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Richard Attenborough: रिचर्ड एटनबरो ने 20 साल झोंककर बनाई थी 'गांधी' जैसी फिल्म, इस किताब ने बदल दी थी जिंदगी

Wed, 24 Aug 2022 12:29 PM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार


 
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Richard Attenborough - फोटो : सोशल मीडिया
आज ब्रिटिश एक्टर-डायरेक्टर रिचर्ड एटनबरो की पुण्यतिथि है। एटरनबरो को 'ब्राइटन रॉक' (1948), 'आई एम ऑल राइट जैक' (1959), 'द ग्रेट एस्केप' (1963), 'द सैंड पेबल्स' (1966), 'जुरासिक पार्क' (1993) जैसी फिल्मों में अभिनय के लिए जाना जाता है। मगर, बतौर निर्देशक उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का जिक्र किया जाए तो नाम आएगा 'गांधी' का। वर्ष 1982 में रिलीज हुई इस फिल्म को एटनबरो ने इस शिद्धत से बनाया कि अपनी जिंदगी के करीब दो दशक इसे दे दिए। यह फिल्म बनाने, महात्मा गांधी की जिंदगी और भारत को बखूबी समझने के लिए उन्होंने भारत की कई बार यात्राएं की। फिल्म को बनाने के दौरान उन्होंने पैसे की जरा भी किल्लत नहीं आने दी और अपना घर तक बेच डाला। इस मेहनत के बाद जो फिल्म बनकर तैयार हुई, उसने इतिहास रच दिया। आखिर एटनबरो को यह फिल्म बनाने की प्रेरणा कहां से मिली थी? आइए जानते हैं...
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'गांधी' - फोटो : सोशल मीडिया
इस तरह बदला जीवन
रिचर्ड एटनबरो का जन्म 29 अगस्त 1923 को इंग्लैंड में हुआ। उन्होंने एक्टिंग में करियर बनाया और कई अंग्रेजी फिल्मों में अभिनय का जादू बिखेरा। उन्होंने फिल्म प्रोडक्शन की दुनिया में भी हाथ आजमाया। एक एक्टर और आंशिक रूप से एक प्रोड्यूसर के रूप में वह शानदार काम कर रहे थे कि एक दिन अचानकर मोतीलाल कोठारी ने उन्हें लुई फिशर की लिखी गांधी जी की जीवनी दी। इसे पढ़ने के बाद एटनबरो की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। एक बातचीत के दौरान खुद एटनबरो ने यह बात कही थी। उन्होंने कहा था, 'इस किताब ने मेरी जिंदगी बदल दी। उसके बाद मैंने अभिनय छोड़ने से लेकर फिल्मों के निर्देशन तक जो कुछ भी किया है, इस किताब के असर के कारण किया। इसके बाद उन्होंने महात्मा गांधी के ऊपर फिल्म बनाने का फैसला किया।
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'गांधी' - फोटो : सोशल मीडिया
गहन रिसर्च के लिए कई बार आए भारत
इस फिल्म के किसी भी पहलू में कोई कमी न रह जाए, इसका एटनबरो ने पूरा ख्याल रखा। बतौर एक्टर-डायरेक्टर वह जैसा सोचते थे, वैसा ही करना पसंद करते थे। फिल्म गांधी को बनाते हुए उन्होंने कहा था, 'मैं गांधी पर फिल्म नहीं बना रहा हूं, बल्कि फिल्म में गांधी को पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं।' यही वजह थी कि उन्होंने इसके लिए खूब रिसर्च और यात्राएं कीं। बता दें कि फिल्म 'गांधी' को बनाने के लिए एटनबरो ने करीब 40 बार भारत की यात्रा की थी। इस दौरान वह कई बार जवाहरलाल नेहरू से मिले, इंदिरा गांधी से मिले। उन्होंने भारत आकर हर उस जगह का दौरा किया, जहां जाकर वह गांधी जी के बारे में समझ सकते थे। हर उस शख्स से मिले, जो गांधी जी के बारे में बेहतर जानकारी दे सकता था। 

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Richard Attenborough - फोटो : सोशल मीडिया
बेच दिया कलाकृतियों का संग्रह
इस फिल्म को बनाते वक्त वह पूरी तरह गांधी जी से प्रभावित थे। वह जिस शानदार अंदाज में इस फिल्म को बनाना चाहते थे, उसके लिए खूब पैसा चाहिए था और एटनबरो ने कभी इस फिल्म की मेकिंग में पैसे की किल्लत को आड़े नहीं आने दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके लिए उन्होंने अपना लंदन का घर गिरवी रख दिया था और अपनी कलाकृतियों का संग्रह बेच दिया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके सामने ऐसी नौबत भी आ गई थी कि उनके बास गैस का बिल चुकाने के पैसे भी नहीं बचे थे। हालाांकि, करीब दो दशक की मेहनत के बाद जब एटनबरो की फिल्म 'गांधी' आई तो उसने इतिहास रच दिया। इस फिल्म ने एक, दो नहीं, पूरे आठ ऑस्कर अवॉर्ड जीते थे। यही नहीं, इसके एक बरस बाद यानी 1983 में एटनबरो को भारत-सरकार ने तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म-भूषण' से भी सम्मानित किया।
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Richard Attenborough - फोटो : सोशल मीडिया
बेन किंग्सले ने निभाया गांधी जी का किरदार
बता दें कि फिल्म 'गांधी' में एक्टर बेन किंग्सले ने गांधी जी का किरदार अदा किया। इस फिल्म से जुड़ा एक किस्सा है। पुणे के आगा खां पैलेस में शूटिंग के दौरान बेन किंग्सले वहां जिस अंदाज में सीढ़ियां चढ़ रहे थे, वह एटनबरो को खास पसंद नहीं आया। वह पूरी तरह गांधी जी की चाल देखना चाहते थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक इसके लिए एटनबरो ने करीब 50 बार बेन किंग्सले को सीढियों पर चढ़ाया होगा। इसके बाद वह उनकी चाल से संतुष्ट हो पाए। इतना ही नहीं, कहा जाता है कि गांधी का रोल करने के लिए उन्होंने बेन किंग्सले को शूटिंग के दौरान बापू की जीवनचर्या अपनाने सलाह दी। इसके लिए उन्हें होटल के जिस कमरे में रुकवाया गया, उसे खाली करा दिया गया। बेन कमरे में फर्श पर सोते थे। गांधी जी की तरह उठते। उपवास किया करते। इस सबके बाद जब उनका मेकअप होता तो बेन किंग्सले पूरी तरह गांधी जी बनकर निकलते। इसके पीछे एटनबरो की मेहनत और प्लानिंग होती थी। यही वजह थी कि वह भारत की महान विभूति के ऊपर एक ऐसी शानदार फिल्म बना पाए, जो एक दस्तावेज है।
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