फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सचिन पिलगांवकर को चुभा दादा साहब फाल्के पुरस्कार पर पूछा गया सवाल, यहां समझिए पूरा मामला विस्तार से

विज्ञापन
1 of 6
भारत सरकार के दादा साहब फाल्के पुरस्कार के साथ अमिताभ बच्चन और मुंबई में मिलने वाले अलग अलग फाल्के पुरस्कार - फोटो : अमर उजाला मुंबई
भारत सरकार की तरफ से हर साल दिए जाने वाले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में शामिल सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार के नाम से मिलते जुलते पुरस्कारों के बांटे जाने पर अभिनेता सचिन पिलगांवकर को आपत्ति नहीं है। वह कहते हैं कि दादा साहब फाल्के सिनेमा की बड़ी शख्सीयत रहे हैं और उनके नाम के सम्मान में भारत सरकार के अलावा कोई दूसरी संस्था भी पुरस्कार बांटती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। हालांकि, ये पूछे जाने पर कि क्या ऐसी परंपराएं शुरू होने से आने वाले दिनों में पद्मश्री और पद्मभूषण पुरस्कारों से मिलते जुलते नाम वाले पुरस्कार नहीं शुरू हो जाएंगे, सचिन का कहना था कि अगर सरकार को लगता है कि ये गलत है तो उसे इनको कॉपीराइट के तहत पंजीकृत कराना चाहिए और इन पर रोक लगानी चाहिए।

सचिन पिलगांवकर को चुभा सवाल

दादा साहेब फालके एकेडमी पुरस्कारों की शुरूआत मुंबई में इसके संस्थापक रामगोपाल गुप्ता ने की थी। तब भी उनसे तमाम संगठनों ने गुजारिश की थी कि अपने पुरस्कारों को उन्हें दादासाहेब फालके पुरस्कार के रूप में नहीं बल्कि दादासाहेब फालके एकेडमी अवार्ड के रूप में प्रचारित प्रसारित करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि ये पुरस्कार पाते ही इनमें से तमाम कलाकार मुंबई के फिल्म पत्रकारों पर दबाव बनाना शुरू करते हैं कि इन पुरस्कारों की खबर छाप दीजिए। और, ऐसी तमाम रिलीज में एकेडमी या द लेजेंड शब्द जानबूझकर हटा दिए जाते हैं। वेब सीरीज ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स’ के दूसरे सीजन के सिलसिले में सचिन पिलगांवकर से बात शुरू होने पर जब उनसे इस बारे में सवाल किया गया तो पहले तो उन्होंने इसमें कुछ भी गलत नहीं बताया लेकिन ये जानकारी देने पर कि राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों या राष्ट्रीय पुरस्कारों की अनुकृति करना विधिक भी नहीं है, उन्होंने इसे रोकने की जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी। यही नहीं, उन्होंने ये बातचीत वेब सीरीज ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स’ के दूसरे सीजन पर ही केंद्रित रखने का अनुरोध भी कर डाला।
विज्ञापन

2 of 6
साल 2010 के दादा साहब फाल्के एकेडमी अवार्ड्स में सचिन पिलगांवकर - फोटो : अमर उजाला मुंबई
दादा साहब फाल्के एकेडमी अवार्ड में सचिन

सचिन पिलगांवकर स्वयं भी अतीत में ऐसे ही एक पुरस्कार दादा साहब फाल्के अकेडमी अवार्ड्स में शामिल हो चुके हैं। ये साल 2010 की बात है। उन पुरस्कारों में इनके आयोजक सलमा आगा, प्राण, गजेंद्र चौहान और जगदीप आदि कलाकारों को भी बुलाने में सफल रहे थे। पुरस्कार पाने वाले तमाम कलाकारों को अक्सर ये पता भी नहीं होता कि दादा साहेब फाल्के एकेडमी अवार्ड या फिर द लेजेंड दादा साहब फाल्के पुरस्कार का भारत सरकार के दादा साहब फाल्के पुरस्कार से कोई लेना देना नहीं है। तमाम कलाकार तो इसके बाद अपने परिचय में लिखना भी शुरू कर देते हैं, दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता।
विज्ञापन

3 of 6
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से दादा साहब फाल्के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त करते अमिताभ बच्चन - फोटो : अमर उजाला मुंबई
क्या है दादा साहब फाल्के पुरस्कार?

