गोरा होना समाज में सुंदरता का पर्याय माना जाता रहा है। इसे लेकर इस समय काफी बहस भी चल रही है। इन दिनों गोरे रंग और सांवले रंग को लेकर बड़ी बहस चल रही है। जिसके चलते फेयर एंड लवली ने भी अपने नाम को बदलने का फैसला किया है। ऐसे में इस बहस ने और बड़ा रूप ले लिया है। इसी बारे में चर्चा करने के लिए अमर उजाला ने मशहूर मराठी अभिनेत्री नयना मुके के साथ बातचीत की।
नयना मुके ने इस बारे में खुलकर अपने विचार रखे। नयना से जब सवाल किया गया कि आखिर क्यों फेयर ही लवली होता है? क्यों डस्की कलर खूबसूरत नहीं हो सकता? इस सवाल के जवाब में नयना ने कहा, 'मुझे ऐसा लगता है ये अपना एक परसेप्शन होता है। और देखने का नजरिया होता है। और सोसाइटी को ये एक्सेप्ट करने में वक्त लगेगा। क्योंकि बचपन से ये सारी चीजें शुरू हो जाती हैं। हमारे आस- पास के लोग भी यही बोलते हैं।'
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आगे नयना कहती हैं, 'स्कूल में भी हम यही सुनते हैं। फिर हम कॉलेज जाते हैं वहां पर भी हमें यही सब सुनने को मिलता है। फिर करियर पॉइंट आता है। हर फील्ड चाहें आई टी सेक्टर हो या फिर कॉरपोरेट सेक्टर। मुझे लगता है कि हर सेक्टर में हमें ये देखने को ही मिलता है।' आगे नयना ने उदाहरण देते हुए बताया कि, 'हम स्कूल भी जाते हैं वहां भी तो ब्लैक बोर्ड होता है। जिस पर हम सफेद चॉक से लिखते हैं।'
नयना ने कहा, 'मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं इस चीज को लेकर हमारे मन में ये दुख है कि वो चीजें लोगों के समझ में नहीं आ रही हैं पर जैसे सोसाइटी में बदलाव लाने के लिए बहुत सी चीजें होती हैं। जैसे थियेटर होता है, फिल्में होती हैं। इनके जरिए बदलाव लाया जा सकता है। हमें इस मीडियम को यूटिलाइज करना चाहिए। मानती हूं कि बदलाव होना इतना आसान नहीं हैं लेकिन हम इससे कोशिश तो कर ही सकते हैं।'
नयना का भी मानना यही है कि रंगभेद नहीं होना चाहिए। किसी को उसके रंग के आधार पर परखा नहीं जाता और ना ही ऐसा किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि नयना मुके मराठी अदाकारा हैं। वो एक थियेटर आर्टिस्ट भी हैं और कई सारे टीवी सीरियल्स में भी काम कर चुकी हैं। नयना न सिर्फ छोटे बल्कि बड़े पर्दे पर भी सक्रिय हैं।