फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

‘सिलसिला खत्म न होगा मेरे अफसाने का…’ वो महान गीतकार 51 साल बाद भी जिंदा है जिसका ‘करिश्मात-ए-तसव्वुर’

Tue, 20 Apr 2021 06:19 PM IST
अमरीन हुसैन एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 8
शकील बदायूंनी - फोटो : Social media

‘हश्र तक गर्मी-ए-हंगामा-ए-हस्ती है 'शकील’, सिलसिला खत्म न होगा मेरे अफसाने का…’ कानों में गूंजने वाले जिसकी कलम से निकले उस महान लिरिस्ट की आज पुण्यतिथि है। जब यूपी के ऐतिहासिक शहर बदायूं में शकील अहमद का जन्म हुआ था तब किसे पता था कि उनकी स्याही में इतनी तपिश होगी कि शहर को उनके नाम से पहचाना जाने लगेगा। और वे कलम की रवानगी में वक्त के साथ शकील बदायूंनी बन जाएंगे।

विज्ञापन

2 of 8
शकील बदायूंनी

वक्त के साथ न कला मरती है न ही कलाकार। सिर्फ एक जिक्र छेड़ देने भर से ही पूरा दौर दोहरा जाता है। कुछ ऐसा ही अफसाना है शकील बदायूंनी का भी। वे हिंदी फिल्म उद्योग के सबसे महान गीतकारों में से एक माने जाते हैं। उनके शब्दों दिल-ओ-दिमाग से निकले अल्फाज ने न जाने कितने नजमें गढ़ दिए।

विज्ञापन

3 of 8
shakeel badayuni - फोटो : shakeel badayuni

अपने शुरुआती वर्षों के दौरान घर पर शैक्षिक माहौल ने शकील को फारसी, अरबी और उर्दू जैसी कई भाषाओं को सीखने में मदद की। और उन्हें कविताओं में रुझान हो गया। कविता के प्रति झुकाव को देखते हुए उन्होंने लीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बीए की डिग्री हासिल करने के दौरान मुशायरों में भाग लेना शुरू कर दिया। बस फिर क्या था जल्द ही उन्हें कविता में उभरती आवाज के रूप में पहचाना जाने लगा।

4 of 8
शकील बदायुनी

उन दिनों शकील की मुलाकात प्रसिद्ध कवि जिगर मुरादाबादी से हो गई। और वे उनके नायक बन गए। 1946 में वह मुंबई पहुंचे। उस वक्त भारतीय फिल्म उद्योग ने विभाजन के दौरान कई नामी कलाकारों और गीतकारों को खो दिया था, क्योंकि वो पड़ोसी देश पाकिस्तान चले गए थे। ये वक्त शकील के लिए बेहतरीन अवसर साबित हुआ। एआर करदार यानी अकबर राशिद करदार और निर्देशक नौशाद ने मुशायरे में देखा। ये दोनों अपनी आगामी फिल्म डार (1947) के लिए एक नए गीतकार की तलाश में थे। नौशाद ने युवा शकील की कविता से प्रभावित होकर उन्हें फिल्म ऑफर कर दी। यहीं से गीत-संगीत की दुनिया में शकील की पेशेवर शुरुआत हुई। बाद में इनकी जोड़ी भी हिट साबित होने लगी।

विज्ञापन

5 of 8
शकील बदायूंनी

वे न केवल अद्भुत धुन थे, बल्कि ज्यादातर फिल्मों की व्यावसायिक सफलता के पीछे का कारण भी थे, जो उन्होंने साबित किया - आन (1952), बैजू बावरा (1952), मदर इंडिया (1957), मुगल-ए-आज़म (1960), कोहिनूर (1960), गंगा जमुना (1961) और मेरे महबूब (1963) जैसी फिल्मों में। शकील ने संगीत निर्देशक गुलाम मुहम्मद के साथ भी अच्छा तालमेल स्थापित किया और उनके लिए कई अविस्मरणीय गीत लिख डाले।

विज्ञापन

6 of 8
शकील बदायूंनी - फोटो : Social media

साहिर, शैलेंद्र, कैफी आजमी, अली सरदार जाफरी और मजरूह सुल्तानपुरी जैसे उनके समकालीन लेखकों में से अधिकांश में राजनीतिक झुकाव था, लेकिन शकील ने खुद को फिल्मों के लिए गीत लिखने तक ही सीमित रखा। कहा जाता है कि गुटबाजी ने उनके करियर को प्रभावित किया और उन्होंने अपने करियर में केवल 90 फिल्में कीं।

विज्ञापन

7 of 8
मोहम्मद रफी व अन्य के साथ शकील - फोटो : Social media

शकील के लेखन की सबसे बड़ी खासियत थी कि जब उन्होंने अपने साहित्यिक लेखों में उर्दू का मेल रखा तो लोगों को काफी पसंद आया। बिना किसी नियम से समझौता किए बड़ी ही आसानी से उन्होंने सरल भाषा में अपनी बात गीतों के जरिए उतार दी। गुरु दत्त ‘चौदहवीं का चांद’ से मिली प्रतिक्रिया से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इसे शकील और रवि से घंटों तक सुना था।

इसके बाद शकील अहमद से शकील बदायूंनी बने लिरिस्ट का सूरज तब अस्त की ओर ढला जब अपनी ही सेहत ने जवाब देना शुरू कर दिया। वे शूगर और टीबी जैसी बीमारियों से पीड़ित हो गए थे। उन्होंने अपने आखिरी साल पंचमढ़ी के टीबी सेनिटोरियम में बिताए थे।

विज्ञापन

8 of 8
शकील बदायूंनी - फोटो : Social media
नौशाद ने शकील के साथ काम करना जारी रखा था और ये तीन फिल्में आदमी (1968), राम और श्याम (1967) और संघर्ष (1968) थीं। संघर्ष इस जोड़ी की आखिरी पेशकश थी। ‘जब दिल से दिल टकराता है’ सबसे रोमांटिक हिट के तौर पर पहचाना गया था। शकील 1970 में 53 वर्ष की उम्र में दुनिया से अलविदा कह गए। लेकिन आपने पीछे गीतों और यादों का एक खूबसूरत कारवां छोड़ गए। लोग उनकी लिखी लाइनों को अब भी याद करते हैं जब वो कहा करते थे ‘सब करिश्मात-ए-तसव्वुर है शकील, आता है न जाता है कोई…’
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें