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इस फिल्मकार ने बताई अपनी सक्सेस स्टोरी, बोलीं- इस तरह कामयाब हो पाएंगे बच्चे

Sun, 01 Apr 2018 08:06 AM IST
अतुल सिन्हा, अमर उजाला
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Sai Paranjpye
जानी-मानी फिल्मकार, रंगकर्मी और लेखक सई परांजपे का मानना है कि हर मां को अपने बच्चे की प्रतिभा पहचानना और उसे निखारना चाहिए। उनके मुताबिक हर बच्चे में कुछ छुपी हुई प्रतिभाएं होती हैं जिन्हें उसकी मां से बेहतर कोई नहीं समझ सकता।

स्पर्श, चश्मे बद्दूर और कथा जैसी बेहद संवेदनशील और हल्की फुल्की कॉमेडी फिल्म बनाने वाली सई परांजपे ने बच्चों के लिए बहुत काम किया है और लगातार दो बार वह चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।

उनका कहना है कि अगर हम अपने बच्चों को जीवन के मूल्यों, रिश्तों की अहमियत और संस्कृति के तमाम पहलुओं के बारे में नहीं बताएंगे तो समाज के लिए आने वाला वक्त और खराब होगा।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चल रहे थिएटर ओलंपिक के दौरान लिविंग लिजेंड के तौर पर अपने जीवन का अनुभव बांटते हुए सई परांजपे ने अपने बचपन को याद किया और बताया कि कैसे उनकी मां हर रोज उन्हें एक कहानी सुनाया करती थीं और कैसे नन्हीं सी उम्र में उन्होंने खुद की कल्पना से अपनी मां को कहानी सुनाई और ये सिलसिला कुछ ऐसा चला कि आठ साल की उम्र में ही उनकी कहानियों का एक संग्रह तैयार हो गया।

फिर उनके लिखने-पढ़ने, स्कूल और कॉलेज में थिएटर के साथ-साथ रचनात्मक कामों में सक्रिय रहने का सिलसिला शुरू हुआ और बाद में दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और पुणे के फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट से जुड़कर उन्होंने फिल्म और रंगमंच के क्षेत्र में अपनी जगह बनाई।
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Sai Paranjpye
परांजपे बरसों बाद एनएसडी आकर बेहद उत्साहित दिखीं। उन्होंने बताया कि ‘यही वह जगह है जहां से मैंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में तत्कालीन डायरेक्टर इब्राहिम अलकाजी की देखरेख में एक्टिंग, स्क्रिप्ट राइटिंग और डायरेक्शन के गुर सीखे।

मुझे कभी भी एक्टिंग में ज्यादा रुचि नहीं थी, मैं डायरेक्शन और स्क्रिप्ट राइटिंग में ही रुचि रखती थी, लेकिन उन्होने मुझे प्रेरित किया और एक रिफाइन्ड व्यक्तित्व हासिल करने में मेरी मदद की।‘

पद्म भूषण से सम्मानित परांजपे ने सालों तक मराठी, हिंदी और अंग्रेजी नाटकों का लेखन और निर्देशन किया है। व्यावसायिक सिनेमा से कुछ अलग हटकर उन्होंने जो 6 फिल्में बनाईं, उनको देश विदेश में बहुत सराहा गया और उन्हें एक आम आदमी का फिल्मकार कहा गया।

बच्चों के लिए लिखी गई उनकी पुस्तकों को कई पुरस्कार मिले। वहीं उनकी पहली फीचर फिल्म ‘स्पर्श’ ने पांच पुरस्कार जीते, जिसमें नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी शामिल है। स्पर्श के बाद कॉमेडी ‘चश्मे बद्दूर’ और ‘कथा’ आई। व्यावसायिक और समानांतर सिनेमा के बीच एक सामंजस्य बिठाते हुए परांजपे ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
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