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नारायण मूर्ति पर रिसर्च ने बदला जीवन का नजरिया, अश्विनी बोलीं, ‘ये मेरे जीवन के सबसे अनमोल पल हैं’

Sat, 24 Apr 2021 09:40 AM IST
अमरीन हुसैन अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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अश्विनी अय्यर तिवारी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

सिनेमा के अपने सपने पूरे करने के लिए निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी ने अपने जमे जमाए एडवर्टाइजिंग करियर को एक दिन यूं छोड़ दिया। तब से पांच साल में वह तीन गजब की फीचर फिल्में बना चुकी हैं। अश्विनी अब इन्फोसिस के सह संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति और उनकी पत्नी सुधा मूर्ति पर अपनी अगली फिल्म जल्द ही शुरू करने वाली हैं।

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'पंगा' - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
बीते साल जनवरी में रिलीज हुई कंगना रणौत की फिल्म ‘पंगा’ ने उन्हें इस साल सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया और इसकी निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी को दिया वह भरोसा जिसके सहारे वह अपनी जमी जमाई 15 साल की नौकरी छोड़ आई थीं। उनकी पहली फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ ने बीते गुरुवार को ही अपनी रिलीज के पांच साल पूरे किए। बीते साल भर से वह अपनी नई कहानी पर काम कर रही हैं जिसके बारे में उनका कहना है, ‘इस कहानी ने मेरी अपनी शख्सीयत पर गहरा असर डाला है।’ यह कहानी है ही ऐसी।
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अश्विनी अय्यर तिवारी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
41 साल की हो चुकीं अश्विनी अय्यर तिवारी के लिए बीता साल तमाम ऐसी यादों को सहेजने का साल बन गया जिनेक सहारे उनकी पूरी उम्र गुजर सकती हैं। वह साल भर से इन्फोसिस के सह संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति और उनकी पत्नी सुधा मूर्ति पर बनने वाली फिल्म की कहानी पर काम कर रही हैं। हालांकि, उनको इस काम में अपने पति निर्देशक नितेश तिवारी के अलावा सह लेखकों श्रेयस जैन व पीयूष गुप्ता की भी मदद मिल रही है, लेकिन इस दंपती के संघर्ष और सफलता की कहानियां उन्हें भी भीतर तक बदल चुकी हैं।

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'पंगा' - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पीटीआई से एक बातचीत में अश्विनी कहती हैं, ‘मूर्ति दंपती की कहानी को जानने के दौरान मुझे लगता है कि मैं भी बदल रही हूं। ये एक ऐसा अनुभव महसूस हो रहा है जो अब पूरा जीवन मेरे साथ रहने वाला है। सबसे बड़ी बात जो इस दंपती की कहानी ने मुझे सिखाई, वह ये कि जीवन में आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं? और, जीवन में जो आप काम कर रहे हैं, उसके अलावा जीवन का आपका उद्देश्य क्या है? मुझे तो अब ये कहानी फिल्म लगती ही नहीं। ये मेरे जीवन का अनुभव बन चुकी है। जब भी मैं अपने दिल को टटोलती हूं तो कहीं गहराई में मुझे ये एहसास हर पल होता है कि ये फिल्म मेरे फिल्म करियर की सबसे बड़ी चुनौती तो है ही साथ ही ये लम्हें जो मैं इसे लिखते हुए बिता रही हूं, मेरे जीवन के सबसे अनमोल पल बन रहे हैं।’
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अश्विनी अय्यर ‘घर की मुर्गी’ के सेट पर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

अश्विनी अय्यर तिवारी और उनकी टीम इन दिनों इस फिल्म की पटकथा को अंतिम रूप देने में लगी है। इरादा यही है कि देश के हालात बेहतर होते ही इसकी शूटिंग शुरू कर दी जाए। हालांकि, इस फिल्म को शुरू करने से पहले अश्विनी को एक वेब सीरीज भी पूरी करनी है। इस वेब सीरीज की लेखक सौम्या जोशी के साथ भी उनका वार्तालाप इसके लिए चलता रहता है। अश्विनी के मुताबिक ये वेब सीरीज एक बहुत ही भावुक प्रेम कहानी है। सीरीज का नाम रखा गया है फाड़ू और ये उसी ओटीटी के लिए बनना प्रस्तावित है जिसके लिए बीते साल अश्विनी ने शॉर्ट फिल्म ‘घर की मुर्गी’ बनाई थी।

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अश्विनी अय्यर तिवारी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने अश्विनी की इस वेब सीरीज और फिल्म दोनों का काम प्रभावित किया है। वर्क फ्रॉम होम का जिक्र चलने पर वह कहती हैं, ‘पिछले पूरे साल घर से ही काम कर करके हमें अब तो जैसे इसकी आदत सी हो चली है। इंटरनेट और इन आदतों का ही असर है कि अब हम लगातार घर से ही काम करते रहेंगे। इस महामारी ने हमें ये भी सिखाया है कि अपना काम करते रहो और जब भी समय सही व सुरक्षित हो अपना काम हकीकत के धरातल पर ले आओ। और, सबको तब यही लगता है कि हम फिर से एक अच्छे दिन के एहसास के पास लौट आए हैं।’
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अश्विनी अय्यर तिवारी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अश्विनी अय्यर तिवारी अपनी एक किताब भी अगले महीने लॉन्च करने वाली थीं। ‘मैपिंग लव’ नाम की ये किताब एक काल्पनिक उपन्यास है और अश्विनी की ये पहली किताब है। लेकिन, वह मानती हैं अपनी पहली किताब का जश्न मनाने का ये सही समय नहीं है। वह कहती हैं, ‘मेरी खुशी तब तक मायने नहीं रखती जब तक कि हमारे आसपास के लोगों के चेहरे भी खिले हुए न हों, और अभी के हालात ये है कि हम या हमारे आसपास के लोग कोई भी अच्छा महसूस नहीं कर रहे हैं।’ अश्विनी का मानना है कि जब उनकी मां, उनकी चाची-चाचा, दोस्त, रिश्तेदार सब उनकी लिखी पहली किताब का जश्न मनाने की स्थिति में होंगे तभी वह इस किताब को लॉन्च करेंगी।
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अश्विनी अय्यर तिवारी - फोटो : Insatagram- @ashwinyiyertiwari
अपनी पहली फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ को ही तमिल में बनाने के अलावा अश्विनी ने अपनी दो और हिंदी फिल्मों ‘बरेली की बर्फी’ और ‘पंगा’ के लिए भी काफी तारीफें बटोरी हैं। वह मानती हैं कि कुछ भी नया रचने का मौका मिलना फिल्म जगत में आपको कुछ भी करने की छूट नहीं देता है। वह कहती हैं,  ‘सिनेमा में कहें कि कहानियां कहने के किसी भी माध्यम में रचनाकारों के लिए ऐसा करना एक लंबा सफर जैसा होता है, इस सफर में पटकथा से लेकर इसमें काम करने वाले सितारे, प्रोडक्शन, मार्केटिंग, वितरण और दर्शकों की प्रतिक्रियाएं सब हमसफर होते हैं और सबको कदमताल करा पाना ही इसका सबसे बड़ा उद्देश्य है। कहानियां कहना एक लंबी मानव श्रृंखला का समेकित प्रयास है जैसे कि रिले रेस जिसमें आपके आगे दौड़ने वाला पीछे से बैटन लाने वाली की काबिलियत पर पूरा भरोसा करता है और अपने आगे वाले तक बैटन पहुंचने तक पूरी ताक़त से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करता है।’
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