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Mukesh Last Show: नितिन मुकेश ने भरे दिल से सुनाया पापा के आखिरी शो का किस्सा, ये रहीं आखिरी पंक्तियां

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मुकेश और नितिन - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हिंदी सिनेमा के पार्श्वगायकों का जब जब जिक्र होता है, अपनी अनोखी आवाज के बूते देश दुनिया के करोडों लोगों को दीवाना बनाने वाले गायक मुकेश का जिक्र सबसे पहली बातचीत में आता है। मुकेश के बारे में इंटरनेट पर ढेरों जानकारियों, ढेरों किस्से मौजूद हैं, लेकिन जैसा कि हमारी हर बार कोशिश रहती हैं, हम इन किस्सों की सच्चाई जानने के लिए इन सितारों से या उनके परिजनों से मुलाकात करके असल बात सामने लाते रहते हैं। मुकेश को लेकर सबसे लोकप्रिय किस्सा ये है कि उनका निधन अमेरिका के एक शो में ‘एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल’ गाना गाते हुआ। मुकेश के बेटे मशहूर गायक नितिन मुकेश ने ‘अमर उजाला’ से एक एक्सक्लूसिव बातचीत में न सिर्फ अपने पिता के निधन से ठीक पहले के लम्हों का साझा किया, बल्कि और भी तमाम दिलचस्प जानकारियां दीं। आगे की कहानी, खुद नितिन मुकशे की जुबानी...
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नितिन मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

पापा की गाई आखिरी पंक्तियां
पापा ने अपने जीवन में आखिरी बार कोई गीत गाया तो ये टोरंटो के शो  में गाईं थी। उस दिन ये तय हुआ कि मैं और पापा ये गाना साथ गाएं। वह गाना शुरू करते थे और मैं दूसरे अंतरे से उनका साथ देता था। तो उनकी लाइन थी,
अपनी नजर में आज कल, दिन भी अंधेरी रात है

साया ही अपने साथ था, साया ही अपने साथ है

फिर वो मुखड़ा गाते थे,
जाने कहां गए वो दिनकहते थे तेरी राह में

नजरों को हम बिछाएंगे

चाहे कहीं भी तुम रहोचाहेंगे तुमको उम्र भर

तुमको ना भूल पाएंगे

जाने कहां गए वो दिन ...

फिर म्यूजिक बजता और फिर मेरी लाइन आती..

इस दिल के आशियाने में बस उनके ख़याल रह गये

तोड़ के दिल वो चल दिहम फिर अकेले रह ग

सोचिए कि भगवान ने मेरे मुख से, मेरे कंठ से क्या लाइनें कहलवाईं। विधि में जो लिखा हो वह ईश्वर को ही पता है कि कल का दिन ये इंसान देखेगा कि नहीं। लेकिन किसी से ये कहलवा देना! जब वह नहीं रहे तो मेरा ध्यान सबसे पहले इसी तरफ गया। आखिरी पंक्तिया मैंने पापा के साथ गाईं, तोड़ के दिल वो चल दिए, हम फिर अकेले रह गए...

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मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
पापा की पहली स्मृतियां
जब मैं बच्चा तो मुझे तो ख्याल भी नहीं आता था कि मैं इतने बड़े महान पिता का बेटा हूं। और, वह इसलिए कि उन्हें खुद भी महसूस ही नहीं होता था कि मैं इतनी बड़ी हस्ती हूं। वह बहुत ही सादा मिजाज के आदमी थे। जैसे हनुमानजी को उनकी शक्ति के बारे में याद दिलाना पड़ा था, वैसे ही हमें पापा को याद दिलाना पड़ता था कि आप इतने बड़े स्टार या इतने बड़े गायक हो। वह अक्सर बस की लाइन में खड़े हो जाते थे। टैक्सी में ही कहीं भी चले जाते थे। हम कुछ इस बारे में कहते तो वह बस एक उंगली दिखाते कि बेटा आज तो कह दिया अब फिर कभी न कहना। मैं जैसा हूं, वैसा खुश हूं। मुझमें औरों से अलग कोई बात नहीं है।

