साल 1981 में ब्लॉकबस्टर फिल्म एक दूजे के लिए से हिंदी सिनेमा में छा जाने वाले अभिनेता कमल हासन के करियर को हिंदी सिनेमा में डूबने से बचाने के लिए जो इकलौती फिल्म क्रेडिट ले सकती है, वह है सदमा। सदमा और एक दूजे के लिए के बीच कमल हासन ने सनम तेरी कसम, ये तो कमाल हो गया और जरा सी जिंदगी से फ्लॉप की हैट्रिक लगाकर न सिर्फ अपने लाखों चाहने वालों का दिल दुखाया बल्कि खुद अपने लिए भी तमाम दिक्कतें पैदा कर लीं। ये फिल्में न कारोबार कर पाईं और न कोई कमाल। इनकी मेकिंग तक लोगों को पसंद नहीं आई। वैसे तो निर्देशक बालू महेंद्रा की फिल्म सदमा भी हिंदी में खास चली नहीं लेकिन इस फिल्म को सिनेमा के सुधी दर्शकों ने खूब सराहा और समय के साथ ये उन गिनी चुनी फिल्मों की लिस्ट में शामिल हो गई जिन्हें रिलीज के समय तो लोगों ने नहीं पूछा लेकिन समय के साथ इन्होंने क्लासिक सिनेमा का दर्जा हासिल कर लिया।
सदमा मेरी भी पसंदीदा हिंदी फिल्मों में से एक है। ये प्रेम में पूरी तरह डूब जाने की फिल्म है। ये फिल्म एक ऐसी दृश्यावली है जिसमें हृदय के हर उस कोने के चित्र कूंची से उकेरे गए जिन्हें इंसान किसी खास अहसास के लिए संभालकर रखता है। ये फिल्म बालू महेंद्रा का करुण क्रंदन है। वैसा ही जैसा सुमित्रानंदन पंत की कविता कहती है, ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। निकलकर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।’ सदमा उस प्रेम की अनुभूति है जो पीर के पर्वत सी हो जाने पर पिघलने की गुहार मांगती है। सदमा इसके निर्देशक बालू महेंद्रा की ही बनाई तमिल फिल्म मूंदरम पिराई की फ्रेम बाई फ्रेम हिंदी रीमेक है। दोनों फिल्मों में लीड रोल कमल हासन और श्रीदेवी ने ही किए। और, दोनों फिल्मों में सिल्क स्मिता ने स्कूल टीचर की ऐसी पत्नी का किरदार किया, जो यौवन के मद में है और मदन की तलाश में है।