भारत सरकार की तरफ से हर साल दिए जाने वाले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में शामिल सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार के नाम से मिलते जुलते पुरस्कारों के बांटे जाने पर अभिनेता सचिन पिलगांवकर को आपत्ति नहीं है। वह कहते हैं कि दादा साहब फाल्के सिनेमा की बड़ी शख्सीयत रहे हैं और उनके नाम के सम्मान में भारत सरकार के अलावा कोई दूसरी संस्था भी पुरस्कार बांटती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। हालांकि, ये पूछे जाने पर कि क्या ऐसी परंपराएं शुरू होने से आने वाले दिनों में पद्मश्री और पद्मभूषण पुरस्कारों से मिलते जुलते नाम वाले पुरस्कार नहीं शुरू हो जाएंगे, सचिन का कहना था कि अगर सरकार को लगता है कि ये गलत है तो उसे इनको कॉपीराइट के तहत पंजीकृत कराना चाहिए और इन पर रोक लगानी चाहिए।
सचिन पिलगांवकर को चुभा सवाल
दादा साहेब फालके एकेडमी पुरस्कारों की शुरूआत मुंबई में इसके संस्थापक रामगोपाल गुप्ता ने की थी। तब भी उनसे तमाम संगठनों ने गुजारिश की थी कि अपने पुरस्कारों को उन्हें दादासाहेब फालके पुरस्कार के रूप में नहीं बल्कि दादासाहेब फालके एकेडमी अवार्ड के रूप में प्रचारित प्रसारित करना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि ये पुरस्कार पाते ही इनमें से तमाम कलाकार मुंबई के फिल्म पत्रकारों पर दबाव बनाना शुरू करते हैं कि इन पुरस्कारों की खबर छाप दीजिए। और, ऐसी तमाम रिलीज में एकेडमी या द लेजेंड शब्द जानबूझकर हटा दिए जाते हैं। वेब सीरीज ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स’ के दूसरे सीजन के सिलसिले में सचिन पिलगांवकर से बात शुरू होने पर जब उनसे इस बारे में सवाल किया गया तो पहले तो उन्होंने इसमें कुछ भी गलत नहीं बताया लेकिन ये जानकारी देने पर कि राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों या राष्ट्रीय पुरस्कारों की अनुकृति करना विधिक भी नहीं है, उन्होंने इसे रोकने की जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी। यही नहीं, उन्होंने ये बातचीत वेब सीरीज ‘सिटी ऑफ ड्रीम्स’ के दूसरे सीजन पर ही केंद्रित रखने का अनुरोध भी कर डाला।