KHUDA GAWAH MOVIE
अफगानिस्तान की कुछ लोकेशंस ऐसी भी थी जहां सिर्फ घोड़ों के जरिए पहुंचा जा सकता था और तब अमिताभ बच्चन और उनके काफिले को छोटे छोटे हवाई जहाजों से नेपाल की सीमा तक पहुंचाया जाता और वहां से पूरी यूनिट घोड़ों की पीठ पर लोकेशन तक पहुंचती। कुछ रातें अमिताभ बच्चन ने लोकेशन पर ही मिट्टी के बने ऐसे घरों में बिताईं, जहां वे खड़े हो जाएं तो सिर छत से टकरा जाता था। ऐसे भी मौके आए जब पूरी यूनिट पानी के सिर्फ एक नलके से काम चलाती थी और सारा दिशा मैदान सब खुले में ही जाना होता था। और, दूसरी तरफ जब ये लोग वापस बस्ती पहुंचते थे तो हेलीकॉप्टर या जहाज से रुकने की जगह तक किसी को भी पैदल चलकर नहीं जाने दिया जाता। जो भी कबीले का सरदार वहां मौजूद होता, वह अमिताभ बच्चन को गोदी में उठाकर ले जाता। और, इस दौरान 24 घंटे अमिताभ के सिर पर रहता पहरा अफगानिस्तान एयरफोर्स के फाइटर जेट्स का।
जबर्दस्त आवभगत के बीच बनी इस फिल्म की कहानी भी कबीले की ही है। घोड़ों पर चढ़कर खेले जाने वाले खेल बुजकाशी के एक खेल में बादशाह खान यानी अमिताभ बच्चन की आंखें बेनजीर को देखती हैं। बादशाह का प्यार भी उसे कुबूल है। पर, शर्त वह ये लगाती है कि बादशाह खान को उस कातिल का सिर काटकर लाना होगा जिसने उसके पिता की हत्या कर दी। बादशाह खान इसके लिए हिंदुस्तान आता है। कातिल का पता लगाता है और बेनजीर से किया अपना वादा पूरा करके हिंदुस्तान के कानून के हिसाब से सजा काटने फिर भारत लौट आता है। कहानी इसके बाद अगली पीढ़ी तक पहुंचती है। श्रीदेवी अब मेहंदी के किरदार में नजर आती है और कहानी यहीं से नया ट्विस्ट भी लेती है। मेहंदी से रजा मिर्जा को प्यार है और रजा मिर्जा है उसी कातिल का बेटा जिसे मारने बादशाह खान हिंदुस्तान आया था।