देश में सिनेमा का ये सर्वोच्च सम्मान दिए जाने की परंपरा भारत सरकार ने 1969 से शुरू की थी और पहला दादा साहब फाल्के पुरस्कार देविका रानी को दिया गया था। उसके बाद से अब तक ये पुरस्कार 52 लोगों को दिया जा चुका है। अब तक साल 2019 तक के दादा साहब फाल्के पुरस्कार घोषित हो चुके हैं। आखिरी पुरस्कार अभिनेता रजनीकांत को उनके सिनेमा के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए घोषित किया गया। इस पुरस्कार में एक शॉल, एक स्वर्ण कमल, एक प्रमाण पत्र और दस लाख रुपये मिलते हैं। इन पुरस्कार विजेताओं की पूरी सूची आप यहां भारत सरकार के फिल्म समारोह निदेशालय की वेबसाइट पर देख सकते हैं। 

https://dff.nic.in/PhalkeAward.aspx

4 of 6
दादा साहब फाल्के एकेडमी अवार्ड की ट्रॉफी के साथ शिल्पा शेट्टी, ये राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं है - फोटो : अमर उजाला मुंबई
दादा साहेब फाल्के एकेडमी अवार्ड

यह पुरस्कार मुंबई में स्थापित दादा साहेब फाल्के एकेडमी ने देना शुरू किया था। इसकी शुरूआत सिनेप्रेमी रामगोपाल गुप्ता ने की थी। लेकिन अब इन पुरस्कारों से उनका कोई लेना देना नहीं बचा है। फिल्म कलाकारों में इन पुरस्कारों को लेकर कभी जागरुकता नहीं आई और सबने इसे देश का सर्वोच्च सिनेमा सम्मान सरीखा ही समझ लिया। मुंबई के तमाम कलाकारों व फिल्मकारों के दफ्तरों में वैसी ही ट्रॉफियां देखने को मिल जाती हैं, जैसी यहां शिल्पा शेट्टी ने थाम रखी है। यह ट्रॉफी भारत सरकार से मिलने वाला सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार नहीं है। 
विज्ञापन

5 of 6
द लेजेंड दादा साहब फाल्के अवार्ड की ट्रॉफी के साथ गजेंद्र चौहान, ये राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं है - फोटो : अमर उजाला मुंबई
द लेजेंड दादा साहब फाल्के अवार्ड

भारत सरकार की तरफ से दिए जाने वाले सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार के नाम से मिलते जुलते पुरस्कार द लेजेंड दादा साहब फाल्के अवार्ड अभी कुछ दिनों पहले मुंबई में और बांटे गए। भारतीय फिल्म एंड टीवी प्रशिक्षण संस्थान, पुणे के अध्यक्ष रह चुके चर्चित अभिनेता गजेंद्र चौहान इस पुरस्कार को पाने के बाद सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हुए। इन मुंबइया फाल्के पुरस्कारों का विरोध इसी के बाद और मुखर हुआ है। गजेंद्र चौहान ने यहां जो ट्रॉफी थाम रखी है, वह भी भारत सरकार से मिलने वाला सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार नहीं है। 
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
दादा साहब फाल्के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल अवार्ड की ट्रॉफी, ये राष्ट्रीय पुरस्कार नहीं है - फोटो : अमर उजाला मुंबई
दादा साहब फाल्के इंटरनेशनल फिल्म अवार्ड

इसी साल फरवरी में मुंबई में दादा साहब इंटरनेशनल फिल्म अवार्ड भी शुरू हुए जिसमें हंसल मेहता की वेब सीरीज ‘स्कैम 1992’ को पुरस्कार मिलने की बाकायदा प्रेस रिलीज इसकी निर्माता कंपनी की तरफ से जारी की गई। इन मुंबइया दादा साहब फाल्के पुरस्कारों को फिल्मप्रेमी लगातार विरोध भी करते रहे हैं, लेकिन इन्हें पाने वाले न सिर्फ इन पर इतराते हैं बल्कि इनका विरोध करने वालों को निशाने पर भी लेते हैं। यहां जो ट्रॉफी आप देख रहे हैं, वह भारत सरकार से मिलने वाला सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार नहीं है।
 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें