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Randeep Hooda Interview: राहुल गांधी शायद अपनी दादी से ज्यादा जानते हैं, रणदीप ने याद दिलाई इंदिरा की कही बात

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रणदीप हुड्डा एक्सक्लूसिव - फोटो : अमर उजाला
हरियाणा के रोहतक में जन्मे रणदीप हुड्डा को उनके पिता अपनी ही तरह डॉक्टर बनाना चाहते थे। रणदीप ने भी दुनिया भर में घूमकर खूब पढ़ाई की, मॉडलिंग की, घुड़सवारी की, तैराकी की। राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में पदक जीते और फिर अभिनेता बन गए। रंगमंच करते करते मीरा नायर की फिल्म ‘मॉनसून वेडिंग’ से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ और अपनी 23 साल की इस सिनेमाई अभिनय यात्रा के बाद अब वह फिल्म निर्देशक और निर्माता भी बन गए हैं, अपनी अगली फिल्म ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर’ के लिए। इस फिल्म के बारे में, हिंदुत्व को लेकर सावरकर के विचारों के बारे में और बीजेपी की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने के बारे में पूछे गए प्रश्नों के बेबाकी से उत्तर दे रहे हैं रणदीप हुड्डा, ‘अमर उजाला’ के संपादकीय सलाहकार पंकज शुक्ल से इस खास बातचीत में।
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रणदीप हुड्डा-स्वातंत्र्यवीर सावरकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ बनाने के लिए किस वजह ने आपके लिए उत्प्रेरक का काम किया?

मेरे पास जब ये फिल्म आई तो मुझे लगा कि मैं तो इतिहास जानता हूं। लेकिन, उसे जब फिर से पढ़ना शुरू किया तो पूरी किताब के अंदर सशस्त्र क्रांति पर सिर्फ एक पैराग्राफ लिखा था। यह बात मुझे अजीब लगी कि हजारों लोग थे सशस्त्र क्रांति को मानने वाले, जैसे कि वासुदेव फड़के, रंगारी, तिलक, चापेकर बंधु, खुदीराम बोस, अनंत कन्हारे, भगत सिंह चंद्र शेखर आजाद, नेताजी, काकोरी वाले, गदर पार्टी वाले, श्यामजी वर्मा, मैडम कामा आदि, ये लोग हमारे इतिहास में इतने महत्वपूर्ण क्यों नही हैं? इनके ऊपर लिखा ही नहीं गया।
 
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रणदीप हुड्डा-स्वातंत्र्यवीर सावरकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इस फिल्म की विचारधारा तो खैर जब फिल्म रिलीज होगी तब लोग देखेंगे ही। मैं ये जानना चाहता हूं कि किसी ऐतिहासिक किरदार के रंग में रंग जाने का गुरुमंत्र आपको क्या आपके रंगमंच गुरु नसीरुद्दीन शाह से मिला?

जी, जी बिल्कुल। मेरी इस सोच के जनक नसीर भाई ही हैं। जिस तरह से वह इस कला को अपनाते हैं। मैंने ये उन्हीं से ही सीखा है। और, फिर कुछ समय सीखने के बाद बाद आप अपने भी तरीके बना लेते हैं। वहां पहुंचने के, उसे करने के कि जब आपके पास कोई असली किरदार होता है तो आपके पास उसके संदर्भ होते हैं।

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रणदीप हुड्डा-कैट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

ये आपकी चौथी बायोपिक फिल्म है, और तकरीबन हर किरदार में आपने इतनी ही मेहनत की है..

एक तो क्या है कि मेरी इन सबमें रुचि है। कोई टैलेंट-वैलेंट नहीं होता, रुचि होती है। जिसके साथ आपकी रुचि होगी, आप उसके साथ ज्यादा समय बिताएंगे। उस पर ज्यादा मेहनत करेंगे और वह मेहनत भी नहीं लगेगी, मजे लेना लगेगा। दूसरी बात ये कि अगर कोई आप वास्तविक जीवन का किरदार कर रहे हैं तो आप उन जैसे दिखो तो सही। आपका अभिनय कैरीकेचर नहीं लगना चाहिए। हाल ही मैंने कुछ पिक्चरें देखीं, बहुत कार्टून टाइप लगीं मुझे वे।
 

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रणदीप हुड्डा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अभिनय के प्रति ये जो समर्पण है उसके लिए अनुभव कहां से लाते हैं?

