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EXCLUSIVE: एबीवीपी के नेता भी रह चुके हैं पंकज त्रिपाठी, बोले- 'राजनीति जमी नहीं इसलिए अभिनय में आ गया'

Sat, 17 Oct 2020 12:02 AM IST
पंकज शुक्ल पंकज शुक्ल
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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

25 साल की लगातार मेहनत ने पंकज त्रिपाठी को सिनेमा में वह मुकाम दिलाया है, जिसे देखकर गांवों के युवा अब प्रेरणा पाते हैं। पंकज त्रिपाठी से अमर उजाला के लिए ये एक्सक्लूसिव मुलाकात की पंकज शुक्ल ने। प्रस्तुत हैं कुछ महत्वपूर्ण अंश। इंटरव्यू के आखिर में इस इंटरव्यू का वीडियो जरूर देखिएगा।

 

सिनेमा में अभिनय की विविधता के प्रदर्शन का जो सौभाग्य या संयोग आपको मिला है, उसे कैसे देखते हैं?
यह बहुत अच्छा है। कुछ साल पहले तक पहले ऐसा नहीं था। हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री बहुत जल्दी कलाकारों को टाइपकास्ट कर देती है। वह या तो विलेन बना देगी या कॉमेडियन बना देगी। हम सौभाग्य से उस दौर में आए जब सिनेमा, इसकी कहानी, कहानी कहने का तरीका सब कुछ बदल रहा है। मैं सौभाग्यशाली हूं कि इस बदलते दौर के सिनेमा का मैं गवाह हूं।
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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपने 11वीं तक किसानी की, फिर पटना में होटल में नौकरी की, फिर दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ाई की और अब ‘मिर्जापुर 2’ जैसी सीरीज में आपको एक साथ 200 देशों में देखा जाएगा। कैसी है ये अनुभूति?
उस अनुभूति को मेरे लिए शब्दों में बताना तो कठिन है लेकिन मैं इसे इस तरीके से देखता हूं कि मेरी ये यात्रा ग्रामीण भारत में बैठे हर बच्चे की यात्रा है। वह यह सपना देख सकता है कि बिना किसी गॉडफादर के सिर्फ अपनी मेहनत के बूते एक लड़का गांव से आकर भी कामयाबी पा सकता है। मेरी यात्रा हर उस बच्चे के लिए उदाहरण है, जो इस बातचीत को पढ़ रहा है।
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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, उस बच्चे को ये जानना कितना जरूरी है कि पंकज त्रिपाठी आज जो हैं उसके पीछे कितने साल की मेहनत है?
बिल्कुल, 16 साल मुंबई के और उससे पहले नौ साल रंगमंच के। 25 साल की ये मेरी यात्रा है। लेकिन आज की पीढ़ी में सबको सब कुछ तुरंत चाहिए। ये चाहते हैं कि अभिनय का कोई तीन महीने का कैप्सूल आ जाए तो वो कोर्स कर लें। अभिनय कभी कैप्सूल कोर्स नहीं हो सकता।

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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के प्रशिक्षण से आपको मुंबई फिल्म जगत में कितनी मदद मिली?
एनएसडी के प्रशिक्षण से बतौर अभिनेता मेरा विकास तो हुआ लेकिन मुंबई में काम दिलाने में इसने मेरी कोई मदद नहीं की। यहां कोई एनएसडी से पढ़कर आए, फिल्म इंस्टीट्यूट से पढ़कर आए या फिर कोई तीन महीने का कोर्स करके आ जाए, हमारे समय में तो सबको एक ही तराजू में तौल दिया जाता था। मेरे तमाम वरिष्ठ साथी इसीलिए मुंबई छोड़कर चले भी गए। उनको बुरा लगता था कि यहां आराम नगर (मुंबई में संघर्षशील कलाकारों का अड्डा) में उनको लाइन में लगकर ऑडीशन देना पड़ रहा है और कोई 20 साल का लड़का निकल कर बोल देता है कि आप फिट नहीं हैं।
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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपके मन में कभी सरकारी नौकरी करने का ख्वाब आया था?
मेरे घर में बहुत जुनून था सरकारी नौकरी का। मेरे बाबूजी चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं। तब कहीं एलडीसी यानी लोअर डिवीजन क्लर्क बन जाए या यूडीसी बन जाए तो वही बड़ी बात होती थी। यह बाबूजी की चाहत थी। मुझमें में ये चाहत नहीं थी। मैं थोड़ा अनुशासन तोड़ने वाला आदमी था।
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पंकज त्रिपाठी और इरफान खान - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सुना है आप बचपन में लड़कियों के कपड़े पहन कर भी नाचते थे, इस पर मार पड़ी कभी घर में?
नहीं, नहीं, कभी नहीं। हमारे पिताजी काफी प्रगतिशील हैं। इस मामले में तो उन्होंने कभी मना नहीं किया। अभिनय क्षेत्र में भी आने से मना नहीं किया। यही कहा कि करो जो तुम्हें अच्छा लगता है। मैंने तो अपने जीवन की पहली पिक्चर ‘जय संतोषी मां’ भी उन्हीं के साथ देखी सिनेमाहॉल में। वह उस सिनेमाघर के उद्घाटन की पूजा कराने गए थे।
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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
‘सैक्रेड गेम्स’ के दूसरे सीजन में गणेश गायतोंडे और गुरुजी के दैहिक संबंधों वाले दृश्य या ऐसे ही दूसरे सीन आप पैसों के लिए करते हैं, या फिर कोई और वजह है?
पैसों के लिए काम करने का मेरा वक्त जा चुका है। अब मैं दोस्तों, नातों व संबंधों के लिए काम करता हूं। कई बार ऐसा होता है कि शायद कहानी पसंद नहीं आती। लेकिन जो लोग उसे बना रहे हैं, वे ऐसे लोग हैं, जो मेरे गाढ़े वक्त में काम आए तो मैं उनके साथ खड़ा रहता हूं। में जो भी काम किया है, वह उस दिन के सत्य के हिसाब से किया है। मेरा मानना है कि सत्य समय के हिसाब से बदलता रहता है और इसीलिए मुझे अतीत को लेकर कभी पश्चाताप नहीं होता।

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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अब जल्द ही आप क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत की पहली जीत पर बनी फिल्म ‘83’ में दिखने वाले हैं, कितना क्रिकेट खेला है आपने अपने निजी जीवन में?
नहीं, मैंने कभी क्रिकेट नहीं खेला। बचपन में गांव में रेडियो कमेंट्री जरूर खूब सुनी है। तब पूरे गांव में बस दो ही रेडियो होते थे, और उसी से हमें पता चला कि गास्वकर, कपिल देव और रवि शास्त्री कौन हैं। फिर फिल्म ‘83’ की शूटिंग के दौरान मेरी मुलाकात सुनील गावस्कर से हुई तो ये सब उनको बताते बताते मैं इतना भावुक हो गया कि रो पड़ा।
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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लिए भी आपने काम किया, फिर राजनीति का असली चेहरा देखकर दुख तो हुआ होगा?
हां, कह सकते हैं कि राजनीति जमी नहीं इसीलिए अभिनय में आ गए। यहां कम से कम ये पता रहता है कि कब असल जीवन जिया जा रहा है और कब अभिनय हो रहा है। राजनीति में अभिनय और असलियत में फर्क बहुत मुश्किल है।

इस पूरे इंटरव्यू का वीडियो आप यहां देख सकते हैं..
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