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मुूकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार
मैं नौ साल का था जब ‘अनाड़ी’ फिल्म आई थी। ये गीत अगर लिखा गया किसी के लिए तो वह थे पापा, ‘किसी की मुस्कुराहटों में हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार.. ’वो दुनिया जहान का दर्द अपने दिल में समेट लेते थे। और, ‘किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार... ’, तो वो दुनिया जहान को अपना प्यार बांटते थे। इसीलिए लगता है कि ये गीत उनके लिए ही लिखा गया था। इसी फिल्म के गाने ‘सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी’ के लिए उन्हें पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला था।
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मुकेश और शंकर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अपने ही गानों से मुकाबला
1972 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में फिल्म ‘मेरा नाम जोकर का’ का गाना ‘जाने कहां गए वो दिन’, फिल्म ‘आनंद’ का गाना ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ और फिल्म ‘बेईमान’ का गाना ‘जै बोलो बेईमान की’ मुकाबले में थे। पुरस्कार फिल्म ‘बेईमान’ के गाने को मिला। तीनों गाने उनके लिए तो तीन बच्चे ही थे लेकिन ‘मेरा नाम जोकर’ का गीत ‘जाने कहां गए वो दिन’..इस सबमें मेरा सबसे खास है।
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मुकेश और राज कपूर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
जिसके लिए गया, उसके जैसा गाया
‘सुहाना सफर’ या फिर ‘ये मेरा दीवानापन है’ ये गाने देखिए तो आपको लगेगा ही नहीं कि दिलीप साहब नहीं गा रहे हैं। दिलीप साहब ने एक बार मुझसे कहा था कि उनका बिल्कुल ही मन नहीं था महबूब खान की फिल्म ‘मेला’ फिल्म करने का। दिलीप कुमार के मुताबिक, ‘फिल्म ‘मेला’ मैंने सिर्फ इसलिए की क्योंकि मैंने इसके दो गाने ‘धरती को आकाश पुकारे’ और ‘गाए जा गीत मिलन के’ सुन लिए थे और ये गाने मुझे अपने ऊपर चाहिए थे। मेरा मन नहीं था ये फिल्म करने का लेकिन जब मैंने ये दोनों गीत सुने तब मैंने फैसला किया कि ये फिल्म मुझे करनी ही है।’
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मुकेश और नितिन - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
मेरा पहला गाना और पापा के आंसू
माहौल तो ऐसा था कि पापा के आंसू नहीं रुक रहे थे। सबसे पहले कुछ लाइनें तो मैंने फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए अंग्रेजी में गाई थीं लेकिन जो पहला हिंदी गाना मैंने रिकॉर्ड किया वो था ‘तेरी झील सी गहरी आंखों में कुछ देखा हमने क्या देखा’। ये किशोर साहू साहब की फिल्म थी ‘धुएं की लकीर’। संगीतकार श्यामजी घनश्यामजी ने मुझसे ये गाना गवाया और उस रिकॉर्डिंग में पापा आए थे। उनके चेहरे पर इतनी बेचैनी थी कि मुझे कहना पड़ा कि पापा, आप साउंड सेक्शन वाला पर्दा खींच लो। रिकॉर्डिंग के बाद उन्होंने मुझे बहुत प्यार किया। उनके आंसू रोके नहीं रुक रहे थए। फिर उस दिन उन्होंने मां के कहने पर मुझे एक सोने की चेन दिलवाई। पतली सी चेन थी लेकिन उसे जब भी मैं पहनता हूं तो मैं समझता हूं कि उसमें किसी तरह की शक्ति है। उस चेन को मैं बड़ा संभालकर रखता हूं।
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मुकेश - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

कोई बनावटीपन कभी नहीं रहा
लताजी ने एक बार कहा कि जब मुकेश भैया गा रहे होते तो यूं लगता था कि कोई भला मानुस, कोई संत या देव मानुस गा रहा है। मुरली मनोहर स्वरूप जिन्होंने पापा की गाई रामायण को संगीतबद्ध किया वह कहा करते थे, अगर प्रभु श्रीराम गाते तो मुकेश की आवाज में ही गाते। पापा की आवाज, व्यक्तित्व और जीवन में कोई बनावटीपन नहीं था। कोई छल कपट नहीं था।

नितिन मुकेश का ये पूरा इंटरव्यू आप यहां पढ़ सकते हैं:

100 Years of Mukesh: अगर श्रीराम गाते तो मुकेश ही उनकी आवाज होते, जानिए रामायण के किस संगीतकार ने कही ये बात

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