आपके अपने जीवन के अनुभव और जो आप दूसरों के अनुभवों को महसूस करते हैं उससे। अभिनय की मेरी सबसे बड़ी शिक्षा टैक्सी चलाने में हुई थी। जब आप टैक्सी में बैठे होते हैं तो आप भूल जाते हैं कि गाड़ी में ड्राइवर भी है। मैंने लोगों को इतने करीब से देखा था तो मेरी रुचि वहां से और बढ़ गई थी। मैं लोगों के हावभाव देखकर टैक्सी में संगीत बजाता था और उससे मुझे टिप बहुत मिलती थी तो मैं एक कामयाब टैक्सी ड्राइवर था। मैं भाग्यशाली हूं कि जो मेरी रुचि थी वह मेरा व्यवसाय बन गई।

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रणदीप हुड्डा-स्वातंत्र्यवीर सावरकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इतने समर्पण के साथ जब फिल्म बनकर तैयार होती है और राहुल गांधी जैसा कोई आदमी बोल देता है कि वह तो माफी वीर थे, कितना कष्ट होता होगा आपको?

बहुत कष्ट होता है, जैसा मैंने एक इंटरव्यू में कहा था थप्पड़ मारने का मन होता है। क्या आप ये बोल रहे हैं कि सावरकर जी स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में से एक नहीं थे? उनकी दादी जी (इंदिरा गांधी) ने सावरकर जी के निधन पर कहा था कि वह बहुत बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे उनका योगदान हमारे स्वतंत्रता संग्राम में बहुत बड़ा रहा है। इनकी सोच आने वाली पीढ़ियों को एक आकार देती रहेगी। और, उन पर एक डाकटिकट भी जारी किया था। तो क्या राहुल गांधी अपनी दादी से ज्यादा जानते हैं?

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रणदीप हुड्डा-स्वातंत्र्यवीर सावरकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अगर सत्ताधारी पार्टी आपको संसद सदस्य बनाना चाहे तो कितना तैयार हैं आप उसके लिए?

नाम के लिए, आधे मन से न मैंने कभी काम किया है न मैं अपनी जिंदगी जिया हूं। न ही इसके लिए मैं अपना करियर बदलूंगा। मैं मानता हूं कि राजनीति से भी देशसेवा हो सकती है। लेकिन, अभी मैं नया नया निर्देशक बना हूं पिक्चरें बनाने की चाह है। अभी बतौर एक्टर मुझे और बहुत कुछ करना है। तो अभी वह समय नहीं आया है। आगे क्या होगा, ये तो पता नहीं लेकिन अभी मैं चुनाव नहीं लड़ना चाहता। मैं 22-23 साल से इस कला के पीछे लगा हुआ हूं और अब जब कहीं कहीं पहुंचने लगा हूं तो अभी मैं इसको छोड़ दूं तो मेरा दिल टूट जाएगा।
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रणदीप हुड्डा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म ‘स्वातंत्रय वीर सावरकर’ देखने के बाद ऐसी कौन सी बातें हैं जो कांग्रेस के बारे मे दर्शकों को पहली बार पता चलेंगी?

देखिए, ये पिक्चर मैंने कांग्रेस की गोभी खोदने के लिए नहीं बनाई है। ये पिक्चर मैंने सावरकर जी के हालात और किन हालात में उनकी ये सोच विकसित होती रही, उसको स्पष्टता से दिखाने के लिए बनाई है। मैं सशस्त्र क्रांति की पिक्चर बना रहा हूं। गांधी जी की विचारधारा के वह विपरीत थे और मेरा मानना है कि हमें गांधी जी और कांग्रेस को अलग कर देना चाहिए। गांधी जी और इंडियन नेशनल कांग्रेस दो अलग अलग पहचान हैं।
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