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सैफ अली खान बोले- तानाजी में दिखाया गलत इतिहास, तथ्यों से छेड़छाड़ करना खतरनाक

Sun, 19 Jan 2020 11:22 PM IST
Mishra Mishra एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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saif ali khan - फोटो : Social Media
जाने-माने अभिनेता सैफ अली खान ने 'तानाजी: द अनसंग वॉरियर' जैसी फिल्मों में ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ को खतरनाक बताया है। फिल्म कैंपेनियन के लिए पत्रकार अनुपमा चोपड़ा को दिए इंटरव्यू में सैफ ने कहा है कि उन्हें उदयभान राठौर का किरदार बहुत आकर्षक लगा था इसलिए छोड़ नहीं पाए लेकिन इसमें पॉलिटिकल नैरेटिव बदला गया है और वो खतरनाक है। सैफ ने इस इंटरव्यू में कहा है, 'कुछ वजहों से मैं कोई स्टैंड नहीं ले पाया, शायद अगली बार ऐसा करूं। मैं इस किरदार को लेकर बहुत उत्साहित था क्योंकि मुझे बहुत ही आकर्षक लगा था। लेकिन यह कोई इतिहास नहीं है। इतिहास क्या है इसके बारे में मुझे बखूबी पता है।'
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Saif Ali Khan - फोटो : Social Media
सैफ ने कहा, 'मेरा मानना है कि इंडिया की अवधारणा अंग्रेजों ने दी और शायद इससे पहले नहीं थी। इस फिल्म में कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं है। हम इसे लेकर कोई तर्क नहीं दे सकते। यह दुर्भाग्य ही है कि कलाकार उदारवादी विचार की वकालत करते हैं लेकिन वो लोकप्रियतावाद से बाज नहीं आते। यह अच्छी स्थिति नहीं है लेकिन सच्चाई यही है।' सैफ ने इस बात को स्वीकार किया है कि तानाजी में इतिहास की गलत व्याख्या की गई है। उन्होंने कहा कि किसी भी फिल्म की व्यावसायिक सफलता में इतिहास की गलत व्याख्या को उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। सैफ अली खान से बातचीत में अनुपमा चोपड़ा ने फिल्मकार कबीर खान से हुई एक बातचीत का हवाला दिया। कबीर खान ने कहा था कि वो खराब अभिनय और ढीली स्क्रिप्ट को बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन उन्हें राजनीतिक नैरेटिव में व्यावसायिक सफलता के लिए छूट बर्दाश्त नहीं हैं।
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Saif Ali Khan - फोटो : Social Media
अनुपमा ने सैफ से पूछा कि तानाजी में जो पॉलिटिक्स दिखाई गई है वो सवालों के घेरे में है। क्या आप तानाजी की पॉलिटिक्स से इत्तेफाक रखते हैं?
इस पर सैफ ने कहा, 'ये सही बात है कि इसकी पॉलिटिक्स का तथ्यों से कोई मेल नहीं है। इसे लेकर मैं केवल एक अभिनेता के तौर पर ही सहमत नहीं हूं बल्कि एक भारतीय के तौर पर भी नहीं हूं। मैंने ऐसी राजनीति पर पहले भी सवाल खड़े किए हैं। शायद मैं अगली बार से ऐसी कहानियों को लेकर सतर्क रहूं। ये रोल मुझे आकर्षक लगा इसलिए कर लिया। मुझे पता है कि यह इतिहास नहीं है लेकिन फिर सवाल उठता है कि मैंने यह रोल किया क्यों? लोगों को लगता है कि ऐसी फिल्में चलती हैं लेकिन ये खतरनाक है। एक तरफ हम उदारता और विवेक की बात करते हैं लेकिन दूसरी तरफ पॉपुलिस्ट तरीके को अपनाते हैं।'

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Saif Ali Khan - फोटो : Social Media
क्या इंडस्ट्री के भीतर भी ध्रुवीकरण बढ़ा है? इस पर सैफ ने कहा, 'हां, ऐसा है। देश विभाजन के बाद मेरे परिवार के जो लोग भारत छोड़कर चले गए, उन्हें लगा था कि बंटवारे के बाद वो यहां सुरक्षित नहीं रहेंगे। दूसरी तरफ मेरे परिवार के कुछ लोगों ने भारत में ही रहने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उन्हें लगा कि यह सेक्युलर देश है और कोई दिक्कत नहीं होगी।' सैफ ने कहा, 'लेकिन अभी जिस दिशा में चीजे बढ़ रही हैं, उनसे लगता है कि शायद सेक्युलर ना रहे। अगर मैं अपनी और परिवार की बात करूं तो सारी खुशियां हैं। अच्छे डॉक्टर हैं, बच्चों के पढ़ाई बेहतरीन तरीके से हो रही है। बढ़िया निवेश है और रिटर्निंग भी अच्छी है। लेकिन देश में धर्मनिरपेक्षता और बाकी चीजों पर जो बातें हो रही हैं, उनमें हम शामिल नहीं हैं। हमलोग इसके लिए नहीं लड़ रहे हैं। हां, स्टूडेंट्स लड़ रहे हैं। जब हम किसी मुद्दे पर स्टैंड लेते हैं या टिप्पणी करते हैं तो फिल्में बैन कर दी जाती हैं। लोगों को नुकसान पहुंचाया जाता है। ऐसे में लोग ऐसा करने से बचते हैं। ज्यादातर लोग इन मामलों में अपने परिवार और पेशा को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते हैं।'
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तानाजी - फोटो : तानाजी, फिल्म
'तानाजी' फिल्म में गड़बड़ क्या है?
इस फिल्म में मुगलों को विदेशी दिखाया गया है। मुगल भारत में पीढ़ियों से रहे थे लेकिन उन्हें पूरी तरह से विदेशी दिखाया गया है। मुगल-ए-आजम (1960) में अकबर को भारतीय की तरह दिखाया गया था। जोधा अकबर (2008) में अकबर को ऐतिहासिक तथ्य से बिल्कुल उलट दिखाया गया। जाने-माने इतिहासकार हरबंस मुखिया ने बीबीसी से कहा था कि जोधा-अकबर फिल्म में जिस जोधा बाई को अकबर की पत्नी के तौर पर दिखाया गया, वो जोधा बाई नाम की कोई महिला थी ही नहीं। पद्मावत में भी अलाउद्दीन खिलजी को एक अय्याश मुस्लिम शासक के तौर पर दिखाया गया। तानाजी में मुगलों का संदर्भ बिल्कुल हवा-हवाई है। यहां मुगल कमांडर खुद को ही मौकापरस्त कहता है। फिल्म में मुगल और मुसलमान किरदारों को हरे कपड़े में रखा गया है। यह एक स्टीरियोटाइप है।
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अजय देवगन और सैफ अली खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म की शुरुआत में ही नैरेटर दावा करता है कि हिन्दू (राजपूत) के खिलाफ हिन्दू (मराठा) को लड़ाना औरंगजेब का सबसे बड़ा धोखा था। हालांकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि मुगलों की मनसबदारी में राजपूतों की भी निर्णायक भागीदारी थी लेकिन फिल्म की ये लाइनें साफ कर देती हैं कि वो क्या दिखाने जा रहे हैं। इसमें मराठाओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को कीमती बताया गया है जबकि मुग़लों और राजपूतों की महत्वकांक्षा का बहुत ही सरलीकरण किया गया है। सैफ अली खान के उदयभान राठौर के किरदार को निगेटिव दिखाया गया है क्योंकि उसे औरंगजेब का वफादार बताया गया है।

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