नितिन मुकेश
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
पापा की गाई आखिरी पंक्तियां
पापा ने अपने जीवन में आखिरी बार कोई गीत गाया तो ये टोरंटो के शो में गाईं थी। उस दिन ये तय हुआ कि मैं और पापा ये गाना साथ गाएं। वह गाना शुरू करते थे और मैं दूसरे अंतरे से उनका साथ देता था। तो उनकी लाइन थी,
अपनी नजर में आज कल, दिन भी अंधेरी रात है
साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है
फिर वो मुखड़ा गाते थे,
जाने कहां गए वो दिन, कहते थे तेरी राह में
नजरों को हम बिछाएंगे
चाहे कहीं भी तुम रहो, चाहेंगे तुमको उम्र भर
तुमको ना भूल पाएंगे
जाने कहां गए वो दिन ...
फिर म्यूजिक बजता और फिर मेरी लाइन आती..
इस दिल के आशियाने में बस उनके ख़याल रह गये
तोड़ के दिल वो चल दिए, हम फिर अकेले रह गए
सोचिए कि भगवान ने मेरे मुख से, मेरे कंठ से क्या लाइनें कहलवाईं। विधि में जो लिखा हो वह ईश्वर को ही पता है कि कल का दिन ये इंसान देखेगा कि नहीं। लेकिन किसी से ये कहलवा देना! जब वह नहीं रहे तो मेरा ध्यान सबसे पहले इसी तरफ गया। आखिरी पंक्तिया मैंने पापा के साथ गाईं, तोड़ के दिल वो चल दिए, हम फिर अकेले रह गए...