सौरभ शुक्ला
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सौरभ कहते हैं कि 'जॉली एलएलबी से पहले हिंदी फिल्मों में जज को एक कार्डबोर्ड कैरेक्टर के तौर पर देखा जाता था, एक इंसान के तौर पर नहीं। आखिर वह भी इंसान है। तो उसमें इंसानियत के सूत्र तलाशे गए कि सुंदरलाल त्रिपाठी रहता कहां होगा, तनख्वाह कितनी होगी? अमेरिका का जज तो है नहीं कि एक बंगला होगा और वहां एक उसका लैब्राडॉर होगा और चार पांच नौकर चाकर होंगे। नहीं, ऐसा जज वह है नहीं, वह तो आम जिंदगी जीने वाला जज है।'