा नीतू सिंह भी शशि कपूर के साथ ख़ूब जमी। जबकि स्मगलिंग की दुनिया के दो गैंग लीडर के तौर पर मदन पुरी और इफ्तेखार का काम भी काबिलेतारीफ था। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफ़िस पर धमाल मचा दिया।

अकेले मुंबई में उस जमाने में इस फिल्म ने एक करोड़ रूपये जुटा लिए थे, वो भी तब जब सिनेमा टिकट का अधिकतम मूल्य तीन रूपये हुआ करता था। 1975 में बेस्ट मूवी के सम्मान के साथ दीवार ने छह फिल्मफेयर अवार्ड जीते थे। दीवार उस साल कमाई के मामले में चौथे नंबर पर रही थी, जरा याद कीजिए कि 1975 भारतीय सिनेमा के लिए कैसा साल था। इस साल ही आई थी शोले, धर्मात्मा और जय संतोषी मां। इन तीन फिल्मों ने दीवार से ज्यादा कमाई की थी। शोले में तो अमिताभ भी थे, शोले कल्ट फिल्म मानी गई लेकिन दीवार का जादू उससे कम नहीं हुआ।
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